इंदिरा गांधी एंड द इयर दैट ट्रांसफ़ार्म्ड इंडिया: परिवर्तनकारी राजनीति की प्रतीक इंदिरा या सिर्फ़ विरोधाभास?

पुस्तक समीक्षा: श्रीनाथ राघवन की 'इंदिरा गांधी एंड द इयर दैट ट्रांसफ़ार्म्ड इंडिया' स्वयं को एक 'समग्र' राजनीतिक इतिहास के रूप में प्रस्तुत करती है. लेखक का दावा है कि किताब इंदिरा गांधी के शासन को 'परिवर्तन के युग' के रूप में समझती है. हालांकि, इंदिरा गांधी पर लिखी ढेरों किताबों की तुलना में यह कोई नया परिप्रेक्ष्य देने से चूक जाती है.

'यह न तो आलोचनात्मक इतिहास है और न ही निष्पक्ष राजनीतिक विश्लेषण; यह एक प्रकार से सत्ता के विमर्श की पुनर्रचना है, जहां इतिहास को नायक के रूप में इंदिरा गांधी की छवि के अनुकूल ढाला गया है.' (फोटो साभार: पेंगुइन प्रकाशन)

इंदिरा गांधी पर लिखा गया लगभग हर साहित्य भारतीय राजनीति के इतिहास में एक अनोखी परंपरा रचता है. दशकों से लेखकों, इतिहासकारों, पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों ने इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व और शासनकाल को समझने का प्रयास किया है. जिसमें कभी उन्हें ‘भारत की लौह महिला’ के रूप में चित्रित किया गया तो कभी एक ‘तानाशाह’ के रूप में.

कैथरीन फ्रैंक की इंदिरा: द लाइफ़ ऑफ इंदिरा नेहरू गांधी  से लेकर पुपुल जयकर की आत्मीय जीवनी इंदिरा गांधी: ए बायोग्राफ़ी, बिमल प्रसाद और एम. एन. दास की संपादित इंदिरा गांधी: द इयर ऑफ पावर, तथा रामचंद्र गुहा और ज्योतिरामया शर्मा जैसे इतिहासकारों की आलोचनात्मक टिप्पणियां; सभी ने किसी न किसी रूप में इंदिरा गांधी के शासन को ‘भारत के राजनीतिक इतिहास के निर्णायक क्षण’ के रूप में दर्ज़ किया है.

हालांकि, इन सभी किताबों में एक केंद्रीय विरोधभास मौजूद रहा है कि क्या इंदिरा गांधी का नेतृत्व भारत को आधुनिक बनाने वाला था या लोकतंत्र को खोखला करने वाला?

ऐतिहासिक अनिवार्यता का प्रश्न

इसी परंपरा के बीच श्रीनाथ राघवन की आई नई किताब इंदिरा गांधी एंड द इयर दैट ट्रांसफ़ार्म्ड इंडिया  स्वयं को एक ‘समग्र’ राजनीतिक इतिहास के रूप में प्रस्तुत करती है.

लेखक का दावा है कि यह किताब इंदिरा गांधी के शासन को ‘परिवर्तन के युग’ के रूप में समझती है. वह युग जब भारत ने राजनीतिक अस्थिरता से स्थिरता की ओर, संस्थागत जड़ता से प्रशासनिक अनुशासन की ओर, और क्षेत्रीयता से केंद्रीकृत राष्ट्रीयता की ओर यात्रा की. पर जब समीक्षित किताब को अन्य ग्रंथों के साथ पढ़ा जाता है तो इंदिरा गांधी की वैचारिक जटिलताओं और उनके शासन की नैतिक सीमाओं पर यह किताब एक वैचारिक असंतुलन का उदाहरण बन जाती है.

कैथरीन फ्रैंक जहां इंदिरा गांधी की अंतर्विरोधपूर्ण मानसिकता, असुरक्षा और महत्वाकांक्षा के द्वंद्व को विस्तार से रेखांकित करती हैं, वहीं यह किताब उन मनोवैज्ञानिक आयामों को हटाकर केवल ‘राजनीतिक उपलब्धियों’ पर केंद्रित रहती है.

पुपुल जयकर, जो इंदिरा गांधी की अंतरंग मित्र थीं, ने लिखा था कि इंदिरा की शक्ति उनके भीतर के अकेलेपन से उपजी थी; वह नेतृत्व में उतनी ही सशक्त थीं जितनी भीतर से भयभीत. लेकिन समीक्षित किताब इस भीतरी द्वंद्व को नजरअंदाज करते हुए उन्हें लगभग एक एकमात्र निर्णायक और युगांतरकारी नेता के रूप में पेश करती है.

यह दृष्टिकोण आलोचनात्मक नहीं, बल्कि श्रद्धामूलक है और यहीं से इस किताब का बौद्धिक संकट आरंभ होता है.

लेखक का तर्क है कि इंदिरा गांधी ने ‘आधुनिक भारत’ की परिकल्पना को ठोस रूप दिया. उन्होंने न केवल राज्य की शक्ति को केंद्रीकृत किया बल्कि उसे ‘जनता के साथ सीधा संवाद’ स्थापित करने का माध्यम बनाया.

यह दृष्टि रामचंद्र गुहा के उस विश्लेषण के विपरीत है जिसमें वे कहते हैं कि ‘इंदिरा गांधी के शासन ने भारतीय लोकतंत्र को संस्थाओं के बजाय व्यक्ति पर निर्भर बना दिया. इंडिया आफ्टर गांधी  में गुहा यह दिखाते हैं कि 1970 के दशक में लोकतंत्र एक व्यक्ति की इच्छा और असुरक्षा का बंधक बन गया था. परंतु समीक्षित किताब इस केंद्रीकरण को एक ‘ऐतिहासिक अनिवार्यता’ कहकर वैध ठहराती है.

इस प्रकार यह किताब लोकतंत्र के भीतर पैदा हुए उस संकट को सामान्य बना देती है, जिसे अन्य इतिहासकार चेतावनी के रूप में देखते हैं. इसी प्रवृत्ति को यदि आपातकाल के संदर्भ में देखें तो लेखक की स्थिति और स्पष्ट हो जाती है.

1975 का आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का वह निर्णायक क्षण था, जब सत्ता ने संविधान को अपनी सुविधा के अनुसार पुनर्परिभाषित किया. पर पुस्तक इसे ‘राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का चरम परिणाम’ बताकर एक तरह से आपातकाल को सामान्यीकृत करती है. लेखक की यह पेशकश  इतिहास-लेखन का एक वैचारिक विरोधभास है, जहां अधिनायकवाद को ‘कठिन निर्णय’ के रूप में महिमामंडित किया जाता है.

चेतावनी से लोक संघर्ष समिति  के गठन तक

जब जयप्रकाश नारायण की चेतावनी कि ‘इंदिरा गांधी देश में तानाशाही स्थापित करना चाहती हैं,’ इस पूरे प्रकरण को किताब केवल एक ऐतिहासिक घटना के रूप में दर्ज करती है जबकि उसकी नैतिक गूंज को लेखक सुनने से इनकार करते हैं.

25 जून 1975 को दिल्ली की रैली में जयप्रकाश नारायण ने युवाओं से कहा था कि वे कक्षाओं में रहने के बजाय जेल जाने के लिए तैयार हों; उन्होंने सशस्त्र बलों से आह्वान किया कि वे ‘अवैध आदेशों का पालन न करें.’ यह लोकतंत्र की रक्षा का क्षण था, लेकिन किताब इसे ‘राजनीतिक उत्तेजना’ कहकर उसकी गंभीरता को कम करती है.

इसी प्रकार मोरारजी देसाई की घोषणा कि ‘हम उन्हें इस्तीफ़ा देने के लिए घेर लेंगे,’ को लेखक केवल ‘विपक्षी अतिशयोक्ति’ मान लेते हैं. इस प्रकार यह किताब लोकतंत्र की नैतिकता को सत्ता की स्थिरता के तर्क में समेट देती है.

दूसरी ओर, यह किताब इंदिरा गांधी की नीतियों जैसे बैंकों का राष्ट्रीयकरण या प्रिवी पर्स की समाप्ति को लेखक ‘साहसी प्रयोग’ के रूप में देखते हैं. जबकि इतिहासकार बिपन चंद्र और बाद में सुधा पाई जैसे विश्लेषक, इन निर्णयों को उस राजनीतिक रणनीति के रूप में पढ़ते हैं, जिसने ‘गरीबी हटाओ’ की भाषा को जनता की भावनाओं के साथ जोड़कर सत्ता को स्थायी बनाने की कोशिश की.

साथ ही किताब सत्ता-केंद्रित राजनीति को राष्ट्रनिर्माण की आवश्यकता कहकर वैध ठहराती है. लेखक के लिए बैंक राष्ट्रीयकरण, न्यायपालिका से टकराव और विपक्ष पर दमन ये सब एक ‘मजबूत राज्य’ के प्रतीक हैं. पर प्रश्न यह है कि क्या राज्य की मजबूती नागरिक स्वतंत्रता की कीमत पर खरीदी जा सकती है?

इसी काल में जब प्रेस सेंसरशिप और गिरफ्तारियों का सिलसिला चल रहा था, तब समाज में प्रतिरोध के कुछ स्वर भी उभरे. मसलन, लोक संघर्ष समिति  का गठन हुआ जिसने गांधीवादी सत्याग्रह की परंपरा को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया. जनसंघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी इस समिति को समर्थन दिया, किंतु उनके उद्देश्य लोकतांत्रिक पुनर्स्थापना से अधिक स्वयं पर लगे प्रतिबंध को हटवाने से जुड़े थे.

संघ प्रमुख माधव राव देवरस ने 25 अगस्त 1975 को इंदिरा गांधी को पत्र लिखकर उनके स्वतंत्रता दिवस भाषण की प्रशंसा की और आग्रह किया कि ‘राष्ट्र के विकास के लिए संघ की शक्ति का योजनाबद्ध उपयोग करें.’

यह प्रसंग उस समय के विरोध के अंतर्विरोधों को प्रकट करता है कि कैसे कुछ शक्तियां प्रतिरोध के नैतिक दायरे से हटकर सत्ता से मेलजोल की नीति अपनाने लगीं? पर किताब में इस समूचे प्रकरण को ‘राजनीतिक फुटनोट’ कहकर टाल दिया गया है.

यह केवल तथ्यात्मक चूक नहीं बल्कि उस नैतिक प्रतिरोध के साथ अन्याय है जिसने आपातकाल की अंधेरी रात में लोकतंत्र की लौ जलाए रखी.

ग़रीबी उन्मूलन तथा सत्ता संरक्षण का द्वंद्व

कांग्रेस पार्टी की निष्क्रियता पर भी किताब का रवैया सतही है. इंदिरा गांधी की सत्ता के भीतर जो जड़ता फैल चुकी थी, वह केवल संगठनात्मक नहीं बल्कि वैचारिक थी. प्रधानमंत्री के एक सलाहकार ने उस समय लिखा था कि गरीबों के बीच आशा को केवल राजनीतिक कार्रवाई से जीवित रखा जा सकता है पर कांग्रेस मरणोन्मुख हो चुकी थी. बीस सूत्री कार्यक्रम के समर्थन में पार्टी ने कोई सार्वजनिक बैठक तक आयोजित नहीं की.

कांग्रेस कार्यकर्ताओं की समझ चुनाव तक सीमित थी. यह विडंबना उस शासन की है जिसमें ‘गरीबी उन्मूलन’ की भाषा सत्ता-संरक्षण का साधन बन चुकी थी. लेखक इस संकट को केवल ‘राजनीतिक सुस्ती’ कहकर टाल देते हैं, जैसे यह कोई साधारण प्रशासनिक समस्या हो.

इंदिरा गांधी के शासनकाल के अंत की सबसे महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक परिणति जनता पार्टी का उदय था. आपातकाल की जेलों में बंद विपक्षी नेताओं जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, चरण सिंह आदि ने यह अनुभव किया कि दमन का मुकाबला एक साझा राजनीतिक शक्ति से ही संभव है.

यही उस समय की नैतिक राजनीति का पुनर्जागरण था. लेकिन किताब में इस ऐतिहासिक एकता को भी ‘राजनीतिक अवसरवाद’ कहकर कमतर किया गया है. लेखक के लिए यह केवल सत्ता-संघर्ष था, जबकि वस्तुतः यह लोकतंत्र की नैतिक पुनर्स्थापना का क्षण था.

इस किताब की सबसे बड़ी वैचारिक त्रुटि यही है कि यह ‘परिवर्तन’ और ‘स्थिरता’ के तर्क में अंतर नहीं करती. सत्ता का केंद्रीकरण, प्रशासनिक नियंत्रण और राजनीतिक अनुशासन  इन तीनों को लेखक एक सकारात्मक परिवर्तन मानते हैं. जबकि लोकतांत्रिक राजनीति का सार यही है कि वह असहमति, बहुलता और संस्थागत स्वायत्तता को संरक्षित रखे. इंदिरा गांधी का शासन इन्हीं मूल्यों के विपरीत था.

फिर भी किताब इस विध्वंस को ‘सशक्त नेतृत्व’ की मिसाल बना देती है. इसीलिए जब हम इसे बिपन चंद्र की आधुनिक भारत  या रामचंद्र गुहा की डेमोक्रेट्स एंड डिसेंटर्स  जैसी किताबों के साथ रखकर पढ़ते हैं, तो यह ग्रंथ एक झुकावयुक्त आख्यान बनकर उभरता है.

यह न तो आलोचनात्मक इतिहास है और न ही निष्पक्ष राजनीतिक विश्लेषण; यह एक प्रकार से सत्ता के विमर्श की पुनर्रचना है, जहां इतिहास को नायक के रूप में इंदिरा गांधी की छवि के अनुकूल ढाला गया है.

अपर्याप्त निष्कर्ष की ओर

यह किताब जिस ‘परिवर्तन’ की बात करती है, वह लोकतंत्र की पुनर्कल्पना नहीं, बल्कि सत्ता की पुनर्संरचना है. लेखक के लिए परिवर्तन का अर्थ है एक ‘दृढ़ राज्य’ का निर्माण है जबकि वास्तविक प्रश्न यह था कि क्या वह राज्य नागरिकों की स्वतंत्रता और संस्थाओं की स्वायत्तता के साथ संगत था.

इस प्रश्न का उत्तर किताब नहीं देती; बल्कि वह उसे सत्ता की भाषा में दबा देती है.

यदि हम इतिहास को केवल उपलब्धियों और परियोजनाओं के आंकड़ों से मापें तो इंदिरा गांधी निस्संदेह एक प्रभावशाली नेता प्रतीत होंगी. किंतु इतिहास केवल उपलब्धियों का लेखा नहीं होता; वह नैतिक और वैचारिक निर्णयों का मूल्यांकन भी होता है. इस कसौटी पर यह किताब अधूरी है.

साथ ही यह किताब उस समय के राजनीतिक साहस की चर्चा तो करती है पर नैतिक साहस की चर्चा से बचती है. दरअसल, यह ग्रंथ ‘राज्य की दृष्टि’ से लिखा गया इतिहास है, जहां तानाशाही ‘अनुशासन’ कहलाती है, विरोध ‘राजनीतिक अस्थिरता’ और दमन ‘प्रशासनिक आवश्यकता’. यही कारण है कि यह किताब इतिहास की चेतना नहीं जगाती, बल्कि उसे सुन्न कर देती है.

इसीलिए अंततः यह कहा जा सकता है कि इंदिरा गांधी पर लिखे गए अनेक ग्रंथों में यह किताब कोई नया परिप्रेक्ष्य देने से चूक जाती है. परिणामस्वरूप यह किताब लोकतंत्र की जनवादी स्मृतियों का विश्लेषण नहीं कर पाती है.

वह स्मृति जो हमें याद दिलाती है कि सत्ता का सबसे बड़ा परीक्षण उसकी सीमाएं पहचानने में है. यही वह बिंदु है जहां यह किताब राजनीतिक इतिहास की व्याख्या से आगे निकलकर सत्ता का प्रतिरूप बन जाती है और पाठक के सामने एक कठिन प्रश्न छोड़ जाती है: क्या आधुनिक भारत का निर्माण लोकतंत्र के विध्वंस के बिना संभव है?

(डॉ. प्रांजल सिंह, ज़ाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज में राजनीति विज्ञान के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं )