लेखकों की अलमारी से: कौन-सी किताबों ने ममता कालिया का मन मोहा…

'लेखकों की अलमारी से' के इस अंक में वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया अपनी ‘अलमारी’ खोलते हुए बताती हैं कि वर्ष 2025 में किन-किन पुस्तकों ने उन्हें सबसे अधिक प्रभावित किया. आत्मकथा, संस्मरण, उपन्यास, कहानी और कविता के ज़रिये वे समकालीन हिंदी और अंग्रेज़ी साहित्य की रचनात्मक यात्रा पर रोशनी डालती हैं.

(इलस्ट्रेशन: द वायर हिंदी)

नए साल के आंगन में खड़े होकर हमारे समय के लेखकों और चिंतकों ने अपनी अलमारी से पिछले साल क्या सब पढ़ा, इसकी चर्चा हम कर रहे हैं अपनी साहित्यिक शृंखला ‘लेखकों की अलमारी से’ की दूसरी क़िस्त में. लेखक जो स्वयं लिखते हैं, वह किन्हें पढ़ते हैं, सराहते हैं, एक अच्छा ज़रिया है न केवल प्रचलित पुस्तकों की समीक्षा का बल्कि उन रचनाओं को भी जानने का जो प्रसिद्धि से दूर रहकर भी कुछ मानीखेज़ कह जाती हैं. इस अंक में वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया की अलमारी पर एक नज़र:

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ममता कालिया. (फोटो: फेसबुक)

साल 2025 में वैसे तो मैंने बहुत सारी किताबें पढ़ीं, पर सबसे अधिक प्रभावित मैं अरुंधति रॉय की आत्मकथा ‘मदर मैरी कम्स टू मी‘ से हुई. यह देखने और सोचने वाली बात है कि कैसे इतने सलीक़े से अरुंधति अपनी मां के विषय में लिखती हैं कि आलोचक बनते-बनते प्रशंसक बन जाती हैं. हम सब कहीं-न-कहीं अपने माता-पिता की खूबियों और ख़ामियों को जानते हैं. मैंने बहुत एन्जॉय की यह किताब.

अंग्रेजी की ही मैंने फिर उसी समय एक और किताब पढ़ी थी, जैरी पिंटो की, ‘द एजुकेशन ऑफ यूरी‘, बाद में उनकी एक और मनोरंजक-सी किताब पढ़ी, जिसका नाम था, मर्डर इन माहिम. ये दोनों मुझे बहुत अच्छी लगी थीं.

(सभी आवरण साभार: संबंधित प्रकाशन)

जहां तक हिंदी पुस्तकों की बात है, मैं कहूंगी कि वर्ष बीत गया, लेकिन अभी तक मुझे अखिलेश की पुस्तक ‘अक्स’ बहुत याद आती है. इस किताब में समय का, समाज का, साहित्यकारों का इतना अनूठा वर्णन है. इसे पढ़कर यह लगा कि आज संस्मरण जो है वो कहानी विधा के ऊपर हावी हो गई है. संस्मरण इतने अच्छे लिखे जा रहे हैं, उनमें आपको जीवन का इतना प्रवेश मिलता है कि आप आसानी से कहानी के ताने-बाने से निकलकर ज़्यादा तवज्जो संस्मरण को देते हैं.

संस्मरण की बात चली तो एक और बहुत अच्छा संस्मरण, मैंने जो पढ़ा, वो था कर्मेंदु शिशिर का संस्मरणात्मक उपन्यास, ‘बहुत लंबी राह‘, जो ग्रामीण जीवन के बारे में है. उनका एक कहानी संग्रह ‘लौटेगा नहीं जीवन‘ भी ग्रामीण जीवन पर आधारित है. दोनों किताबें अद्भुत हैं. कर्मेंदु बहुत कम लिखते हैं, बहुत धीमे-धीमे लिखते हैं. उन्होंने हर कहानी के साथ उसके लिखने की तिथि भी दी है कि कौन से सन में छपी थी, जो यह दिखलाता है कि वो इतने अनुशासित हैं कि उन्हें याद रह जाता है कि कौन-सी कहानी कब लिखी. हम लोग तो सब भूल जाते हैं कि किस समय कौन सी लिखी.

उन्होंने कथा में जो ग्रामीण शब्दों का इस्तेमाल किया है, वो बहुत अच्छा लगा, क्योंकि हमारे लिए कई शब्द एकदम नए हैं. जैसे शुक्र तारे को शुकवा कहना या इसी तरह एक पात्र का नाम लोटन रखना या एक शब्द उन्होंने प्रयोग किया है- चींगड़ा. मैंने उनसे पूछा कि इसका मतलब क्या होता है तो उन्होंने कहा जिन छोटे बच्चों से बड़े लोग अपराध करवाते हैं उनको चींगड़ा कहते हैं. तो यह सब कुछ नई-नई बातें जब पता चलती हैं तो कोई किताब हमारे लिए ज़्यादा मूल्यवान हो जाती है.

अम्बर पाण्डेय का उपन्यास ‘मतलब हिंदू‘ भी मुझे बहुत अच्छा लगा. उन्होंने धीरे-धीरे बहुत वर्ष लगाकर यह उपन्यास लिखा है और इसकी ख़ास बात यह है कि इसमें उन्होंने महात्मा गांधी को महात्मा की तरह नहीं, एक सामान्य मनुष्य की तरह चित्रित किया है और यह बताया कि बैरिस्टरी में उनको कितना अपनी आत्मा को दबाना पड़ता था. वो वकालत का काम पसंद नहीं करते थे. तो इसमें जो सार है, वह यह कि महात्मा गांधी उन्हीं सारी भावनाओं से बने हुए थे जिनसे हम बने हुए हैं. लेकिन वो अपने ऊपर अनुशासन रखते थे और निजी जीवन के बजाय, देश की चिंता करते थे.

महात्मा गांधी उस समय, जब वह केवल मोहनदास करमचंद गांधी थे, उस समय भी वो लगातार चिंता करते थे कि उनके आस-पास कहीं कोई दुख न हो. मुख्यतया, वो एक बहुत अच्छे मनुष्य थे. इस उपन्यास में अम्बर ने गुजराती, मालवी, मराठी इन सारे शब्दों का गुम्फन किया है. बीच-बीच में उन्होंने अफीम के बारे में भी लिखा है कि कैसे मोहनदास इस चक्कर में पड़ जाते हैं, कहीं अफीम की तस्करी होती है, किस तरह वह चीनी तस्करों के प्रपंच से निकल कर आते हैं, तो इन वर्णनों ने इस उपन्यास को एकदम प्रामाणिक बनाया है. इस उपन्यास को पढ़ते हुए लगता है जैसे कोई बहुत बड़ी भारतीय ट्रेजेडी आपके सामने खुल रही है.

इसके अलावा एक और किताब जो मैंने पढ़ी, वह थी वर्तुल सिंह की ‘बनारस.’ इसमें इतनी प्यारी चीज़ है कि शुरू में वह एक संस्कृत का श्लोक देते हैं, जिससे न केवल हम संस्कृत सीख लेते हैं बल्कि हमें यह पता चलता है कि कितनी गूढ़ बातें हमारी प्राचीन भाषा में पहले ही कही जा चुकी हैं. हम, जो अपने को बहुत अफ़लातून समझते हैं, उन्हें यह पता लगता है कि कहीं-न-कहीं ये सारी बातें पहले ही कही जा चुकी हैं. जैसे एक जगह एक श्लोक में वह कहते हैं कि सनातन धर्म उस कंदुक (गेंद) की तरह है जो बार-बार उछलता है और बार-बार नीचे आता है और फिर ऊपर उठ जाता है. बनारस इसमें एक प्राचीन नगर की तरह, एक प्राचीन सभ्यता की तरह भी आता है और एक आधुनिक होते हुए नगर की तरह भी.

कुणाल सिंह की ‘अन्य कहानियां तथा झूठ‘ कहानी संग्रह भी बहुत अच्छा लगा. यह शीर्षक अपने आप में अनूठा है क्योंकि प्रायः इससे उलट होता है जहां अन्य कहानियां को बाद में लगाते हैं. इस पुस्तक को रवींद्र कालिया स्मृति सम्मान भी मिल चुका है और इसमें उनकी वो कहानियां हैं जो बहुत ही प्रयोगात्मक है और साथ-ही-साथ वह कभी भी मानव सरोकारों का दामन नहीं छोड़ती हैं.

और कितनी कहानियां उसमें ऐसी हैं जिसमें लेखक अपनी खुद ही की आलोचना कर रहा है. वो बता रहा है कि मनुष्य कितना भ्रष्ट भी हो सकता है, मनुष्य झूठ भी बोल सकता है, दोस्ती का दंभ भर कर भी दोस्त की ही बहन के ऊपर बुरी नज़र भी रख सकता है. यानी, वो सारी मानवीय बातें जो हम सबके साथ कभी-ना-कभी घटित होती हैं. बातें जिन्हें हम छुपा ले जाते हैं, उनको ये कहानी उजागर करती हैं.

इसी तरह एक ‘साइकिल’ कहानी है, जिसमें एक अधेड़ औरत है लेकिन वो एक जवान लड़के को पसन्द करती है और पूरी-की-पूरी कहानी साइकिल चलाने के दौरान चित्रित की गई है. कुणाल सिंह की सारी कहानियां मौलिक विषयों पर मौलिक प्रयोग करती हुई कहानियां हैं और मौलिक विषयों पर जब कोई नई बात कहता है तो मुझे बहुत अच्छा लगता है क्योंकि वह नए तरीक़े से कहता है.

इसी प्रकार वंदना राग का नया उपन्यास ‘सरक फंदा’ भी मुझे पसंद आया. आपको मैं बताऊं कि यह उपन्यास इस कदर दिलचस्प तरीक़े से लिखा गया है कि यह बिल्कुल उनके पहले उपन्यास ‘बिसात पर जुगनू‘ का उलट है. बिसात पर जुगनू भी बहुत अच्छा था, लेकिन उसमें इतिहास का पुट ज़्यादा था. लेकिन इसमें जो उन्होंने कहानी दी है, उसमें भी आज़ादी की लड़ाई आती है, पर उसमें कुछ बातें इतनी दिलचस्प हैं मसलन कि कैसे उनकी मां पंडित नेहरू के व्यक्तित्व से इतना अधिक आकर्षित थीं कि जब शादी की रात उनके पति ने उनसे पूछा कि क्या तुम किसी और पुरुष को भी जानती हो तो उसने कहा, ‘हां, मैं पंडित नेहरू को जानती हूं और कैसे एक बार मैं जब भीड़ में खड़ी हुई थी तो उन्होंने हाथ हिलाया था और वो मेरी तरफ़ देख रहे थे’.

ये एक इतनी मासूम-सी बात है जैसे जो कोई पन्द्रह-सोलह साल की लड़की किसी से आकृष्ट हो जाए सिर्फ इस बात से कि अपार भीड़ के लिए हाथ हिलाता हुआ नेता, उसे लगता है मानो केवल उसके लिए ही हाथ हिला रहा हो.

गीताश्री की कहानियां तो वैसे ही छपती रहती हैं और हिंदी की प्रायः सभी पत्रिकाओं में उनकी कहानियां मिल जाती हैं. लेकिन कहानी संग्रह ग्यारह कहानियां, जो संजना प्रकाशन से निकली हैं, बिल्कुल अलग मिज़ाज लगीं. मैंने पहले पढ़ीं थी ये कहानियां, लेकिन फिर पढ़ रही हूं उनको. इसमें उनकी सब मज़ेदार कहानियां संकलित हैं- मसलन, मत्स्यगंधा, अफसानाबाज़ इत्यादि.

उनकी कहानियों की ख़ास बात यह होती है कि चूंकि वो पत्रकार भी रही हैं इसलिए लेखन और पत्रकारिता को मिला देती हैं और इसी कारण उनकी कहानी कभी भी भारी नहीं पड़तीं. पढ़ने में वो कहानियां जुड़ी रहती हैं- महानगरीय वर्तमान से भी जुड़ी रहती हैं और साथ-ही-साथ वो गांव के भी बड़े आत्मीय चित्र देती हैं.

पिछले साल पढ़ते हुए एक और किताब जो मुझे बहुत अच्छी लगी और जिसे मैं ख़ासतौर से रेखांकित करना चाहती हूं, वो है अनिरूद्ध उमट की लिखी हुई- ‘शाह संगत‘. ये भी एक तरह से संस्मरण है. संस्मरण न कहकर आप ये कह सकते हैं कि ये एक जीवन का वृतांत है और इसमें जो सबसे अच्छी बात है वो ये है कि इसमें एक युवा लेखक ने अपनी कृतज्ञता बताई है, उस परिवार के प्रति जहां हर आदमी, हर सदस्य लेखक या कलाकार था, और वह सब उसके लेखक बनने की यात्रा को देख रहे थे.

रमेश चंद्र शाह हिंदी के बहुत प्रसिद्ध लेखक हैं. उनकी पत्नी ज्योत्स्ना मिलन भी लेखिका थीं और पूरा परिवार ही कला और साहित्य से जुड़ा था. तो उनके यहां जब उमट बहुत कम उम्र का था और जब पढ़ता था तो उनके घर जाता था, साथ रहता था. अनिरूद्ध उमट ने उन वर्षों की अपनी यादों को संस्मरण के तौर पर साझा किया है कि किस प्रकार वो उनके यहां जाकर लेखक बने हैं. क्योंकि वहां रहकर उनको इतनी ऊर्जा मिली और इतना मार्गनिर्देशन मिला कि एक लेखक को क्या लिखना चाहिए, क्या नहीं लिखना चाहिए कि वह एक लेखक बन सके. मेरी दृष्टि में ऐसी किताबें हिंदी में बहुत कम हैं.

मुझे लगता है कि हिंदी में कृतज्ञता धीरे-धीरे कम होती जा रही है. हम समकालीनों को तो पढ़ते रहते हैं, पर तत्कालीनों को भूल जाते हैं, जबकि हमारी नींव जो है, वह तत्कालीन से बनी है. आज भी जब कभी मुझे अपनी भाषा पर संदेह होता है तो मैं अज्ञेय जी को पढ़ती हूं. प्रेमचंद को बिना पढ़े आप कैसे आगे बढ़ सकते हैं? चाहे आप लाख विदेशी लेखक पढ़िए, मैं भी बहुत पढ़ती हूं विदेशी लेखकों को, लेकिन हम जब तक अपनी ज़मीन से नहीं जुड़ेंगे, अपनी भाषा से नहीं जुड़ेंगे, तब तक हम बहुत अच्छी तरह से अपने को व्यक्त नहीं कर पाएंगे. यह बहुत आवश्यक है.

कुछ कविता संग्रह जो मैंने इस साल पढ़े उसमें से स्मिता सिन्हा का रुंधे कंठ की अभ्यर्थना, अरुण कमल का रंगसाज की रसोई, आशुतोष दुबे का संयोगवश और सिर्फ वसंत नहीं, देवेश पथसारिया का नूह की नाव अच्छी लगीं.

मैं कविताएं बहुत पढ़ती हूं क्योंकि कविताओं से रस मिलता है, जीवन मिलता है और दृष्टि भी मिलती है. नए लोगों में मैं दिव्य प्रकाश दुबे और सत्य व्यास को भी पढ़ती हूं. मेरा मानना है कि हर तरह की रचनाएं पढ़नी चाहिए. सत्य व्यास की बागी बलिया मैंने पढ़ी, मुझे अच्छी लगी.

मनोज कुमार पाण्डेय भी बड़ी अच्छी कहानियां लिख रहे हैं. प्रतिरूप इनका नया संग्रह आया है. इनकी किताबें एकदम अलग क़िस्म की किताबें हैं. ये इतने बोल्ड लेखक हैं कि चिंता नहीं करते कि कल को इनको जेल हो जाएगी या नौकरी छूट जाएगी. मनोज कुमार पांडेय की खज़ाना, पानी इत्यादि कहानियां बहुत पसंद आईं. फिर चंदन पांडेय की भी बहुत अच्छी कहानियां हैं.

एक और अद्भुत किताब थी अशोक अग्रवाल की ‘लेखक की बरसाती‘. यह एक संस्मरण है. लेखक की बरसाती शीर्षक बेहद दिलचस्प है. बरसाती शब्द आया है, निर्मल वर्मा की उस बरसाती से जिसमें वह करोलबाग में रहते थे. वर्षों रहे हैं निर्मल अपनी उस बरसाती में. अशोक अग्रवाल जब युवा थे तो उनसे मिलने बरसाती में गए थे. निर्मल, बहुत थोड़ा-सा सामान रखते थे वहां. केवल चाय बनाने का सामान, उनकी किताबें और एक बिस्तर भर था. इतने बड़े लेखक और ऐसा सादा जीवन.

नीलाक्षी सिंह की एक किताब थी हुकुम देश का इक्का खोटा. उन्होंने अपनी आत्मकथा की तरह इसे लिखा है. लेकिन उन्होंने सबसे बड़ा काम यह किया है कि उसमें उन्होंने अपनी कोई करुण कथा नहीं लिखी. उसको उन्होंने हास्य और व्यंग्य में ढाल दिया है. नीलाक्षी बहुत कम लिखती हैं. पर इस किताब में सबसे बड़ी चीज़ यह थी कि उन्होंने कहीं करुणा को लेश मात्र नहीं आने दिया, जबकि वह अपनी बीमारी के बारे में बता रही हैं. बड़े कॉमिक अंदाज़ में नीलाक्षी बता रही होती हैं.

इसके अतिरिक्त प्रत्यक्षा का उपन्यास ‘शीशाघर‘ भी अच्छा लगा जहां वह विभाजन और बिखराव के बीच फैली प्रेम की स्मृतियों को दर्ज़ करती हैं.

(अदिति भारद्वाज से बातचीत पर आधारित)