‘लोकतंत्र’ की असली कसौटी है कि समाज का हर वर्ग, खासतौर पर वे लोग, जो ऐतिहासिक रूप से हाशिये पर रहे हैं, बराबरी के साथ उसमें शामिल हों. महिलाओं की भागीदारी इस कसौटी का सबसे अहम पैमाना मानी जाती है. हाल ही में हुए विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दूसरे चरण में इस कसौटी को सबसे ज्यादा धक्का अगर कहीं लगा है तो वह राज्य है – उत्तर प्रदेश.
एसआईआर के बाद उत्तर प्रदेश की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में महिलाओं का अनुपात (जेंडर अनुपात – हर 1000 पुरुषों के मुकाबले कितनी महिलाएं) 54 अंक गिरकर सिर्फ 822 रह गया है. आसान भाषा में कहें तो, यदि एसआईआर से पहेले का जेंडर अनुपात ही कायम रहता तो ड्राफ्ट लिस्ट में लगभग 37 लाख महिलाएं अधिक होती. यह एक ऐतिहासिक गिरावट है.
इसको इस तरह से समझिए – एक आदर्श वोटर लिस्ट वही मानी जाती है, जो सभी योग्य वयस्क मतदाताओं को वोटर लिस्ट में शामिल करे.
राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग के ‘रिपोर्ट ऑफ द टेक्निकल ग्रुप ऑफ पॉपुलेशन प्रोजेक्शन, 2020 के मुताबिक साल 2025 के अंत में उत्तर प्रदेश में वयस्क आबादी का जेंडर अनुपात लगभग 941 है, तो स्वाभाविक तौर पर 1000 पुरुषों के मुकाबले 941 महिलाएं ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में होनी चाहिए, लेकिन हकीकत यह है कि वोटर लिस्ट में जेंडर अनुपात हमेशा इससे कम दर्ज होता रहा है.
अब तक हुए प्रयास भले ही पर्याप्त नहीं थे, लेकिन दिशा सही थी और धीरे-धीरे सुधार दिख रहा था. इसी क्रम में एसआईआर शुरू होने से पहले, 27 अक्टूबर 2025 को वोटर लिस्ट का जेंडर अनुपात 876 तक पहुंच चुका था, लेकिन एसआईआर के बाद यह सुधार की दिशा पूरी तरह पलट गई.
एसआईआर से पहले उत्तर प्रदेश की वोटर लिस्ट में महिला मतदाताओं की संख्या 7.21 करोड़ और पुरुष मतदाताओं की संख्या 8.23 करोड़ थी. एसआईआर के दौरान 1.34 करोड़ पुरुषों के नाम कट जाने के बाद उनकी संख्या अब ड्राफ्ट लिस्ट में करीब 6.89 करोड़ रह गई. इसी दौरान महिलाओं में से 1.55 करोड़ मतदाता हटा दिए गए, जिससे महिला मतदाताओं की संख्या केवल 5.67 करोड़ रह गई.
सुधार की दिशा पूरी तरह पलट गई
पुरानी वोटर लिस्ट (15.44 करोड़) को आधार मानें, तो एसआईआर के दौरान महिलाओं के नाम पुरुषों की तुलना में लगभग 15 प्रतिशत अधिक काटे गए, यानी पुरुषों के मुकाबले करीब 20 लाख अतिरिक्त महिला मतदाता वोटर लिस्ट से बाहर हो गईं.
अगर एसआईआर से पहले वाला जेंडर अनुपात 876 बना रहता तो ड्राफ्ट लिस्ट में लगभग 6.04 करोड़ महिला मतदाता दर्ज होनी चाहिए थीं, लेकिन ड्राफ्ट लिस्ट में इससे करीब 37 लाख महिलाएं कम दर्ज हुई हैं, जबकि एसआईआर से तो लोगों को वोटर लिस्ट में सुधार होने की उम्मीद थी कि – जेंडर अनुपात राज्य की वयस्क जनसंख्या के जेंडर अनुपात के करीब – यानी 941 के करीब पहुंचेगा.
अगर हम एसआईआर के बाद जारी यूपी की ड्राफ्ट लिस्ट में दर्ज 12.55 करोड़ मतदाताओं को इस जेंडर अनुपात के हिसाब से देखें तो वोटर लिस्ट में महिलाओं की संख्या लगभग 6.49 करोड़ होनी चाहिए थी – लेकिन ड्राफ्ट लिस्ट में इससे लगभग 82 लाख महिलाएं कम दर्ज हुई हैं.
वहीं, अगर पुरानी वोटर लिस्ट (15.44 करोड़ मतदाता) को भी जेंडर अनुपात 941 के हिसाब से देखें तो, एक आदर्श पुरानी लिस्ट में महिलाओं की संख्या लगभग 7.49 करोड़ होनी चाहिए थी – इसकी तुलना में महिलाओं की संख्या ड्राफ्ट लिस्ट (5.67 करोड़) में लगभग 1 करोड़ 82 लाख कम है.
इस गिरावट को यह कहकर समझाना कि – ‘महिलाएं घर छोड़कर चली जाती हैं इसलिए जेंडर अनुपात गिरा है’ – तथ्यों के बिल्कुल खिलाफ होगा.
रिपोर्ट ऑफ द टेक्निकल ग्रुप ऑफ पॉपुलेशन प्रोजेक्शन 2020, जिससे यह वयस्क जेंडर अनुपात का 941 का आंकड़ा मिला है, उसमें अगर कोई राज्य से शिफ्ट कर गया है तो उसका भी पूरा हिसाब लगाया गया है.
ऐसे में सवाल पैदा होता है कि आखिर एसआईआर के बाद ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से हटाई गईं 37 लाख महिलाएं आखिर गईं कहां और क्यों ? इस सवाल का जवाब एसआईआर की उसी प्रक्रिया में छुपा है, जो वोटर बने रहने की पूरी जिम्मेदारी नागरिकों पर डालकर उसे जटिल दस्तावेजी शर्तों में उलझा देती है, जिससे मतदाता स्वतः ही बाहर हो जाते हैं.
शादीशुदा महिलाओं की मैपिंग प्रक्रिया
शादीशुदा महिलाओं पर मैपिंग की प्रक्रिया का असमान बोझ है- कि वे 2002 की वोटर लिस्ट में अपने माता या पिता का नाम ढूंढें. नतीजा यह हुआ कि वोटर लिस्ट में महिला-पुरुष का संतुलन – ‘जेंडर अनुपात – जिसमें पिछले कई वर्षों से धीरे-धीरे सुधार हो रहा था, एक झटके में एक दशक पीछे चला गया. अब उत्तर प्रदेश की वोटर लिस्ट का जेंडर अनुपात देश में हर अन्य राज्य से खराब है.
एसआईआर से पहले मौजूद हालात की तस्वीर इसके बिल्कुल उलट थी. अगर दो संवैधानिक संस्थाओं केंद्रीय चुनाव आयोग और उत्तर प्रदेश राज्य निर्वाचन आयोग के आंकड़ों को साथ रखकर देखा जाए तो दोनों ही वोटर लिस्ट में जेंडर अनुपात में हो रहे सुधार की ओर इशारा करते हैं. महिला मतदाताओं की भागीदारी बढ़ रही थी और लोकतंत्र अधिक समावेशी होने की दिशा में आगे बढ़ रहा था.
साल 2012 के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण अभियान (SSR) के समय उत्तर प्रदेश की वोटर लिस्ट में जेंडर अनुपात लगभग 816 के आसपास था, जबकि 2011 की जनगणना के मुताबिक उत्तर प्रदेश में वयस्क आबादी का जेंडर अनुपात करीब 912 दर्ज किया गया था. यानी आदर्श स्थिति में वोटर लिस्ट का जेंडर अनुपात भी इसके (912) आसपास होना चाहिए था.
साफ है कि समाज में मौजूद महिलाओं और वोटर लिस्ट में दर्ज महिलाओं के बीच एक बड़ा अंतर मौजूद था.
इसके बाद के वर्षों में इस खाई को पाटने की दिशा में लगातार प्रयास किए गए. चुनाव आयोग के अलग-अलग वोटर लिस्ट के रिवीजन के दौरान महिला मतदाताओं के नाम जोड़ने पर विशेष जोर दिया गया, जिसका असर धीरे-धीरे दिखाई देने लगा.
उत्तर प्रदेश की वोटर लिस्ट में जेंडर अनुपात
विधानसभा चुनाव फरवरी 2017 से ठीक पहले किए गए एसएसआर रिवीजन में महिलाओं की भागीदारी में साफ बढ़त देखने को मिली. इस प्रक्रिया के बाद उत्तर प्रदेश की वोटर लिस्ट में जेंडर अनुपात 827 से बढ़कर 839 हो गया – यानी 12 अंकों का स्पष्ट उछाल आया.
इसी क्रम में साल 2021-22 में केंद्रीय चुनाव आयोग के एसएसआर अभियान के दौरान उत्तर प्रदेश में कुल मतदाता लगभग 15.02 करोड़ दर्ज थे. इस प्रक्रिया में करीब 23.92 लाख पुरुष और 28.86 लाख महिला मतदाता वोटर लिस्ट में जोड़े गए. यानी पुरुषों की तुलना में करीब 5 लाख अधिक महिलाएं मतदाता सूची में शामिल हुईं.
इसका सीधा असर जेंडर अनुपात पर पड़ा, जो प्रक्रिया शुरू होने से पहले 857 था और एसएसआर प्रक्रिया के बाद 11 अंक बढ़कर 868 हो गया. उस समय इसे चुनाव आयोग की एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा गया.
जनवरी 2025 में हुआ एसएसआर भी इसी क्रम की एक अहम कड़ी था, इस दौरान जनवरी 2025 में जेंडर अनुपात 874 से बढ़कर 876 हुआ. दो अंकों की यह बढ़त भले ही मामूली प्रतीत हो, लेकिन यह इस बात का संकेत था कि महिला मतदाताओं को जोड़ने की प्रक्रिया धीरे-धीरे सही दिशा में आगे बढ़ रही है.
यह सुधार केवल (केंद्रीय) भारत निर्वाचन आयोग की वोटर लिस्ट तक सीमित नहीं रहा. पंचायत और नगरीय निकाय चुनावों के वोटर लिस्ट की जिम्मेदारी राज्य निर्वाचन आयोग उत्तर प्रदेश की है, जो (केंद्रीय) भारत निर्विचन आयोग की तरह ही एक संवैधानिक संस्था है. देखा जाए तो राज्य निर्वाचन आयोग के आंकड़े भी इसी रुझान की पुष्टि करते हैं.
पंचायत चुनाव 2015 की वोटर लिस्ट में जेंडर अनुपात लगभग 879 दर्ज किया गया, जबकि नगर निकाय चुनाव 2017 में यह आंकड़ा करीब 869 रहा. इन दोनों स्थानीय चुनावों के आंकड़ों को मिलाकर देखें तो उस दौर में वोटर लिस्ट का जेंडर अनुपात लगभग 878 तक पहुंच चुका था.
आगे चलकर यह रुझान और मजबूत हुआ. पंचायत चुनाव 2021 की मतदाता सूची में जेंडर अनुपात लगभग 887 दर्ज किया गया. वहीं नगरीय निकाय चुनाव 2023 की वोटर लिस्ट में यह अनुपात 881 रहा. इन दोनों स्थानीय चुनावों की वोटर लिस्ट को एक साथ जोड़कर देखें तो उत्तर प्रदेश के स्थानीय निकाय चुनाव की वोटर लिस्ट में जेंडर अनुपात लगभग 886 तक पहुंच गया था.
इससे यह उम्मीद भी बनी कि आने वाले समय में वोटर लिस्ट समाज की वास्तविक तस्वीर के और करीब पहुंचेगी.
लेकिन एसआईआर की प्रक्रिया ने दशकों में हुई इस पूरी प्रगति को उलट दिया. आज उत्तर प्रदेश में स्थिति ठीक इसके विपरीत नजर आती है. बिहार में हुए एसआईआर ने इसके बारे में पहले ही चेताया था. वहां एसआईआर के बाद वोटर लिस्ट में जेंडर अनुपात जिस तेजी से बिगड़ा, उसने साफ संकेत दिए थे कि यह प्रक्रिया महिलाओं को बड़े पैमाने पर वोटर लिस्ट से बाहर कर रही है.
आज वही संकेत एसआईआर के दूसरे चरण में शामिल 12 राज्यों में भी स्पष्ट तौर पर देखे जा सकते हैं, जहां वोटर लिस्ट का जेंडर अनुपात कुल वयस्क महिला आबादी से और दूर जाता दिखाई दे रहा है. जेंडर अनुपात में यह गिरावट न केवल ऐतिहासिक है, बल्कि ऐसा प्रतीत होता है कि वोटर लिस्ट का जेंडर अनुपात लोकतंत्र के शुरुआती दौर जैसे स्तर पर लौट आया हो.
(लेखक पब्लिक पॉलिसी रिसर्चर हैं. वह लोकनीति और जनहित से जुड़े विषयों पर रिसर्च करते हैं)
