हिंदी के महत्वपूर्ण कवि व गद्यकार श्रीप्रकाश शुक्ल की नई किताब ‘भक्ति का लोकवृत्त और रविदास की कविताई’. रविदास के जन्मस्थान से लेकर उनके जन्मवर्ष और उनके लोकवृत्त पर बहस करती है.
सोलह अध्यायों और 415 पृष्ठों में फैली इस किताब में रविदास को एक कवि के रूप में समझने की कोशिश की गई है और इसी कवि के विस्तार स्वरूप उनके अनेक जीवन प्रसंगों को समझा गया है. यह किताब श्रीप्रकाश शुक्ल को एक बेहतरीन आलोचक के रूप में स्थापित करती है. इसके पहले लिखी उनकी किताबें, ‘साठोत्तरी हिंदी कविता में लोक सौन्दर्य’, ‘नामवर की धरती’, ‘महामारी और कविता’ या ‘राग रविदास’ की भूमिका, में थोड़ा आलोचना का तत्व था, लेकिन कायदे से आलोचना की किताब अब आयी है.
भक्ति का लोकवृत्त किसे कहते हैं या लोकवृत्त किसे कहते हैं, इस पर श्रीप्रकाश ने पूरी परंपरा का अध्ययन किया है. आलोचना का यह काम होता है कि परंपरा का बोध उसके पास बना रहे.
ऐसा नहीं कि रविदास को हिंदी प्रदेश भूल गया है. रामचंद्र शुक्ल, मिश्र बंधुओं और निराला के यहां रविदास का जिक्र है. लेकिन ज्यादातर इस रूप में उन्हें रेखांकित किया जाता था कि उनका प्रभाव दलित समाज पर बहुत था. श्रीप्रकाश ने रविदास की कविता की गहराई पर ध्यान दिया है.
रविदास की कविताओं का संकलन डॉ. धर्मवीर करना चाहते थे लेकिन कर नहीं पाए थे, इसका संकलन शुकदेव सिंह के द्वारा किया गया. लेकिन उनकी कविता पर मुग्ध होकर किसी आलोचक ने खुलकर शायद कभी नहीं लिखा. यह किताब रविदास की कविता, उनके शब्दों और उसकी भाषा को काव्यशक्ति के लिहाज से खोलती है. एक छंद श्रीप्रकाश जी ने इसमें उद्धृत किया है:
‘बेगमपुरा सहर को नाउ
दुख अंदोह नहीं तिहि ठाउ.’
‘अंदोह’ का तात्पर्य है दर्द या पीड़ा. जां निसार अख्त़र का शे’र है, ‘रंज़-ओ-ग़म मांगे है, अंदोह-ओ-बला मांगे है/ दिल वो मुज़रिम है जो खु़द अपनी सज़ा मांगे है.’ मिर्जा गालिब ने भी लिखा है- ‘अगले वक्तों के हैं ये लोग इनसे कुछ न कहो/ जो मय-ओ नग़्मा को अंदोह-ओ-रुबा कहते हैं.’
एक बड़ा कवि ही ऐसे शब्दों को अपनी कविता में रखता है. रैदास की इसी कविता में ‘काइम दाइम सदा पतसाही’ भी आया है. ‘दाइम पड़ा हुआ तिरे दर पर नहीं हूं मैं/ खाक़ ऐसी जिंदगी पर कि पत्थर नहीं हूं मैं’ यह ग़ालिब ने लिखा है. तो दायिम (हमेशा), अंदोह (दुख) जैसे शब्द जो रविदास के पदों में मिलते हैं वे फ़ारसी भाषा के शब्द उनके समय में भी लोक में थे जहां से आगे चलकर ग़ालिब जैसे शायरों के प्रयोग में भी आया.
इसी तरह इस पद में आया है– ‘आबादान सदा मशहूर/उहां बसहि गनी मामूर.’ ये ‘मामूर’ अर्थात् ‘पदधारक’ शब्द बहादुरशाह ज़फ़र के एक शेर में भी आया है– ‘रोज़ मामूरा-ए-दुनिया में ख़राबी है ‘ज़फ़र’/ऐसी बस्ती को तो वीराना बनाया होता’
रविदास उर्दू के कवियों से पहले से अपनी कविता में फ़ारसी के शब्दों को रख रहे थे. जब हम किसी कवि की शब्दशक्ति पर विचार करते हैं तो ये देखते हैं कि उसने पहले के कवियों से क्या-क्या लिया है और इस बात पर भी बात होनी चाहिए कि रविदास ने आगे के कवियों को कौन-सी शब्द-संपदा दी है.
नागार्जुन ने लिखा था– ‘तुलसी बाबा साथ रहईं तअ नहीं बिसरब हम शब्द सुमरिनी.’ जैसे राम का सुमिरन करना पड़ता है वैसे ही कवि शब्द का सुमिरन करता है. इसलिए कवि को समझना है तो उसकी भाषा को समझना जरूरी है. अगर हम केवल उसके सामाजिक पक्ष पर बात करते रहें तो वास्तव में हम कहीं न कहीं कविता की उपेक्षा कर रहे हैं.
यह किताब रविदास की जाति पर भी विचार करती है. श्रीप्रकाश ने इस किताब में केवल स्थापित पुस्तकों पर ही बात नहीं की है बल्कि जो नई किताबें आई हैं उस पर भी चर्चा की गई है. भक्ति के लोकवृत्त पर बात करते हुए हिंदी में जो किताब सबसे ज्यादा चर्चित हुई वह प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल की पुस्तक ‘कबीर की कविता और उनका समय’ (2009) है. इसी के साथ हिंदी आलोचना में इस शब्द का प्रयोग बढ़ गया.
पुस्तक में श्रीप्रकाश ने हिंदी आलोचना में कुछ अवधारणाएं जो चल रही थीं उसको आगे बढ़ाने का काम किया. जैसे– भक्ति का लोकवृत्त कहां से शुरू होता है. लोकवृत्त का मतलब वह ‘शिक्षित’ जनता नहीं है जहां से आचार्य रामचंद्र शुक्ल शुरू करते हैं. शुक्ल जी के इतिहास के पहले संस्करण में ‘शिक्षित’ जनता की चित्तवृत्ति की बात की गई है. बाद में ‘शिक्षित’ शब्द हटाया गया. श्रीप्रकाश उसको आगे बढ़ाते-बढ़ाते अशिक्षित समाज तक ले जाते हैं और तर्क भी देते हैं कि निरक्षर समाज को वो नए युग के हिसाब से निर्मित करना चाहते थे.
श्रीप्रकाश की स्थापना है कि कबीर जाति व्यवस्था के बाहर से लड़ रहे थे और रविदास भीतर से लड़ रहे थे क्योंकि जाति व्यवस्था ने जितना रविदास को दबाया था, उतना कबीर के साथ नहीं था.
इस किताब में एक कमी मुझे यह लगी कि डॉ. धर्मवीर की किताब ‘महान आजीवक: कबीर, रैदास और गोसाल’ का जिक्र नहीं है. लेकिन जब हम दलित विमर्श से कुछ ग्रहण करते हैं खासकर भक्तिकाल के संदर्भ में, तो डॉ. धर्मवीर का क्रांतिकारी योगदान है. पुरुषोत्तम अग्रवाल भी धर्मवीर का जिक्र नहीं करते लेकिन उनकी किताब का बड़ा हिस्सा धर्मवीर के खिलाफ है.
कभी-कभी लेखक का अपने विषय पर तादात्म्य कितना है और उसको कितना रूपायित कर पाया है, इससे भी किताब प्रभावशाली बनती है. जैसे, जब हम ‘कुटज’ पढ़ते हैं तो हजारीप्रसाद द्विवेदी के अपने संघर्ष को महसूस करते हैं तो कृति का एक अलग अर्थ समझ में आता है. अगर द्विवेदी के जीवन को निकाल दीजिए उसके अर्थ से, और केवल ‘कुटज’ के बारे में पढ़िए तो उसका प्रभाव घटेगा.
नामवर सिंह कहते हैं कि ‘अक्खड़’ और ‘फक्कड़’ वाली बात कबीर के बारे में द्विवेदी कहते ज़रूर हैं, मगर इन दोनों शब्दों का संबंध द्विवेदी के व्यक्तित्व से भी है. मुझे लगता है कि बनारस में रविदास के बगल में श्रीप्रकाश का बस जाना भी इस पुस्तक का एक प्रमुख आधार रहा है. ‘घर जब बना लिया तेरे दर पर कहे बगैर’– रविदास के शब्द उनके मन तक पहुंचते रहे होंगे.
श्रीप्रकाश उस लोकवृत्त तक अपने लेखन को पहुंचा रहे हैं जिसके निर्माण में रविदास ने अपना योगदान दिया. उन्होंने रविदास के कुछ पक्षों को रखा है हमारे सामने जो पहले नहीं था. जैसे, बृहत्तर समाज में अपनी नागरिक भूमिका को तय करना.
पंजाब वालों ने रविदास की बहुत रक्षा की. इसी से उनका नागरिक समाज बनता है. श्रीप्रकाश कोशिश करते हैं कि उस समाज तक जाएं जो ज्यादा लिखना-पढ़ना नहीं जानता है. ऐसा न हो पाने पर कभी-कभी निराशा होती है, लेकिन श्रीप्रकाश रविदास में उस आशा भरे संघर्ष की तलाश करते हैं. रविदास से यही इनका तादात्म्य है जिस कारण एक नई दुनिया के निर्माण का संकल्प लेते हैं. ‘बेगमपुरा’ जैसी नई दुनिया बनाना इतना आसान नहीं है.
श्रीप्रकाश ने ठीक ही पकड़ा है कि कबीर ‘अमरदेसवा’ बनाते हैं जहां कोई सामाजिक संकल्प सीधे-सीधे नहीं दिखता है. लेकिन अगर हम तुलना करें रविदास के ‘बेगमपुरा’ से, तो जो रविदास की शर्त सच्ची हैं और ज्यादा व्यावहारिक भी. यह पुस्तक रविदास के काव्य-सत्य व जीवन-सत्य को इसी रूप में रेखंकित करती है.
(हिंदी आलोचक कमलेश वर्मा वर्तमान में राजकीय महिला महाविद्यालय, सेवापुरी, वाराणसी के हिंदी विभाग के अध्यक्ष हैं.)
