‘पहले तो अकाल में खूब परेशान होते थे, बाद में धीरे-धीरे फेमन लगने लगा तो लोगों को कमी के समय में भी बाहर नहीं भटकना पड़ा.’
राजस्थान के धीरवास बड़ा गांव के एक बुजुर्ग का यह कहना, अकाल जैसी भीषण परिस्थितियों में अकाल राहत योजनाओं और मनरेगा के महत्व को प्रकट करता है. मगर, गौर करने लायक बात यह हैं इन इलाकों में मनरेगा को आज भी फेमन (अकाल राहत योजनाओं के लिए स्थानीय शब्द) और नरेगा (मनरेगा का शुरुआती नाम) के नाम से जाना जाता है, क्योंकि लोगों की रुचि योजना या कानून के नाम से ज्यादा उसका समुचित ढंग से लाभ उठाने में रही हैं.
पर, अबकी बार मनरेगा का नाम ही नही बदला गया है, बल्कि बहुत सारे ऐसे परिवर्तन किए गए हैं, जिन पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक हो जाता है.
महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून, 2005 (मनरेगा) को विकसित भारत- गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) कानून, 2025 द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया गया है. दोनों कानूनों में अंतर शुरुआत से देखा जा सकता है.
मनरेगा की शुरुआत जहां ‘देश के ग्रामीण क्षेत्रों में गृहस्थियों की आजीविका की सुरक्षा हेतु… ‘ से होती थी, वहीं इस नए कानून की शुरुआत इन पंक्तियों से होती हैं – ‘विकसित भारत के राष्ट्रीय दृष्टिकोण (2047) के अनुरूप ग्रामीण विकास ढांचा स्थापित करने हेतु अधिनियम.’
यह शुरुआत इसलिए विशेष हैं क्योंकि इसमें विकसित भारत का जिक्र किया गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर मंच से विकसित भारत का GYAN मंत्र दोहराते हैं, जिसमे पहली प्राथमिकता में – गरीब (G), युवा (Y), अन्नदाता(A),नारी (N) सम्मिलित हैं. इसलिए, इस कानून का प्रारूप, मनरेगा से भिन्नता एवं इन चारो वर्गों पर संभावित प्रभाव जानना आवश्यक हैं.
पूर्ववर्ती मनरेगा में जहां काम करने को इच्छुक अकुशल-श्रमिक को मांग के आधार पर एक साल में न्यूनतम 100 दिन का कार्य उपलब्ध करवाने का प्रावधान था, वहीं इस कानून में वो दिन बढ़ाकर 125 कर दिए गए हैं. मगर इसमें दो परिवर्तन किए गए हैं – पहला, यह कार्य सिर्फ केंद्र सरकार द्वारा चिह्नित क्षेत्रों में ही उपलब्ध करवाया जाएगा. यह मनरेगा के ‘ग्रामीण सार्वभौमिकता’ के गुण के विपरीत है.
दूसरा, इसी एक्ट में राज्य सरकारों को निर्देशित किया गया हैं कि साल में वो 60 दिन ध्यान में लाए, जिस दौरान कृषि कार्य चरम पर रहता हो, ताकि उस अवधि में चल रहे कार्यों को बंद किया जा सके. इस नियम-बदलाव के पीछे कृषि कार्यों हेतु पर्याप्त मजदूर उपलब्ध करवाने का तर्क दिया गया है. ये परिवर्तन प्रथमदृष्टया उचित लग सकते हैं, मगर मनरेगा के ग्रामीण अनुभव तथा व्यापक प्रभावों पर विचार करते हुए इस कानूनी परिवर्तन की कमियां व समस्याएं समझ आती हैं.
ग्रामीण क्षेत्रों में मनरेगा ने व्यापक और सकारात्मक परिवर्तन किए. अकाल और तंगी के कारण सुदूर शहरों की ओर होने वाला पलायन बड़े पैमाने पर रुका. लोगों को जीवन-यापन के लिए सहजता से रोजगार उपलब्ध हुआ. कई क्षेत्रों मसलन- बाड़मेर (राजस्थान) के गांवों में 2011 में मनरेगा के कारण ‘रिवर्स-माइग्रेशन’ भी संभव हुआ. पलायन के संकट से निपटने के साथ ही मनरेगा ने ग्रामीण गरीबों के लिए बेहतर मजदूरी के अवसर भी पैदा किए. कम मजदूरी और ज्यादा काम के कारण शोषित होने वाले शोषित मजदूर मनरेगा के कारण अपनी मजदूरी की सही कीमत मांगने लायक बने. विभिन्न शोध भी मनरेगा एवं मजदूरी के परस्पर सकारात्मक संबंधों पर मोहर लगाई हैं.
अन्नदाता की परिभाषा में सिर्फ बड़े जमींदारों को शामिल करना, दलितों-मजदूरों के उस बड़े तबके का अपमान है, जो सही मायने में अनाज उपजाने के लिए दिन-रात पीसता है. मनरेगा ने इन्हें केवल रोजगार नही दिया बल्कि कृषि कार्यों के समय अपने श्रम का समुचित मोल-भाव करने लायक बनाया. इस प्रवृति ने ग्रामीण समुदाय में बराबरी, श्रम के सम्मान और आत्मचेतना के मूल्य प्रदान किए हैं. ऐसे में खेती के समय 60 दिनों के लिए कार्यों को रोक देना, दलित-मजदूरों के लिए पुनः शोषण के उन्ही दरवाजों को खोल देना हैं, जिन्हें बड़े यत्न से बंद किया गया था.
मनरेगा के कार्य निर्धारण में पंचायत की शीर्ष भूमिका, जन-उपयोगी कार्य एवं मजदूरी के सही-बंटवारे ने सोशल ऑडिट की प्रक्रिया से युवा एक्टिविस्टों एवं नए राजनीतिक चेहरों को जन्म दिया. मगर नए कानून में ‘नीचे से ऊपर’ की लोकतांत्रिक व्यवस्था की बजाय ‘ऊपर से नीचे’ की ब्यूरोक्रेटिक प्रक्रिया दिखाई पड़ती है.
महिलाओं का संबल
कृषि-मजदूरी,पलायन और खेती में सबसे ज्यादा काम करते हुए भी अदृश्य दिखने वाली महिलाओं को मनरेगा ने संबल प्रदान किया. हर गांव में कई एकल-महिलाएं खोजी जा सकती हैं, जो अपना और अपने बच्चो का पालन-पोषण बिना किसी बाहरी ऋण के मनरेगा की बदौलत ससम्मान कर रही हैं. यह सिर्फ एकल-महिलाओं तक सीमित नही हैं, बल्कि मनरेगा ने महिलाओं को आत्म-सम्मान, आर्थिक मजबूती और सरकारी कामों की जागरूकता से लैस किया है.
मनरेगा में काम करने वाली 45 प्रतिशत महिलाएं ऐसी हैं, जो या तो काम नहीं करती थीं और करती थीं तो अपने ही खेतों में काम करती थीं. पिछले पांच वर्षों में महिलाओं की मनरेगा में भागीदारी पच्चास प्रतिशत से अधिक रही हैं. इस नए कानून में भी महिलाओं की भागीदारी एक तिहाई ही रखी गई हैं. महिलाओं को मिलने वाली बाकी रियायतों यथा – छह वर्ष से कम पांच बच्चे कार्य स्थल पर होने की स्थिति में एक महिला को देखभाल के लिए छूट देना आदि को किसी प्रकार से बेहतर करने की बजाय वैसा का वैसा ही रख दिया गया है.
इसके अलावा अगर आपदा प्रबंधन की दृष्टि से देखा जाए तो कोविड-19 की भयावह में मनरेगा की महत्वपूर्ण भूमिका को भूला नही जा सकता. अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय और दो अन्य संस्थाओं की भगीदारी में तीन राज्यों के बीस विकासखंडों हुए अध्ययन ने स्पष्ट रेखांकित किया था कि जवाबदेही और बजट की कमी के बावजूद भी श्रमिकों की आय की 20 से 80 प्रतिशत भागीदारी मनरेगा से हुई. ऐसे में सरकार को सीख लेते हुए इन सभी कमियों को दूर करना चाहिए था. यह प्रारूप बदलाव सरकार के पास एक ऐसा अवसर था, जहां मनरेगा में आ रही कमियों को दूर किया जा सकता था.
सही बदलाव का मौका छोड़ा
हालांकि बजट एक बड़ी समस्या रहा है. 2021 के संशोधित बजट को छोड़कर पिछले कई वर्षों में मनरेगा के बजट में गिरावट देखी गई है. अगर बजट को छोड़ भी दिया जाए तो ‘अत्यधिक डिजिटलीकरण’ भी एक बड़ा मुद्दा रहा है. सुदूर इलाकों में, जहां कॉल करने के लिए नेटवर्क की उपलब्धता नहीं है, वहां एक मेट के लिए काम शुरू होने से पहले और काम खत्म होने के बाद की फोटो नेशनल मोबाइल मॉनिटरिंग सिस्टम ऐप पर अपलोड कर पाना बहुत मुश्किल हो जाता है. इसमें कहीं न कहीं नागरिक-गरिमा का भी उल्लघंन होता ही है.
इस कानून में कई विरोधाभास साफ़ देखे जा सकते हैं. जिन कमियों में सुधार किया जाना था, उन्हें ज्यों का त्यों छोड़ दिया गया हैं और जिन नियमों को और मजबूत करना था, उन्हें कमजोर बना दिया हैं. इस तरह, एक तरफ वीबी-जी राम जी को विकसित भारत के लिए आवश्यक बताना एवं इसमें विकसित भारत के लिए सम्मान व ध्यान के अधिकारी – गरीब, युवा, अन्नदाता और नारी को अनदेखा करना कथनी-करनी के अंतर को प्रकट करता है.
(लेखक बेंगलुरु के अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में विद्यार्थी हैं.)
