नई दिल्ली: प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा नेशनल हेराल्ड मामले में दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (ईओडबल्यू) में दर्ज की गई नवीनतम एफआईआर को लेकर कांग्रेस नेता और वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा है कि यह ‘देरी से लिया गया कदम’ है और इसका कारण यह है कि उन्होंने ट्रायल जज के सामने दलील दी थी कि इस मामले में कोई ‘प्रेडिकेट ऑफेंस’ यानी मूल अपराध मौजूद नहीं है.
3 अक्टूबर को ईडी अधिकारी शिव कुमार गुप्ता द्वारा दर्ज की गई एफआईआर में सोनिया गांधी, राहुल गांधी, सुमन दुबे, सैम पित्रोदा, यंग इंडियन, डोटेक्स मर्चेंडाइज प्राइवेट लिमिटेड, सुनील भंडारी, एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) और कुछ अज्ञात लोगों को भारतीय दंड संहिता की धाराओं 420 (धोखाधड़ी), 406 (आपराधिक विश्वासघात), 403 (संपत्ति का बेईमानी से दुरुपयोग) और 120-बी (आपराधिक साजिश) के तहत आरोपी बनाया गया है.
एफआईआर में आरोप है कि सरकार द्वारा नेशनल हेराल्ड को सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए रियायती दरों पर आवंटित की गई संपत्तियों को गांधी परिवार और अन्य कांग्रेस नेताओं ने व्यक्तिगत लाभ के लिए ‘हड़प लिया’, जो गंभीर आपराधिक साजिश और वित्तीय धोखाधड़ी का मामला है.
अभिषेक मनु सिंघवी ने एफआईआर पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, ‘नेशनल हेराल्ड केस में दर्ज हुई यह नई एफआईआर ट्रायल जज के सामने दी गई मेरी दलीलों को अनजाने में दी गई श्रद्धांजलि है, जब मैंने कहा था कि इस मामले में कोई प्रेडिकेट ऑफेंस मौजूद नहीं है.’
उन्होंने आगे कहा, ‘मैंने यह भी कहा था कि अगर कोई प्रेडिकेट ऑफेंस नहीं है, तब मनी लॉन्ड्रिंग (पीएमएलए) का अपराध नहीं बन सकता. शायद इसी बड़ी कानूनी कमी को दूर करने के लिए मामूली बदलाव के साथ यह नई एफआईआर दर्ज की गई है. यह अतिसक्रिय और अत्यधिक चालाक अभियोजन का उदाहरण है. ध्यान रखें, यह आपराधिक कानून है, जो दुर्भावनापूर्ण या प्रतिशोधात्मक नहीं होना चाहिए.’
क्या यह सब समझने के लिहाज़ से काफ़ी जटिल लग रहा है… चलिए तो इसे सरल शब्दों में समझते हैं.
अभिषेक मनु सिंघवी के कहने का अर्थ यह था कि गांधी परिवार के खिलाफ दर्ज की गई नई एफआईआर दरअसल ईडी की एक ‘सुधारात्मक कोशिश’ है.. ताकि वह एक ‘निर्धारित अपराध’ (scheduled offence) जोड़ सके, जो पहले मौजूद नहीं था. यही वजह थी कि अदालतों में ईडी का मामला कमजोर पड़ रहा था. नई एफआईआर को इस कमी को पूरा करने की कवायद माना जा रहा है, ताकि अदालत में ईडी का पक्ष टिक सके.
सोनिया और राहुल गांधी दोनों को ईडी और आयकर विभाग पहले भी कई बार पूछताछ के लिए बुला चुके हैं. हर बार यह मामला राजनीतिक तूफान का रूप लेता है और भाजपा तथा कांग्रेस के बीच बड़ा टकराव का कारण बनता है. लेकिन असली सवाल यह है कि यह मामला है क्या? भाजपा इसे गांधी परिवार की कथित गड़बड़ियों का उदाहरण बताती है, जबकि कांग्रेस इसे झूठा और राजनीतिक बदले की कार्रवाई कहती है.
क्या यह सच में राजनीतिक प्रतिशोध है, या गांधी परिवार ने कोई ऐसा काम किया है जो आगे चलकर उन्हें परेशानी में डाल सकता है?
यहां नेशनल हेराल्ड केस के सभी बड़े पहलुओं की विस्तृत जानकारी है, जो पिछले एक दशक के सबसे विवादित और राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दों में से एक रहा है.
मामले का इतिहास
साल 1938 में नेशनल हेराल्ड अख़बार की स्थापना लखनऊ में हुई थी. इसे तत्कालीन संयुक्त प्रांत (अब उत्तर प्रदेश) के प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों- आचार्य नरेंद्र देव, रफ़ी अहमद किदवई, पुरुषोत्तम दास टंडन, कैलाशनाथ काटजू और जवाहरलाल नेहरू ने मिलकर शुरू किया था. नेशनल हेराल्ड अख़बार की पेरेंट कंपनी एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) थी.
एजेएल की नीति थी कि उसके प्रकाशनों की दिशा और नीति भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सिद्धांतों के अनुरूप रहेगी.. क्योंकि उस समय कांग्रेस ही ब्रिटिश राज के खिलाफ सबसे बड़ी राजनीतिक मंच थी. नेशनल हेराल्ड को शुरू करने का उद्देश्य यह था कि जब अधिकांश अख़बार या तो ब्रिटिश हुकूमत का समर्थन कर रहे थे या सेंसरशिप झेल रहे थे, तब जनता तक स्वतंत्रता आंदोलन की आवाज़ पहुंचाई जा सके.
यही कारण था कि नेशनल हेराल्ड और एजेएल के अन्य प्रकाशन- ‘कौमी आवाज़’ (उर्दू) और ‘नवजीवन’ (हिंदी) कांग्रेस की विचारधारा से घनिष्ठ रूप से जुड़े रहे.
स्वतंत्रता के बाद एजेएल ने अपने प्रकाशनों को व्यावसायिक संस्था की तरह नहीं चलाया. परिणामस्वरूप, 1980 और 1990 के दशक में लगातार नुकसान झेलने के बाद 1990 के दशक के अंत तक नेशनल हेराल्ड वित्तीय रूप से अस्थिर हो गया और कर्मचारियों के वेतन तक न दे सकने की स्थिति में पहुंच गया.
इसी दौरान, जब किसी भी बैंक ने नकारात्मक पूंजी वाली कंपनी को कर्ज़ देने से इनकार कर दिया, तब एजेएल ने कांग्रेस पार्टी से आर्थिक मदद मांगी. 2002 से 2010 के बीच अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (एआईसीसी) ने चेक के माध्यम से एजेएल को लगभग 90.21 करोड़ रुपये के कई छोटे ऋण दिए. एजेएल का कहना है कि यह रकम कर्मचारियों के वेतन, ग्रेच्युटी, भविष्य निधि, टैक्स और अन्य सरकारी बकाया चुकाने में खर्च की गई.
2008 में नेशनल हेराल्ड का प्रकाशन अस्थायी रूप से रोक दिया गया था. एजेएल की लगातार बिगड़ती वित्तीय स्थिति को देखते हुए कांग्रेस के तत्कालीन कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा ने कानूनी और वित्तीय विशेषज्ञों की सलाह से कंपनी के पुनर्गठन की योजना बनाई.
इस योजना के तहत नवंबर 2010 में ‘यंग इंडियन’ नाम की एक गैर-लाभकारी कंपनी बनाई गई, जिसे कंपनी अधिनियम 1956 की धारा 25 (अब अधिनियम 2013 की धारा 8) के तहत रजिस्टर्ड किया गया. और इस कंपनी के शेयरधारक बने सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मोतीलाल वोरा, ऑस्कर फर्नांडिस, सुमन दुबे और सैम पित्रोदा.
कांग्रेस ने 50 लाख रुपये यंग इंडियन से लिए और एजेएल से वसूले जाने वाले ऋण के अधिकार इस नई कंपनी को सौंप दिए. बाद में एजेएल ने प्रस्ताव दिया कि उसका कर्ज यंग इंडियन के पास उसके शेयरों में बदल दिया जाए.. ताकि बैलेंस शीट साफ हो सके और नए सिरे से काम शुरू किया जा सके. यह प्रक्रिया कॉरपोरेट जगत में आम है, जैसे दिवालियापन मामलों में कर्ज़ को इक्विटी में बदलना.
यंग इंडियन, एजेएल के शेयरों में बहुमत की हिस्सेदार बन गई और कंपनी को पुनर्जीवित करने का अवसर मिला. नवंबर 2016 में एजेएल के तीनों प्रकाशन- नेशनल हेराल्ड, कौमी आवाज़ और नवजीवन डिजिटल प्लेटफॉर्म के रूप में दोबारा शुरू किए गए.

फिर विवाद की जड़ क्या है?
विवाद की शुरुआत फरवरी 2013 में हुई जब हिंदुत्व समर्थक नेता डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने दिल्ली की एक अदालत में निजी आपराधिक शिकायत दर्ज की. उन्होंने आरोप लगाया कि यंग इंडियन के शेयरधारकों- सोनिया और राहुल गांधी, मोतीलाल वोरा, सैम पित्रोदा, ऑस्कर फर्नांडिस और सुमन दुबे ने कांग्रेस पार्टी के फंड को निजी कंपनी में ट्रांसफर कर गांधी परिवार के निजी हित साधे.
स्वामी उसी साल अगस्त में भाजपा में शामिल हुए.
हालांकि, स्वामी ने अपने आरोपों के समर्थन में कोई सबूत पेश नहीं किया, लेकिन उन्होंने दावा किया कि गांधी परिवार ने एजेएल की अचल संपत्तियों पर कब्ज़ा कर लिया और कांग्रेस पार्टी के साथ ‘धोखाधड़ी’ की.
अदालत ने शिकायत को स्वीकार कर लिया और गांधी परिवार को समन जारी किया. साल 2016 से 2021 तक इस मामले की सुनवाई चली, जिसमें स्वामी के साथ कई बार सवाल जवाब हुए.. लेकिन वे कोई ठोस सबूत नहीं दे सके. वे कई मौकों पर सुनवाई के दौरान मौजूद भी नहीं रहे. आख़िर में उन्होंने खुद दिल्ली हाईकोर्ट से अपने ही मामले को स्थगित करने की मांग कर दी.
यह निजी शिकायत अभी भी ट्रायल में लंबित है. इसी वजह से हर बार जब ईडी नए समन जारी करता है, तब नेशनल हेराल्ड के मामले को भाजपा और कुछ मीडिया संस्थान कांग्रेस पर हमले के अवसर के रूप में इस्तेमाल करते हैं.
यह मामला जब ठंडा पड़ने लगा था, तब ईडी ने स्वामी की शिकायत के आधार पर विपक्षी नेताओं के ऊपर कार्रवाई का सबसे कारगर औज़ार माने जाने वाले मनी लॉन्ड्रिंग अधिनियम (पीएमएलए) के तहत जांच शुरू कर दी थी.
दिलचस्प बात है कि ईडी के तत्कालीन निदेशक राजन कटोच ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि किसी निजी शिकायत को ईडी की जांच का आधार नहीं बनाया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट भी कई मामलों में यह कह चुका है कि ईसीआईआर (जो एफआईआर के समान होती है) कानूनी रूप से पंजीकृत अपराध पर आधारित होनी चाहिए. यह शायद पहला मर्तबा था जब ईडी ने एक निजी शिकायत के आधार पर जांच शुरू की थी.
राजन कटोच का तुरंत तबादला कर दिया गया और नए नेतृत्व में जून 2021 में औपचारिक जांच शुरू की गई. इसके बाद सोनिया गांधी, राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और अन्य से कई बार लंबी पूछताछ की गई.
कांग्रेस नेताओं का लगातार कहना है कि एजेएल और यंग इंडियन दो अलग-अलग संस्थाएं हैं, और उनके बीच कभी कोई धन का लेन-देन नहीं हुआ है. एजेएल के पुनर्जीवन का श्रेय उसकी संपत्तियों से मिलने वाली किराये की आय को जाता है, न कि किसी वित्तीय हेरफेर को. और यंग इंडियन की स्थापना केवल एजेएल को दोबारा खड़ा करने के उद्देश्य से की गई थी.
फिर भी, ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग का मामला जारी रखा है, जबकि अब तक वह अपने मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों के समर्थन में कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर पाया है.
दरअसल, एजेंसी ने अब तक यह भी आधिकारिक रूप से नहीं बताया है कि यंग इंडियन के शेयरधारकों पर मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप किस आधार पर लगाए गए हैं.
ईडी के आरोप और कांग्रेस की प्रतिक्रिया
करीब छह महीने पहले ईडी ने इस मामले में एक चार्जशीट दाखिल की, जिसमें गांधी परिवार और अन्य पर वित्तीय धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप लगाए गए.
ईडी का दावा है कि यंग इंडियन को केवल इस मकसद से बनाया गया था कि वह एजेएल की उन संपत्तियों पर कब्ज़ा कर सके, जो सरकार ने सार्वजनिक हित में रियायती दरों पर दी थीं. एजेंसी ने कहा कि ये संपत्तियां 2,000 करोड़ रुपये की हैं और यंग इंडियन ने मात्र 50 लाख रुपये देकर उनका अधिकार हासिल कर लिया.
हालांकि, कांग्रेस का कहना है कि एजेएल की संपत्तियों का मालिकाना अधिकार एजेएल के पास ही है, और उसकी किराये की आमदनी में से एक रुपये भी यंग इंडियन को नहीं मिले हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने 2012 के वोडाफोन मामले में यह साफ कहा था कि किसी कंपनी के शेयरधारक को कंपनी की संपत्ति पर अधिकार नहीं होता.. संपत्ति कंपनी की ही होती है.
कांग्रेस लगातार यह भी कहती आ रही है कि ईडी ने एजेएल की संपत्तियों का मूल्य (2,000 करोड़) जानबूझकर बढ़ा-चढ़ाकर बताया है. आयकर विभाग के अनुसार, वर्ष 2010-11 में इन संपत्तियों की कुल कीमत 392 करोड़ रुपये थी. भले ही उसके बाद संपत्तियों की कीमतें बढ़ी हों, फिर भी वे ईडी के बताए गए आकलन से कहीं मेल नहीं खातीं.

आरोप-प्रत्यारोप
ईडी ने यंग इंडियन पर यह आरोप भी लगाया कि उसने एक शेल कंपनी से 1 करोड़ रुपये का अवैध ऋण लिया.
कांग्रेस ने इसका खंडन किया और कहा कि यंग इंडियन ने दिसंबर 2010 में डोटेक्स मर्चेंडाइज प्रा. लि. से 14% ब्याज पर चेक द्वारा वैध रूप से 1 करोड़ रुपये का ऋण लिया था. डोटेक्स, आरपीजी समूह की कंपनी है और भारतीय रिजर्व बैंक से पंजीकृत एनबीएफसी है.. इसलिए किसी भी अवैध वित्तीय लेन-देन का सवाल ही नहीं उठता.
कांग्रेस ने यह भी आरोप लगाया कि ईडी ने अपनी चार्जशीट में झूठा दावा किया कि यह कर्ज़ यंग इंडियन के गठन से पहले लिया गया था. कांग्रेस के अनुसार, डोटेक्स का चेक 24 दिसंबर 2010 का है.. यानी कंपनी के गठन के बाद का, जबकि ईडी ने 24 अक्टूबर 2010 की तारीख बताई है.
ईडी ने अब तक इस गंभीर आरोप का जवाब नहीं दिया है.
नई एफआईआर के क्या मायने हैं?
जब ईडी ने इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग अधिनियम के तहत चार्जशीट दायर की, तब कई कानूनी विशेषज्ञों ने यह इंगित किया कि ईडी किसी भी जांच की शुरुआत केवल ‘निर्धारित अपराध’ (Scheduled Offence) के आधार पर कर सकती है.. यानी किसी पहले से दर्ज एफआईआर या वैधानिक शिकायत पर. यही बात ईडी के तत्कालीन निदेशक राजन कटोच ने कहीं थी, जिसके बाद उनका तबादला कर दिया गया था.
अब तक ईडी नेशनल हेराल्ड मामले में प्रेडिकेट ऑफेंस (जिसे एक एफआईआर के रूप में दर्ज होना चाहिए था) की अनुपस्थिति को महत्वहीन मानती आई थी. एजेंसी का कहना था कि उसने अपनी जांच तब शुरू की, जब ट्रायल कोर्ट ने सुब्रमण्यम स्वामी की निजी शिकायत को स्वीकार किया था, जिसमें एक निर्धारित अपराध के घटित होने का उल्लेख किया गया था.
लेकिन अब ईडी को एहसास हुआ है कि बिना पंजीकृत एफआईआर के उसकी कार्रवाई अदालत में टिक नहीं पाएगी.
बता दें कि निर्धारित अपराध (Scheduled Offence) उन अपराधों की सूची को कहा जाता है जो विभिन्न आपराधिक और विशेष कानूनों जैसे नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंसेज़ एक्ट, 1985 और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 के अंतर्गत आते हैं, और जिन्हें मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) में अधिसूचित व सूचीबद्ध किया गया है.
द वायर से बात करने वाले वरिष्ठ वकीलों के यह स्पष्ट किया है कि किसी भी ईडी कार्रवाई के लिए निर्धारित अपराध का होना अनिवार्य शर्त है.
पीएमएलए की धारा 5 में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ईडी की कार्रवाई किसी पुलिस एफआईआर या वैधानिक शिकायत पर आधारित होनी चाहिए… केवल अदालत द्वारा मामले का संज्ञान लिया जाना पर्याप्त नहीं है.
वरिष्ठ वकील सारिम नावेद ने द वायर को बताया, ‘पीएमएलए तभी लागू होता है जब कोई अपराध पहले से घट चुका हो और उस अपराध से जुड़ा धन आगे ट्रांसफर या लॉन्डर किया गया हो. बिना किसी पंजीकृत अपराध के कोई जांच शुरू ही नहीं की जा सकती.’
नावेद ने कहा कि चार्जशीट दाखिल होने के बाद किसी भी जांच एजेंसी को ‘प्रेडिकेट ऑफेंस’ से जोड़ा नहीं जा सकता. उन्होंने कहा कि ‘सबसे पहले एक एफआईआर दर्ज होनी चाहिए. अगर चार्जशीट दाखिल होने के बाद कोई एफआईआर ‘रीट्रोफिट’ की जाती है, तो अदालत में वह रद्द की जा सकती है और उसी आधार पर पूरे पीएमएलए केस को भी खारिज किया जा सकता है.’
यही तर्क अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत में दिया था.
इसी कारणवश ईडी (जो अब तक गांधी परिवार के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग के ठोस सबूत नहीं पेश कर पाई है) ने दिल्ली पुलिस में एक नई एफआईआर दर्ज करवाई है.. ताकि अपनी पुरानी चूक को लेकर लीपापोती कर सके.
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