जब रंगमंच सत्ता से टकराता है: भारतीय लोकतंत्र की आलोचनात्मक कथा है ‘मंच प्रवेश’

पुस्तक समीक्षा: ‘मंच प्रवेश: अलकाज़ी/पद्मसी परिवार की यादें’ रंगमंच के सत्ता से टकराने की भी कथा है, जिसे इब्राहीम अलक़ाज़ी के बेटे और एलेक पद्मसी के भांजे फ़ैसल अलक़ाज़ी ने लिखा है. अमितेश कुमार द्वारा अनूदित और राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक को भारतीय रंगमंच और सत्ता के रिश्तों के आलोचनात्मक इतिहास के रूप में पढ़ा जा सकता है.

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'भारतीय राज्य कला को हमेशा से संदेह की दृष्टि से देखता रहा है, ख़ासकर तब जब वह राजनीतिक प्रश्न उठाने लगे.' (साभार: राजकमल प्रकाशन)

फ़ैज़ल अलकाज़ी की ‘मंच प्रवेश: अलकाज़ी/पद्मसी परिवार की यादें‘ केवल रंगमंच से जुड़ी एक आत्मकथात्मक या संस्मरणात्मक किताब भर नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र के भीतर कला, सत्ता और समाज के जटिल रिश्तों की एक गंभीर आलोचनात्मक व्याख्या है. इस किताब के पन्नों में रंगमंच का इतिहास उसी तरह दर्ज़ है, जैसे किसी संवेदनशील सिस्मोग्राफ़ में समाज और राजनीति के भीतर चल रहे कंपन दर्ज़ होते हैं.

यहां रंगमंच किसी सुरक्षित सांस्कृतिक गतिविधि की तरह नहीं उभरता, बल्कि एक ऐसे जोखिमपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में सामने आता है जो बार-बार सत्ता को असहज करता है, उसके नैतिक दावों को चुनौती देता है और उसके लोकतांत्रिक मुखौटे के पीछे छिपे दमनकारी चेहरे को उजागर करता है. अलकाज़ी का लेखन हमें यह समझने का अवसर देता है कि भारत में कला और विशेषकर रंगमंच कभी भी सत्ता के समानांतर नहीं रहा बल्कि वह लगातार उससे टकराता रहा है, कभी प्रत्यक्ष रूप में, कभी रूपक और संकेतों के माध्यम से.

किताब की एक बड़ी पेशकश यह है कि वह भाषा को सत्ता और समाज के बीच एक संघर्षशील क्षेत्र के रूप में प्रस्तुत करती है. ग्रामीण समाज की बोलचाल, गालियां, देह से जुड़े संकेत और कामकाजी जीवन की खुरदरी शब्दावली, इन सबको अलकाज़ी किसी सांस्कृतिक अपराध की तरह नहीं देखते, बल्कि जीवन की स्वाभाविक अभिव्यक्ति के रूप में समझते हैं. वे यह स्पष्ट करते हैं कि जिस भाषा को सभ्य समाज अक्सर ‘अश्लील’ या ‘असभ्य’ कहकर ख़ारिज़ कर देता है, वही भाषा श्रमशील समाज की वास्तविक संवेदना को अभिव्यक्त करती है.

मंच पर इस भाषा का आना केवल सौंदर्य का प्रश्न नहीं, बल्कि सत्ता द्वारा निर्मित सांस्कृतिक शुद्धता की अवधारणा के विरुद्ध एक प्रतिरोध है. यह प्रतिरोध उस लोकतांत्रिक कल्पना को मजबूत करता है जिसमें जनता की भाषा, उसकी हंसी, उसका गुस्सा और उसकी पीड़ा बिना छंटनी के अभिव्यक्त हो सके. जैसे-जैसे किताब आगे बढ़ती है, पाठक सीधे सत्ता और रंगमंच के टकराव के क्षेत्र में प्रवेश करता है.

नाटक पर प्रतिबंध की आशंका या मधुर का वह फ़ोन जिसमें वह पूछता है कि ‘क्या सरकार ने प्रस्तुति पर प्रतिबंध लगा दिया है’ या फिर पुलिस की मौजूदगी, प्रेस पर नियंत्रण ये सभी दृश्य बताते हैं कि भारतीय राज्य कला को हमेशा से संदेह की दृष्टि से देखता रहा है, ख़ासकर तब जब वह राजनीतिक प्रश्न उठाने लगे.

एमएस जौहर के ‘भूटोटो’ और उससे विकसित नाट्य प्रस्तुति का प्रसंग यह स्पष्ट करता है कि सत्ता कला को केवल मनोरंजन के रूप में स्वीकार करती है, प्रश्न के रूप में नहीं. जैसे ही कला समकालीन राजनीति, हत्या, षड्यंत्र और सत्ता-संघर्ष को मंच पर लाती है, वह ‘संदिग्ध’ और ‘खतरनाक’ घोषित कर दी जाती है. यह व्यवहार केवल किसी एक सरकार या दल तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय राज्य की एक स्थायी प्रवृत्ति को उजागर करता है.

इंदिरा गांधी के आपातकाल के अनुभव इस किताब को एक तीखा राजनीतिक दस्तावेज़ बना देते हैं. आपातकाल को अक्सर प्रेस की स्वतंत्रता, विपक्ष की गिरफ्तारी और संवैधानिक अधिकारों के निलंबन के रूप में याद किया जाता है, लेकिन मंच प्रवेश यह दिखाती है कि सांस्कृतिक और कलात्मक स्वतंत्रता भी उसी तरह कुचली गई. पुलिस द्वारा नाटकों को रोकना, मंच पर हथकड़ी या आदेशात्मक भाषा को ‘राज्य-विरोधी संकेत’ मान लेना, कलाकारों को थाने बुलाना-ये सब घटनाएं बताती हैं कि सत्ता को सबसे अधिक डर प्रतीकों और कल्पनाओं से लगता है.

रंगमंच, जो कल्पना की सबसे सशक्त विधा है, आपातकाल में एक स्वाभाविक शत्रु बन गया. अलकाज़ी का यह कहना कि ‘हम उन लोगों में से नहीं थे जो बिना लड़े हथियार रख दें,’ इस पूरे दौर की नैतिक मुद्रा को परिभाषित करता है.

यहां रंगमंच केवल कला नहीं रह जाता, वह लोकतांत्रिक साहस का अभ्यास बन जाता है.

महत्वपूर्ण यह है कि इंदिरा गांधी के बाद सत्ता में आई जनता पार्टी भी इस किताब में किसी नैतिक विकल्प के रूप में उभरती नहीं दिखती. जनता पार्टी का उदय लोकतंत्र की पुनर्बहाली के प्रतीक के रूप में हुआ था लेकिन अलकाज़ी के अनुभव बताते हैं कि सत्ता का चरित्र मूलतः नहीं बदला. स्त्री-उत्पीड़न, पुलिसिया हिंसा और न्यायिक संवेदनहीनता के मामलों में जनता पार्टी सरकार भी उसी ढर्रे पर चलती दिखाई देती है. यह तथ्य भारतीय राजनीति की एक गहरी विडंबना को उजागर करता है. सत्ता बदलती है, सरकारें बदलती हैं, लेकिन राज्य की दमनकारी संरचनाएं जस की तस बनी रहती हैं. इस अर्थ में मंच प्रवेश किसी एक दल की आलोचना नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र की आलोचना है.

भारतीय रंगमंच के इतिहास को पहले कभी इस तरह से दर्ज नहीं किया गया है. (साभार: राजकमल प्रकाशन)

स्त्री-प्रतिरोध पर आधारित नाटकों का विवरण किताब को और अधिक राजनीतिक गहराई देता है. बलात्कार, हिरासत में हिंसा, स्त्री की देह पर राज्य और समाज का नियंत्रण ये विषय केवल सामाजिक संवेदना के नहीं, बल्कि सत्ता के मूल चरित्र के प्रश्न हैं. जिस लड़की को पुलिस हिरासत में बलात्कार का शिकार होना पड़ता है और बाद में उसी पर चरित्रहीन होने का आरोप लगाया जाता है, वह घटना भारतीय राज्य की नैतिक विफलता का प्रतीक बन जाती है.

यहां रंगमंच न्यायालय की तरह नहीं, बल्कि नैतिक विवेक की तरह काम करता है. मंच पर प्रस्तुत ये कहानियां दर्शकों को मजबूर करती हैं कि वे कानून, पुलिस और समाज की भूमिका पर पुनर्विचार करें. राजीव गांधी के दौर का संदर्भ इस आलोचना को और जटिल बनाता है. एक ओर आधुनिकता, तकनीक और युवा नेतृत्व की बात, दूसरी ओर शाहबानो जैसे मामलों में राजनीतिक समझौते और स्त्री अधिकारों से पीछे हटना. यही द्वंद्व राजीव गांधी युग की पहचान बनता है.

अलकाज़ी के अनुभव बताते हैं कि इस दौर में सेंसरशिप अधिक परिष्कृत हो गई थी. प्रत्यक्ष दमन की जगह नैतिकता, शालीनता और सामाजिक सौहार्द के नाम पर असहमति को सीमित किया जाने लगा. यह सत्ता का अधिक खतरनाक रूप था क्योंकि वह स्वयं को उदार दिखाते हुए आलोचना को निष्प्रभावी कर देता था. रंगमंच के लिए यह दौर विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण था क्योंकि विरोध के स्पष्ट दुश्मन कम और अदृश्य अवरोध अधिक थे.

किताब में विदेशी नाटकों और वैश्विक संदर्भों का उल्लेख यह स्पष्ट करता है कि सत्ता की हिंसा और स्त्री-उत्पीड़न कोई स्थानीय अपवाद नहीं बल्कि एक वैश्विक संरचनात्मक समस्या है. लेकिन भारतीय संदर्भ में यह समस्या और जटिल हो जाती है क्योंकि यहां लोकतंत्र, परंपरा और नैतिकता के नाम पर दमन को वैधता मिल जाती है. समीक्षित किताब यह दिखाती है कि रंगमंच इन वैधताओं को चुनौती देने का एक दुर्लभ माध्यम है क्योंकि वह भावनाओं, प्रतीकों और प्रत्यक्ष अनुभवों के स्तर पर हस्तक्षेप करता है.

आज के राजनीतिक परिदृश्य से जब इन अनुभवों को जोड़कर देखा जाता है, तो पुस्तक और अधिक प्रासंगिक हो जाती है.

आज सत्ता को कला से डराने के लिए सीधे प्रतिबंध लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ती. सोशल मीडिया, ट्रोल संस्कृति, भीड़ की नैतिकता और राष्ट्रवाद की आक्रामक भाषा ये सब नए औज़ार बन चुके हैं. पहले पुलिस थिएटर के बाहर खड़ी होती थी, आज डिजिटल भीड़ कलाकार के घर तक पहुंच जाती है. पहले नाटक रोके जाते थे, आज कलाकारों की छवि नष्ट की जाती है. इस संदर्भ में मंच प्रवेश हमें यह समझने में मदद करती है कि दमन के रूप बदलते हैं लेकिन उसकी आत्मा वही रहती है.

समग्र रूप से देखा जाए तो मंच प्रवेश भारतीय रंगमंच का इतिहास नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र का आलोचनात्मक इतिहास है. यह किताब दिखाती है कि कला और सत्ता के बीच संबंध कभी सहज नहीं रहे. रंगमंच हमेशा सवाल करता रहा है और सत्ता हमेशा उसे नियंत्रित करने की कोशिश करती रही है.

इंदिरा गांधी हों, जनता पार्टी हो, राजीव गांधी हों या आज के नेता-इस निरंतरता में अंतर केवल शैली का है, मंशा का नहीं. अलकाज़ी का लेखन इस निरंतरता को उजागर करता है और पाठक को यह सोचने पर मजबूर करता है कि लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा सत्ता परिवर्तन में नहीं, बल्कि असहमति को सहने की क्षमता में होती है. ऐसी ही एक कविता जो इस किताब को एक रोचक राजनीतिक कहानी के रूप में तब्दील कर देती है.

अंततः मंच प्रवेश हमें यह सिखाती है कि रंगमंच केवल मंच पर नहीं होता; वह समाज के भीतर, राजनीति के बीच और नागरिक चेतना के केंद्र में घटित होता है. यह किताब उस साहस की कथा है जो कलाकार को अपने समय के सबसे असुविधाजनक प्रश्न पूछने की शक्ति देता है. यही कारण है कि यह समीक्षा केवल साहित्यिक नहीं रह जाती, बल्कि गहराई से राजनीतिक हो जाती है. मंच प्रवेश भारतीय समाज को उसका ही प्रतिबिंब दिखाने वाला दर्पण है; एक ऐसा दर्पण, जिसे सत्ता बार-बार तोड़ना चाहती है लेकिन जो हर बार किसी नए मंच पर, किसी नई आवाज़ के साथ, फिर से खड़ा हो जाता है.

रही बात किताब के अनुवाद की तो वह अपनी सहजता, प्रवाह और रंगमंचीय संवेदनशीलता के कारण एक साधारण भाषांतरण नहीं, बल्कि एक सृजनात्मक पुनर्लेखन जैसा प्रतीत होता है. जिस तरह मूल पुस्तक मंचन को केवल एक घटना के रूप में नहीं, बल्कि उसके पहले, बीच और बाद के समूचे अनुभव रिहर्सल, भय, उत्साह, टकराव और स्मृतियों के साथ दृश्यमान बनाती है, उसी तरह अनुवाद की भाषा भी पाठक को लगातार एक सक्रिय स्थिति में बनाए रखती है. यह भाषा केवल सूचना नहीं देती, बल्कि अनुभूति रचती है.

अनुवादक ने ऐसे शब्दों और वाक्य-रचनाओं का चुनाव किया है जो रंगमंच की जीवंतता को बनाए रखते हैं. संवादों में बोलचाल की स्वाभाविक लय, वर्णनों में दृश्यात्मक स्पष्टता और स्मृतियों में भावनात्मक ताप इन सबका संतुलन पाठक को कभी मंच पर खड़े अभिनेता की तरह बेचैन करता है और कभी अंधेरे सभागार में बैठे दर्शक की तरह सजग.

यही कारण है कि पुस्तक पढ़ते समय पाठक केवल पढ़ नहीं रहा होता, बल्कि मंचीय क्षणों को जी रहा होता है. भाषा की रोचकता इस बात से भी आती है कि अनुवाद कहीं भी बोझिल या कृत्रिम नहीं होता. रंगमंच से जुड़े तकनीकी शब्द, राजनीतिक संदर्भ और निजी अनुभव तीनों को एक ऐसी सहज हिंदी में पिरोया गया है जो न तो अकादमिक दूरी पैदा करती है और न ही अर्थ की गहराई को कम होने देती है. कई स्थानों पर भाषा में हल्की आत्मीयता और अनौपचारिकता है, जो लेखक की आवाज़ को पाठक के बहुत क़रीब ले आती है. यह निकटता ही पाठक को मंच का हिस्सा बनने का अहसास कराती है.

कुल मिलाकर, यह अनुवाद किताब की आत्मा के प्रति ईमानदार रहते हुए उसे एक पाठकीय अनुभव में बदल देता है. यहां भाषा केवल माध्यम नहीं, बल्कि मंच की रोशनी की तरह काम करती है जो कभी अभिनेता पर पड़ती है, कभी दर्शक पर, और कभी पूरे रंगमंच को एक साथ उजागर कर देती है. इसी वजह से यह पुस्तक न केवल पढ़ी जाती है, बल्कि महसूस की जाती है.

(डॉ. प्रांजल सिंह, ज़ाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज में राजनीति विज्ञान के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं.)