फ़्रांचेस्का ऑर्सीनी के भारत में प्रवेश पर रोक: ज्ञान पर पाबंदी से विश्वगुरु नहीं, मज़ाक़ बनता है देश

फ़्रांचेस्का संभवतः चौथी विद्वान हैं जिन्हें वैध वीज़ा होने के बावजूद भारत में प्रवेश करने नहीं दिया गया. उन्हें भारत में प्रवेश करने से रोकना ज्ञान की अवधारणा तथा संस्कृति का अपमान है. ज्ञान के क्षेत्र में उदारता का महत्त्वपूर्ण स्थान है. उदारता से ही वह वातावरण निर्मित होता है जहां अनेक दिशाओं से नए, श्रेष्ठ और कल्याणकारी विचार हमारे समक्ष आते हैं.

हिंदी की प्रसिद्ध विद्वान फ़्रांचेस्का ऑर्सीनी को दिल्ली हवाई-अड्डे से बैरंग वापस कर दिया गया जबकि उन के पास वैध वीज़ा था. (फोटो साभार: स्क्रीन ग्रैब/ यूट्यूब)

प्रकाश के पर्व दीपावली की अगली सुबह अंधेरे की ख़बर मिली. हिंदी की प्रसिद्ध विद्वान फ़्रांचेस्का ऑर्सीनी को दिल्ली हवाई-अड्डे से बैरंग वापस कर दिया गया जबकि उन के पास वैध वीज़ा था. फ़्रांचेस्का हिंदी की विश्व-प्रसिद्ध विद्वान हैं और उन्होंने अपना पूरा जीवन हिंदी भाषा और साहित्य के अध्ययन में लगा दिया है. वे लंदन विश्वविद्यालय के समादृत ‘सोआस’ (SOAS) में ‘प्रोफेसर एमिरेटस’ हैं जहां उन्होंने अपनी सेवा दी है.

सोचने की बात है कि फ़्रांचेस्का के पास जब वैध वीज़ा था तब उन्हें भारत में प्रवेश करने से क्यों रोक दिया गया? फ़्रांचेस्का संभवतः चौथी विद्वान हैं जिन्हें वैध वीज़ा होने के बावजूद भारत में प्रवेश करने नहीं दिया गया. सवाल है कि भारत में फ़्रांचेस्का के आने से किसे ख़तरा है ?

दरअसल केंद्र सरकार ने एक कल्पित आख्यान रचा है. वह यह है कि विदेशी लोग भारत के बारे में अनाप-शनाप लिखते हैं जिस से भारत की महान् छवि को धक्का लगता है. स्पष्ट ही है उन के लेखन पर तो कोई प्रतिबंध लगाया नहीं जा सकता है तो उन के भारत में प्रवेश करने पर ही रोक लगा दी जा रही.

सरकार को अपनी छवि और अपने कल्पित आख्यान की अधिक चिंता

हालांकि, फ़्रांचेस्का के लेखन से कभी किसी प्रकार का कोई राजनीतिक या अकादमिक विवाद उत्पन्न नहीं हुआ है. दूसरी ओर यह भी स्पष्ट है कि भारत के विश्वविद्यालयों को नियंत्रित करने के लिए इस सरकार के कार्यकाल में ऐसा परिपत्र लगभग हर केंद्रीय विश्वविद्यालय में जारी किया गया जिस में यह उल्लेख था कि किसी भी प्रकार के अकादमिक आयोजन में वक्ताओं को बुलाने के पहले उन की सूची को संबद्ध विश्वविद्यालय-प्रशासन से अनुशंसित तथा अनुमोदित कराना होगा.

इन दोनों बातों से साफ है कि इस सरकार को अपनी छवि और अपने कल्पित आख्यान की बहुत अधिक चिंता है. इस कल्पित छवि और कल्पित आख्यान पर किसी भी प्रकार का प्रश्न न खड़ा हो इस के लिए यह सरकार दमन एवं नियंत्रण पर उतारू है. फ़्रांचेस्का को भारत में प्रवेश से रोका जाना इसी सिलसिले की एक अगली कड़ी के रूप में दिखाई देता है .

यह कितना अधिक विडंबनापूर्ण और हास्यास्पद है कि ठीक इसी समय भारत के ‘विश्वगुरु’ होने का शोर चारों तरफ फैलाया जा रहा है! हक़ीक़त यह है कि हम विश्व-स्तरीय ज्ञान के निर्माता तो दूर, विनम्र विद्यार्थी बनने की योग्यता भी खोते जा रहे हैं. यदि ऐसा न होता तो जिस हिंदी को ‘राष्ट्रभाषा’ को कहकर प्रचारित किया जाता है उसी के विश्व-प्रसिद्ध विद्वान को भारत में प्रवेश करने से क्यों रोका जाता?

होना तो यह चाहिए था कि यदि उन के पास वैध वीज़ा और अन्य ज़रूरी दस्तावेज नहीं भी होते ( जो कि उन के पास प्रामाणिक रूप से थे ही) तब भी उन के योगदान को देखते हुए हवाई-अड्डे पर ही वीज़ा दिए जाने की एवं अन्य औपचारिकताएं पूरी की गई होती.

आख़िरकार एक विद्वान के प्रति और किसी संदेहास्पद व्यक्ति के प्रति हमारे व्यवहार में कोई अंतर होगा या नहीं या सब को एक ही लाठी से हांक दिया जाएगा? फ्रेंचस्का ऑर्सीनी ने आधुनिक हिंदी और मध्यकालीन हिंदी साहित्य पर मानक कार्य किया है. उन को भारत में प्रवेश करने से रोका जाना इस बात का भी प्रमाण है कि अभी के भारत में अकादमिक संस्कृति पर कितना बड़ा ख़तरा है!

विद्वानों का अपमान

यह भी हास्यास्पद ही है कि एक ओर तो यह सरकार विदेश के विश्वविद्यालयों को भारत में परिसर निर्मित करने और यहीं उन के द्वारा अध्ययन-अध्यापन को स्वीकृति दे रही और दूसरी ओर विद्वानों को इस प्रकार अपमानित कर रही है. यह विचित्र किंतु दुखद है कि भारत के बाहर के लोग भारतीय भाषाओं और साहित्य पर जमकर काम करते हैं और हमारे देश में न तो वैसे श्रेष्ठ कार्यों के लिए वातावरण बनाया जाता है और न ही कोई सुविधा दी जाती है.

दि तथाकथित ‘राष्ट्रवादी’ नजरिए से ही सोचें तो यह कितनी शर्मनाक बात है कि भारतीय भाषाओं के शब्दकोशों में ऑनलाइन तरीक़े शब्दों के अर्थ खोजने की सुविधा अमेरिका के शिकागो विश्वविद्यालय के ‘डिजिटल डिक्शनरीज ऑफ साउथ एशिया’ परियोजना के कारण सफल हुई. ऐसे अनेक उदाहरण हमारे सामने वर्तमान हैं. वैसे भी ज्ञान पर कोई पहरा नहीं होता और न ही ज्ञान देश की सीमाओं में क़ैद होता है. 

कहने को तो फ़्रांचेस्का के साथ किया गया यह व्यवहार एक सामान्य घटना लग सकती है लेकिन इस से मिलने वाले संकेत अत्यंत ख़ौफ़नाक हैं. सोचा जा सकता है कि विदेश के जो विद्वान अपना जीवन, समय और पैसा लगा कर भारत की भाषाओं और उन के साहित्य पर स्तरीय कार्य करते हैं उन पर इस घटना का कितना बुरा प्रभाव पड़ेगा! कोई भी भारत आने से पहले कितना डरा हुआ महसूस करेगा/करेगी! इस डर की वजह से जो प्रतिभाएं भारत के बारे में चाव, लगन और प्रतिबद्धता से कार्य करना चाहेंगी उन के मन में एक अनावश्यक दबाव तथा तनाव बैठता जाएगा जिस का दीर्घकालिक परिणाम यह हो सकता है कि उन की रुचि ही इस ओर समाप्त होने लगे.

इससे घाटा भारतीय भाषाओं और उनके साहित्य को ही होगा. शताब्दियों से विदेशों के लोग भारत की भाषाओं और उन के साहित्य पर काम करते आए हैं, हो सकता है कि कभी हम उन की पद्धतियों एवं दृष्टियों से असहमत हों लेकिन उन की मेहनत, लगन और स्तर पर संदेह तो किया ही नहीं जा सकता.

भारतीय जनता पार्टी जिस की भारत में केंद्रीय सरकार है वह भारत के अतीत के बारे में बहुत बड़े-बड़े दावे करती है जिन में से एक दावा यह भी होता है कि वैदिक युग बहुत ही उन्नत तथा महान था तो उसी ऋग्वेद में क्या यह मंत्र (आ नो भद्रा: क्रतवो यन्तु विश्वत:) नहीं है कि सभी दिशाओं से कल्याणकारी विचार हमारे निकट आएं? क्या फ़्रांचेस्का को रोकना ऋग्वेद के इस मंत्र की संगति में है? बिलकुल नहीं, कदापि नहीं.

फ़्रांचेस्का को भारत में प्रवेश करने से रोका जाना अभिधा और व्यंजना दोनों ही रूपों से इस मंत्र की तौहीन है. ज्ञान के क्षेत्र में उदारता का महत्त्वपूर्ण स्थान है. उदारता से ही वह वातावरण निर्मित होता है जिस में अनेक दिशाओं से नए, श्रेष्ठ और कल्याणकारी विचार हमारे समक्ष आते हैं. इस घटना ने साबित कर दिया है कि पूरी दुनिया को परिवार मानने का हमारा दावा खोखला है. फ़्रांचेस्का को भारत में प्रवेश करने से रोकना ज्ञान की अवधारणा तथा संस्कृति का अपमान है. 

 (लेखक दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय में हिंदी के सहायक प्राध्यापक हैं.)