विभाजन से आज तक: ‘अन्य’ बनाए जाने की निरंतरता

पुस्तक अंश: बलवंत कौर अपनी पुस्तक ‘स्मृति और दंश’ में लिखती हैं, '1992 में मस्जिद का ढांचा गिराते समय भी अतीत में हुए अन्याय और उत्पीड़न का कथानक रचकर न सिर्फ़ इस कृत्य को जायज़ ठहराया गया बल्कि धार्मिक विभाजन का विरोध कर पाकिस्तान न जाने का फ़ैसला लेने वाले और नये बन रहे लोकतंत्र में आस्था दिखाने वाले मुसलमानों को भी उसी अतीत के उत्पीड़न के तर्क के आधार पर प्रताड़ित किया गया. यहां तक कि 'समय-समय पर उन्हें आज भी पाकिस्तानी घोषित किया जाता है... और मुस्लिम मोहल्लों को ‘मिनी पाकिस्तान’ की संज्ञा से नवाज़ा जाता है.'

(पुस्तक आवरण साभार: राजकमल प्रकाशन)

बलवंत कौर की पुस्तक ‘स्मृति और दंश’ का यह अंश भारतीय समाज में ‘स्व’ और ‘अन्य’ की उस खतरनाक राजनीति को उजागर करता है, जिसमें पहचान के नाम पर अपमान, बहिष्कार और हिंसा को वैध ठहराया जाता है. यह विमर्श बताता है कि कैसे पवित्रता-अपवित्रता, श्रेष्ठता-हीनता और इतिहास के चुनिंदा आख्यानों के ज़रिये समुदायों, स्त्रियों और अल्पसंख्यकों को हाशिये पर धकेला जाता है. विभाजन, 1984, बाबरी मस्जिद विध्वंस और गुजरात 2002 जैसे संदर्भों के माध्यम से यह पाठ स्मृति, अफ़वाह, मीडिया और राज्य-हिंसा के गठजोड़ को सामने लाता है, जो लोकतांत्रिक समाज की बुनियाद को लगातार खोखला करता है.

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फिर उसके बाद शहर में नाचेगा हू का शोर,
मैं आख़िरी सदा हूं मुझे मार दीजिए.
– अहमद फ़रहाद

समाज में दूसरों को उपेक्षित करके हाशिये पर डालने या ‘अन्य’ बनाने की भूमिका प्राय: ऐसे लोगों द्वारा निभाई जाती है, जिनकी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचानों का विकास या तो हुआ नहीं होता या अधूरे व अधकचरे तरीक़े से हुआ होता है. ऐसे ही लोग ‘अन्य’ को उसके पहनावे, रीति-रिवाज, धार्मिक आस्थाओं, दैनिक जीवन-पद्धति के अभ्यास में जाहिल तथा कट्टर/रूढ़िवादी छवि में बांधकर अपने को सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से श्रेष्ठ दिखाते हैं. पहचानों की राजनीति में चूंकि सबसे पहला हमला सीधे और साफ़ दिखने वाले प्रतीक-चिह्नों पर होता है, इसलिए ‘गडे़रिया’ कहानी में पहले-पहल दाऊ जी की पगड़ी उतारी जाती है और दरांती से उनकी बोदी (चुटिया) काट दी जाती है.

‘एक लड़के ने पगड़ी उतार कर कहा—पहले बोदी काटो, बोदी और रानो ने मिस्वाकें काटने वाली दरांती से दाऊ जी की बोदी काट दी.’ इसके बाद ‘अन्य’ को अपमानित और कमतर सिद्ध करने की क्रिया को अंजाम दिया जाता है क्योंकि ‘अन्य’ को कमतर सिद्ध किये बिना अपने इतिहास और संस्कृति की महानता का आख्यान रचा ही नहीं जा सकता. अपनी सभ्यता और संस्कृति को सर्वश्रेष्ठ तथा दूसरे की सभ्यता और संस्कृति को कमतर मानने की प्रतियोगिता अक्सर साम्प्रदायिक हिंसा का कारण बनती है. ‘श्रेष्ठता’ के इसी अहंकार ने विभाजन की हिंसा को और भी उग्र बना दिया था. उर्वशी बुटालिया को दिये साक्षात्कार में वीर सिंह कहते हैं—

हमारे मुसलमानों से इतने अच्छे सम्बन्ध थे कि जब भी हमारे घर कोई समारोह होता, तो हम मुसलमानों को अपने घर बुलाते, वे हमारे यहां खाना खाते, लेकिन हम उनके यहाँ नहीं खाते, …यदि वह हमारे घर आते, तो हमारे घर के एक कोने में दो बर्तन रखे रहते, और हम उन्हें कहते, इन्हें उठाओ और इसमें खाओ, और तब वे खाकर उन्हें धोते और अलग रखते. यह कितनी अपमानजनक बात थी. पाकिस्तान बनने का यही कारण था…अगर हमारे एक हाथ में कुत्ता हो और दूसरे में खाने की कोई चीज़ तो फिर इस खाने में कोई ख़राबी नहीं थी. लेकिन मुसलमान आता और हाथ मिलाता तो हमारी दादियाँ और माँएँ कहतीं—बेटा, ये ख़राब हो गया है, इसे मत खाना. ऐसे तो व्यवहार थे.

समुदायों के भीतर का यह अहंकार सिर्फ़ ‘अन्य’ समुदायों को कमतर सिद्ध करने के लिए ही नहीं होता बल्कि स्त्रियों के सन्दर्भ में लगभग हर समुदाय के भीतर मौजूद रहता है. अगर यह कहा जाए कि हर समुदाय और देशकाल में स्त्रियाँ ‘अन्य’ हैं तो ग़लत न होगा. स्त्रियाँ स्वयं भी इस भाव से मुक्त नहीं होतीं. इसीलिए बँटवारे के समय औरतों ने विधर्मी के हाथों अशुद्ध होने से कुएँ में कूदकर अपनी जान देना बेहतर समझा. ‘पवित्रता’ के इस अहंकार ने ही हिंदू-सिख परिवारों को बँटवारे में अपहृत हुई स्त्रियों को घरों में पुनः स्वीकार किए जाने से रोका.

दरअसल पवित्रता-अपवित्रता का यह पूरा आख्यान ही एक मर्दवादी पितृसत्तात्मक आख्यान है जिसमें पुरुष या घर का मुखिया हमेशा शक्तिशाली पद पर रहता है. परिवार की यह संरचना सरकारों से लेकर हर तरह के संगठनों और समुदायों में मौजूद रहती है. धीरे-धीरे ‘शुद्धता या पवित्रता’ का यह भाव एक मनोरोग की तरह से हो जाता है, जो दूसरों को कमतर सिद्ध करते-करते अपने संगठनों, समुदायों, परिवारों के भीतर छँटनी करने लगता है. इस प्रक्रिया में पहले आधुनिक, तर्कशील विचार वाले अपने समुदाय से बेदख़ल होकर ‘अन्य’ बनते हैं उसके बाद धीरे-धीरे बा‌िक़‌यों को ‘अन्य’ बना दिया जाता है. श्रेष्ठता का यह भाव अक्सर दूसरे को नीचा दिखाने के लिए हिम्मत और शक्ति प्रदान करता है. इसके लिए अतीत में हुए अन्यायों या अत्याचारों की पूरी एक फ़ेहरिस्त तैयार कर नफ़रत और हिंसा को जायज़ ठहराया जाता है.

1992 में मस्जिद का ढांचा गिराते समय भी अतीत में हुए अन्याय और उत्पीड़न का कथानक रचकर न सिर्फ़ इस कृत्य को जायज़ ठहराया गया बल्कि धार्मिक विभाजन का विरोध कर पाकिस्तान न जाने का फ़ैसला लेने वाले और नये बन रहे लोकतंत्र में आस्था दिखाने वाले मुसलमानों को भी उसी अतीत के उत्पीड़न के तर्क के आधार पर प्रताड़ित किया गया. यहाँ तक कि ‘समय-समय पर उन्हें आज भी पाकिस्तानी घोषित किया जाता है…और मुस्लिम मोहल्लों को ‘मिनी पाकिस्तान’ की संज्ञा से नवाज़ा जाता है.’ सन् सैंतालीस में अपना सब कुछ गँवाकर भी पाकिस्तान न जाने का निर्णय लेने वाले ‘पार्टीशन’ कहानी के क़ुर्बान भाई का यही तो दर्द है कि आज़ादी के इतने सालों बाद आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी वह लोगों के लिए इंसान नहीं सिर्फ़ ‘मियाँ जी’ ही हैं.

अघोषित शोषण की यह प्रक्रिया न्याय-अन्याय की पूरी शब्दावली को बदल देती है. दमित और दमन के अर्थ और स्थान अपनी-अपनी जगह से खिसक नये अर्थ रच देते हैं फलतः ‘उत्पीड़क उत्पीड़ित का बाना धारण करने में समर्थ हो जाता है.’ 1984 में जिन्होंने सिख नागरिकों की हत्या की, उनके ज़हन में सिख ‘मासूम’ नहीं, बल्कि इन्दिरा गांधी की हत्या और भिंडरावाले द्वारा की गई हिंसा में बाक़ायदा साझीदार थे. इसी तरह से पंजाब में आतंकवादियों ने ख़ुद को यक़ीन दिला दिया कि वे भारतीय राज्य द्वारा अपने समुदाय के उत्पीड़न का प्रत्युत्तर-भर दे रहे हैं. हिंसा की एक और विचित्र चारित्रिक विशेषता अतीत से अपनी वैधता हासिल करना है.

1980 के दशक के परवर्ती दौर में पंजाब में हुई हिंसा ने उन्नीस सौ चौरासी में देश की राजधानी में फैलाए गए आतंक को जैसे वैध ठहरा दिया. पहचानों के इस तरह के संघर्ष में धारणाओं, चुटकुलों, व्याख्याओं, अफ़वाहों तथा सूचना माध्यमों की अहम भूमिका रहती है. अफ़वाहें और चुटकुले अर्थ पर क़ब्ज़ा कर कुछ ख़ास तरह से छवियों का निर्माण करते हैं. ‘अन्य’ को हिंसक, जाहिल, चालाक, उजड्ड आदि छवियों में बाँधकर हिंसा को जायज़ बना दिया जाता है. साथ ही अफ़वाहों को अक्सर अतीत की कहानियों के सन्दर्भ देकर सत्य का जामा पहनाया जाता है, जिससे उत्पीड़क और उत्पीड़ित की पहचान बदलने में शक्तिशाली को मदद मिलती है. अफ़वाहों की इसी तरह की भूमिका और प्रकृति के सन्दर्भ में वीणा दास का मानना है—

श्रीमती गांधी की हत्या की राजनीतिक घटना से पैदा हुई संकट की भावना उन स्थितियों के लिए आधार बन गई जिसके तहत हिंदू समुदाय के कुछ समूह सिखों के ‌ख़िलाफ़ हिंसा करके ख़ुद को ‘क्रोधित हिंदू’ के रूप में पदांकित कर सकते थे, और यह माना जाता है कि यह बड़े पैमाने पर बदला लेने के लिए किया गया था. इसके अलावा, भले ही कई हिन्दुओं ने सीधे तौर पर सिखों पर हिंसा नहीं की, फिर भी उन्होंने शहर में व्याप्त भय और आपसी नफ़रत के माहौल में भाग लिया. कई हिन्दुओं और सिखों ने ख़ुद को ‘स्व’ और ‘अन्य’ की छवियों का निर्माण करते हुए पाया, जिनमें से अनुभव की विषयप‌‌रकता को अफ़वाहों के माध्यम से हटा दिया गया था. नफ़रत के इस उत्पादन और प्रसार में, अपराधी और पीड़ित की छवियाँ अक्सर उस परिप्रेक्ष्य के आधार पर उलट जाती थीं, जहाँ से दर्दनाक घटनाओं और रोज़मर्रा की हिंसा की यादें देखी और ताज़ा की जाती थीं. अब तक के हिंसा के अनुभव के आश्चर्यजनक उलटफेर में, घबराहट-भरी अफ़वाहों ने एक तरह का दृश्यपट बनाया जिसमें हमलावर ख़ुद की पहचान करने लगे और यहाँ तक कि ख़ुद को पीड़ित के रूप में अनुभव करने लगे.
अफ़वाहों के आधार पर बड़े पैमाने पर छवि निर्माण का कार्य सूचना माध्यमों द्वारा भी किया जाता है; जैसे अस्सी के दौर में मीडिया ने सिखों की छवि आतंकवादी के रूप में निर्मित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. उनके लिए मुट्ठी-भर आतंकवादियों और आम सिख नागरिकों में कोई भेद नहीं रह गया था. इसी तरह गुजरात दंगों के दौरान नफ़रत फैलाने, छवि निर्माण करने तथा विभाजित मानसिकता का निर्माण करने में स्थानीय मीडिया की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता.

उत्पीड़न का यही भाव किसी समुदाय को मूलभूत सुविधाओं या नागरिक अधिकारों से वंचित करने में भी काम आता है. हिंसा का यह एक नया प्रकार है जिसमें ‘अन्य’ को नागरिक सुविधाओं से वंचित करके मरने के लिए छोड़ दिया जाता है. अनिल यादव की कहानी ‘दंगा भेजियो मौला’ को इस सन्दर्भ में देखा जा सकता है. कहानी मुसलमान बुनकरों की एक बस्ती मोमिनपुरा की है जो शहर के निचले हिस्से में बसी हुई है. बस्ती में हर साल बरसात के मौसम में पानी भर जाता, करंट के डर से पूरी बस्ती की बिजली काट दी जाती और शहर-भर की सीवर लाइनों का पानी भी मोमिनपुरा की तरफ़ ही खोल दिया जाता. बाढ़ की समाप्ति के बाद बीमारियों का फैलना आम बात है. लेकिन इस बार डेढ़ महीने बाद भी बस्ती से पानी निकासी का कोई इन्तज़ाम नहीं किया गया, क्योंकि दूसरी तरफ़ के हिस्से में ‘चतुर्मास में साधु-सन्तों के प्रवचन, मन्दिरों में देवताओं के शृंगार उत्सव, कजरी के दंगल आयोजित होते और हरितालिका तीज पर मारवाड़िनों के भव्य जुलूस निकलते हैं, इसलिए मोमिनपुरा को पवित्र शहर का कमोड बना दिया जाता.’ घरों की छतें पानी के दबाव से टूट रही हैं. लोगों की लाशें पानी में तैर रही हैं लेकिन किसी भी नेता तथा पत्रकार ने निवासियों की कोई सुध नहीं ली. लेकिन इस साल बहुत कुछ नया हुआ—

इस साल कई और नये अपशकुन हुए. मल्लाहों ने नावें देने से मना कर दिया, उनका कहना था कि जिस नाव से भगवान राम को पार उतारा था उसे भला गू-मूत में कैसे चला सकते हैं. म्यूनिसिपैलिटी ने इस साल पानी निकासी के लिए एक पम्प नहीं लगाया, अफ़सरों ने लिखकर दे दिया सारे पम्प ख़राब हैं, मरम्मत के लिए पैसा नहीं है, सरकार पैसा भेजेगी तो पानी निकाला जाएगा. लोक निर्माण विभाग ने घोषित कर दिया कि हाईवे की पुलिया से हर साल की तरह अगर पानी की निकासी की गई तो जर्जर सड़क टूट सकती है और शहर का सम्पर्क बाक़ी जगहों से कट सकता है. आपदा राहत विभाग ने ऐलान कर दिया कि यह बाढ़ नहीं मामूली जलभराव है, इसलिए कुछ करने का प्रश्न ही नहीं पैदा होता. अस्पतालों ने मोमिनपुरा के मरीज़ों को भर्ती करने से मना कर दिया कि जगह नहीं है और संक्रमण से पूरे शहर में महामारी का ख़तरा है.

यहाँ बिना किसी ऐलान या शोर-शराबे के एक पूरे नागरिक समाज को मरने के लिए छोड़ दिया जाता है क्योंकि वह एक मुसलमान बस्ती है. यानी बहुसंख्यक साम्प्रदायिक राजनीति में जो ‘अन्य’ है वह नागरिक तो दूर मनुष्य की श्रेणी में भी रखने लायक़ नहीं होता. पहचान की जिस वर्चस्ववादी राजनीति का हम हिस्सा बनते जा रहे हैं वहाँ सरकारें ऐसी ‘बस्तियों’ से ही छुटकारा पाना चाहती हैं. तभी तो—

सरकार ने अफ़सरों को इधर आने से मना कर दिया है…डॉक्टरों ने इलाज से मुँह फेर लिया है. जो पम्प यहाँ लगने चाहिए उन्हें नदी में लगाकर पानी इधर फेंका जा रहा है. करघे सड़ चुके, घर ढह रहे हैं, बच्चे चूहों की तरह डूबकर मर रहे हैं. सबको इसी तरह बिना एक भी गोली-छुरा चलाए मार डाला जाएगा. जो बेघर-बेरोज़गार बचेंगे, वे बीमार होकर लाइलाज मरेंगे.

संरचनात्मक हिंसा ऐसी ही होती है. बहुत व्यवस्थित ढंग से पुलिस और प्रशासन के गठजोड़ से चुपचाप इसको अंजाम दिया जाता है. लेकिन राज्य के संरक्षण और मार्गदर्शन में हुई इस हिंसा का ज़िक्र प्रायः इतिहासों में नहीं मिलता या इतिहास-लेखन में छिपा लिया जाता है. औपनिवेशिक इतिहासकारों से लेकर बाद में लिखे इतिहास भी इसी पद्धति का अनुसरण करते हैं. ज्ञानेन्द्र पांडेय के अनुसार—

इतिहास-लेखन राज्य की हिंसा को अलग ही कैटेगरी में रखता है. ज़्यादातर जायज़ मान ली जाने वाली इस हिंसा को ‘युद्ध, पुलिस-कार्यवाही, आतंकवादी कार्यवाही’ जैसे विशेष शब्दों में व्यक्त किया जाता है. असल में लिखित इतिहास के बड़े हिस्से में, जो उन्नीसवीं सदी के औपनिवेशिक और शासक वर्गीय वृत्तान्तों की तर्ज़ पर है, राज्य की हिंसा को हिंसा माना ही नहीं जाता….लेखन में राज्य की हिंसा आधिकारिक रूप से ग़ायब रहती है और जनता की हिंसा इसके ठीक उलट समझी जाती है.

लेकिन जनता की स्मृतियों में यह हिंसा सदियों तक दर्ज रहती है. आज बहुसंख्यक राजनीति के नाम पर ‘अन्य’ नागरिकों को हिंसात्मक रूप से हाशिये पर डालने की यह प्रक्रिया चरम पर है. लेकिन जो लोग इसे वर्तमान सरकार के अस्तित्व में आने से जोड़कर देख रहे हैं वह भूल जाते हैं कि राज्य की भूमिका और हिन्दुवादी राजनीति के गठजोड़ का यह आग़ाज़ सन चौरासी में ही हो गया था. पुलिस, प्रशासन की मदद से न सिर्फ़ इस नरसंहार को अंजाम दिया गया बल्कि संचार माध्यमों के माध्यम से ऐसी छवि निर्मित की गई कि नागरिक समाज के आह्वान पर भी अस्पतालों में डॉक्टरों ने घायल सिखों का इलाज करने से मना कर दिया था. और तीन दिन के भीतर ही रिलीफ़ कैम्पों को बन्द करने की योजना बना डाली थी. Concerned citizen tribunal—गुजरात 2002 में दर्ज एक प्रत्यक्षदर्शी के वयान के अनुसार सोला सिविल अस्पताल में उपस्थित कुछ नेता डॉक्टरों को बता रहे थे कि उन्हें किसका इलाज करना है और किसका नहीं.

व्यक्ति या समुदाय अपनी बहुत सारी पहचानों में से समय और स्थान के हिसाब से एक का चयन करता रहता है. लेकिन समस्या यह है कि वह ‘अन्य’ को चयन की यह स्वतंत्रता नहीं देना चाहता क्योंकि उसे एक ख़ास पहचान में संकुचित करके ही तो उसने अपनी विशिष्ट पहचान को निर्मित किया है. संकट के क्षणों या तनाव के क्षणों में ‘अन्य’ की यही संकुचित धार्मिक या जातिगत पहचान उसके साथ हिंसा का कारण बनती है. उसकी अन्य साझा पहचानें ‘गड़रिया’ के दाऊ जी की तरह हमेशा के लिए ख़त्म कर दी जाती हैं. ऐसा सिर्फ़ सैंतालीस में ही नहीं हुआ, आज़ाद भारत में दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी पढ़ाने वाले एक सिख अध्यापक की स्थिति भी दाऊ जी से भिन्न नहीं रही—

16-17 साल मैंने कॉलेज और यूनिवर्सिटी में हिन्दी पढ़ाई थी. मेरे अधिकतर विद्यार्थी हिंदू थे और उन्हें अपने प्रति और हिंदू संस्कृति के प्रति मेरे प्रेम का पता था. पता ही नहीं, इस बारे में दृढ़ विश्वास भी था. पर बुरे समय में मेरे पास कोई भी नहीं था.

इस सारे विमर्श की विडम्बना यह है कि हम तो यह तय कर लेते हैं या इतिहास-बोध आदि के नाम पर तय करवा देते हैं कि हमारी पहचान क्या होगी; लेकिन त्रासदी तब होती है जब ‘अन्य’ की पहचान को भी हम ही तय करने लगते हैं. भले ही ‘अन्य’ अपने को उस पहचान में न देखता हो. पर दूसरे को हम इसी तरह से पहचानों में क़ैद कर देते हैं.

(साभार: राजकमल प्रकाशन)