लेखकों की अलमारी से: कैलाश बनवासी और लवली गोस्वामी की पसंद…

'लेखकों की अलमारी से' के इस अंक में लवली गोस्वामी और कैलाश बनवासी बताते हैं कि वर्ष 2025 में किन-किन पुस्तकों ने उन्हें सबसे अधिक प्रभावित किया. आत्मकथा, संस्मरण, उपन्यास, कहानी और कविता के ज़रिये वे समकालीन हिंदी और अंग्रेज़ी साहित्य की रचनात्मक यात्रा पर रोशनी डालते हैं.

(फोटो साभार: सोशल मीडिया)

नए साल के आंगन में खड़े होकर हमारे समय के लेखकों और चिंतकों ने अपनी अलमारी से पिछले साल क्या सब पढ़ा, इसकी चर्चा हम कर रहे हैं अपनी साहित्यिक शृंखला ‘लेखकों की अलमारी से’ की तीसरी क़िस्त में. लेखक जो स्वयं लिखते हैं, वह किन्हें पढ़ते हैं, सराहते हैं, एक अच्छा ज़रिया है न केवल प्रचलित पुस्तकों की समीक्षा का बल्कि उन रचनाओं को भी जानने का जो प्रसिद्धि से दूर रहकर भी कुछ मानीखेज़ कह जाती हैं. इस अंक में  कैलाश बनवासी और लवली गोस्वामी की अलमारी पर एक नज़र:

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कैलाश बनवासी

पिछले साल, पढ़ना मेरा बहुत बेतरतीब रहा है. बहुत अव्यवस्थित. इसे किसी गौरव की तरह नहीं, एक खेद की तरह कह रहा हूं. जो आप करते हैं, या होते हैं, वह आपके मिज़ाज से ही होता है. बावजूद समय होने के, जाने क्यों, एक अधीरता तारी रहती है. वरिष्ठ कथाकार ज्ञानरंजन अपने स्वभावगत अधीरता को लेकर कहते हैं -‘मैं हमेशा फोर्थ-फिफ्थ गियर में होता हूं.’

हमेशा उन लोगों से रश्क होता है जो नई-से-नई किताबें न केवल पढ़ लेते हैं, बल्कि उनकी समीक्षा भी कर लेते हैं. यह विस्मित और चमत्कृत करता है मुझे. पढ़ने का यह ढंग मुझसे नहीं सध पाता. नई-नई और महत्त्वपूर्ण किताबों को भी मेरे पाठक के ‘मूड’ में आने का इंतज़ार करना होता है.

यदि मैं अपनी रुचि से,जिसे महत्वपूर्ण मानता हूं, पढ़ रहा हूं,तो यह पढ़ना सहसा किसी पत्रिका/ब्लॉग में कुछ महत्त्वपूर्ण नज़र आने से भंग हो जाता है. फिर सिर्फ साहित्यिक चीज़ें ही नहीं, दूसरी कई तरह की चीज़ें- वह सामजिक,आर्थिक,सांस्कृतिक,विज्ञान अथवा शैक्षिक विश्लेषण भी हो सकती हैं-पढ़ना मेरी रुचि या कहूं कि ज़रूरत या भूख में रहा है.

‘असहमति में उठा हाथ’

जिन किताबों को इस साल मैं पढ़ पाया, उसमें सबसे पहले है, राजकमल प्रकाशन से 2019 में प्रकाशित विष्णु नागर द्वारा लिखित रघुवीर सहाय की जीवनी ‘असहमति में उठा हाथ.’

रघुवीर सहाय के जीवन संघर्षों को विष्णु जी ने बहुत प्रभावी ढंग से लिखा है.खासकर ‘टाइम्स ग्रुप’ में ‘दिनमान’ दिनों की उनकी पत्रकारिता को जानना भारतीय पत्रकारिता के एक सुनहरे, विलक्षण और प्रतिबद्ध दौर को जानना है, जो आज जैसे मुख्यधारा से पूरी तरह गायब है और उस रिक्तता को पूरा समाज विकट रूप से किसी अभिशाप की तरह भुगत रहा है.

एक अन्य जीवनी जिसे बहुत चाव से पढ़ना हुआ, वह है 2020 में आई सेक्ट पब्लिकेशन भोपाल से प्रकाशित दुनिया की पहली महिला कव्वाल शकीला बानो भोपाली की रफ़ी शब्बीर द्वारा लिखित जीवनी-‘बानो का बाबू.’

यह एक निम्न जाति मुस्लिम परिवार की लड़की शकीला का छठवें दशक के ज़माने में अपनी कला के प्रति निष्ठा और समर्पण का,और एक स्त्री का समाज की उपेक्षा और तानों-उलाहनों के बावजूद अपनी पहचान स्थापित करने के गहरे संघर्ष की कहानी है. रफ़ी शब्बीर ने जैसी गहरी संलग्नता और अद्भुत रोचक किस्सागोई के साथ इसे लिखा है, वह इसे विशिष्ट और अत्यंत पठनीय बनाता है.

‘मनुष्य होने के संस्मरण’

राजकमल से 2023 में प्रकाशित इस दौर के ख्यात कवि देवीप्रसाद मिश्र की प्रायः छोटी कहानियों का संकलन ‘मनुष्य होने के संस्मरण’ भी बहुत उत्साह से पढ़ना हुआ. यह बहुत चर्चित भी हुआ है.

देवी इन कहानियों को प्रतिकथाएं कहते हैं- यथार्थ के समानांतर अतियथार्थ और यूटोपिया में घूमती-भटकती रूहानियत. वे अपनी कहानियां एक नितांत भिन्न और अपरंपरागत शैली में लिखते हैं जिनमें यथार्थ के साथ स्वप्न,फैंटेसी,रूपक या बिम्ब के अनूठे मिश्रण से वह जैसे कथा कहने की नई प्रविधि आविष्कृत करते हैं, प्रचलित कथा रूप-शिल्प का कई स्तरों पर अतिक्रमण करते हैं, जिनके माध्यम से हमारे समय की तमाम क्रूरताएं, अन्याय, शोषण, विसंगतियां, विकृतियां, लालच, दैहिक-कामनाएं, कुंठाएँ इत्यादि बहुत बेपर्दा होकर सामने आती हैं.

‘गुज़रा हुआ ज़माना’

गद्यकार कृष्ण बलदेव वैद का उपन्यास ‘गुज़रा हुआ ज़माना’ इस साल की गर्मियों में पढ़ा. तब के हिदुस्तान को, खासकर विभाजन के दौर का जनजीवन मुझे किसी नॉस्टेल्जिया-सा खींचता है. जाने क्यों लगता है, उस दौर का, और उस भूगोल की अपनी गौरवशाली साझा संस्कृति थी, जो तब से लगातार आज तक क्षत-विक्षत हो रही है, ख़ास कर इस दौर में जहां सत्ताएं घोर सांप्रदायिक एजेंडा पर चल रही हैं और धर्म राजनीति का, चुनाव जीतने का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है.

कृष्ण बलदेव वैद अपने इस उपन्यास- जो उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘उसका बचपन’ की अगली कड़ी है–में धार्मिक विभाजन के चलते पाकिस्तान बनने के उस दौर में दोनों कौमों में आते उथल-पुथल और मनोदशाओं को अपनी विशिष्ट, और बेपर्द शैली में बहुत बेबाकी से दर्ज करते हैं जिसमें कुंठित-अकुंठित वासनाएं शामिल हैं.

वैद तब के जीवन-यथार्थ को समूचेपन से प्रकट करने उसकी जटिलताओं में गहरे उतरते हैं, और इसके लिए कोई सरलीकृत,बना-बनाया नुस्खा या हल नहीं अपनाते. ऐसी कृतियां पढ़कर आज की स्थितियों कि तुलना करते जान सकते हैं कि हम कहां और कैसे बेहतर हुए हैं या खराब.

यह महत्वपूर्ण बात है कि लगभग अशिक्षित होते हुए भी तब उन लोगों में वैसा सांप्रदायिक नफ़रत और उन्माद नहीं था. अपनी धार्मिक मान्यताओं पर विश्वास और दूसरे धर्मों से किंचित वैमनस्यता और परहेज के बावजूद सामजिक मेल-जोल ,सद्भाव और व्यावहारिकता क़ायम थी, जबकि आज शिक्षित होने के बावजूद लोगों में धार्मिक कट्टरता और दूसरे धर्म के प्रति घृणा आम है. तब इस घृणा को विभाजन की जिम्मेदार नफरती धार्मिक राजनीति ने उभारा था.

आज यह विभाजन और घृणा जैसे अपने चरम पर जा पहुंचा है. मुस्लिमों से नफरत के साथ ईसाइयों के खिलाफ भी नफरती वाहिनियां लगी हुई हैं. यकीनन ऐसी श्रेष्ठ कृतियां हमें आईना दिखाती हैं, अगर उससे कुछ सीख लेना चाहें तो. अन्यथा रसूल हमजातोव ने अपनी किताब ‘मेरा दागिस्तान’ में लिखा ही है -‘अगर तुम अतीत पर पिस्तौल चलाओगे तो भविष्य तुम पर तोप के गोले दागेगा.’

‘टूटे तारों तले’

2023 में नवारुण प्रकाशन से छपी हमारे समय के अत्यंत महत्वपूर्ण कथाकार योगेंद्र आहूजा की किताब-‘टूटे तारों तले’ का ज़िक्र करना चाहूंगा. यह कथेतर गद्य, आलेख, टिप्पणियों और उनके वक्तव्यों और साक्षात्कारों की किताब है. इनमें दर्ज लेखों से योगेंद्र जी के रचनाकार अन्तर्मन की सूक्ष्मता और गहराई महसूस की जा सकती है.

एक बहुत संवेदनशील और दुनिया की बेहतरी के लिए प्रतिबद्ध रचनाकार अपने समय के तनावों, जटिलताओं, स्वार्थों, षड्यंत्रों, उदासियों, निराशाओं को जिस शिद्दत और गंभीरता से देख रहा है और उसे चिह्नित कर रहा है- वह ताप महसूस किया जा सकता है. यह अपने आत्मीय मित्रों को याद करने, प्रिय रचनाकारों को पढ़ने,या कहानी विधा में समयगत आते बदलावों को देखने के बहाने खुद से लगातार एक रचनात्मक जिरह की किताब है.

कथाकार ज्ञानरंजन को समर्पित यह किताब मुझे ज्ञान जी की बहुचर्चित (और मेरी एक बहुत प्रिय) किताब ‘कबाड़खाना’ की ही अगली कड़ी जैसी लगती है. योगेंद्र आहूजा अपनी बात जिस तरह विशाल नद के-से विस्तार और गंभीरता से, एक मंथर गति में -किंतु गहरे उतरकर-कहते हैं, वह नितांत आत्मीय और ऊष्मा से भरा है. इन सब खूबियों के कारण यह हमारे समय में पढ़ी जाने वाली एक ज़रूरी किताब बन जाती है.

इंटरनेट के चलते आज पढ़ने और जानने का दायरा इतना अधिक और इतना विशाल है कि कोई क्या-क्या देखें ! पढ़ना दरअसल व्यक्तिगत चयन का मामला है. नए कथाकारों की कहानियां और गहरी समीक्षा,आलोचना या विश्लेषण मुझे जिस माध्यम में मिले, मैं तत्काल पढ़ जाना पसंद करता हूं.

इस सिलसिले में कुछ कहानियों के नाम महत्त्वपूर्ण हैं, जिन्हें इस साल पढ़ना हुआ और जो महत्वपूर्ण लगीं, जिनसे मैं प्रभावित हुआ. इस सूची में चंदन पाण्डेय के इस बरस शुरू किए पोर्टल ‘सम्मुख’ में प्रकाशित दो ज़रूरी कहानियों का जिक्र करना चाहूंगा.

पहली कुणाल सिंह की कहानी ‘विसर्जन’ है जो कला और कलाकार के गहरे अंतर्संबंधों की, उसके मनोजगत की सूक्ष्म और सुंदर कहानी है. दूसरी कहानी है मनोज कुमार पाण्डेय की-‘आपकी टंकी भर गई है.’

यह आज के भ्रष्ट ताकतवरों के उद्दंड और ‘अहम् ब्रम्हास्मि’ सत्ता के विरुद्ध एक साधारण व्यक्ति की लड़ाई की बेहद सशक्त कहानी है जो समाज में व्याप्त हो चुकी सामूहिक कायरता के चलते, अकेले ही आत्मघाती लड़ाई लड़ने को विवश है.

इसी तरह ‘वनमाली कथा’ में प्रकाशित कुछ महत्त्वपूर्ण कहानियां हैं. देश में बीते कुछ बरसों से चिह्नित कर लगातार मुस्लिमों पर होते अन्याय और अत्याचार के बाद अब नागरिकता से बाहर धकेले जाने की त्रासदी को राकेश मिश्र अपनी कहानी ‘अनागरिक’ में बताते हैं.

वहीं राहुल श्रीवास्तव अपनी कहानी ‘केवटी की दाल’ में मौजूदा बांटने और वर्चस्व की राजनीति का दिलचस्प व्यंग्यात्मक खाका खींचते हैं. ‘हंस’ में प्रकाशित आनंद हर्षुल की कहानी ‘ढाका मलमल’ ईस्ट इंडिया कंपनी के औपनिवेशिक लूट और मुनाफे की कथा कहती है.

पत्र-पत्रिकाओं में जो उल्लेखनीय लगा,उनका जिक्र करता चलूं. जैसे ‘तद्भव’ में कथाकार काशीनाथ सिंह पर उनके बेटे सिद्धार्थ का लिखा संस्मरण, बेहतरीन कथाकार अशोक अग्रवाल का ‘कथादेश’ में शिल्पकार हिमा कौल पर लिखा संस्मरण यादगार है.

इस कड़ी में कथाकार जितेंद्र भाटिया द्वारा ‘अकार’ में बिमल रॉय, मृणाल सेन, श्याम बेनेगल, ऋत्विक घटक जैसे क्लासिक फिल्मकारों- पर लिखी जा रही सीरिज़ बेहद महत्त्वपूर्ण हैं,जो बहुत गंभीरता और विस्तार से किया जाता उनका संस्मरण-सह-मूल्यांकन है. इसी तरह ब्लॉग ‘समालोचन’ पर कुमार अम्बुज द्वारा किए गए विश्व की कुछ क्लासिक सिनेमा पर विवेचन अपने प्रभाव में बहुत विशिष्ट हैं, जिन्हें पढ़ते हुए कविता का-सा आभास होता है.

लवली गोस्वामी

इन सर्च ऑफ लॉस्ट टाइम (In Search of Lost Time):

प्रूस्त का यह मास्टरपीस जो बहुत दिनों से पढ़ने की लिस्ट में था. पढ़ने के लिए खुद को मानसिक रूप से तैयार करना एक बड़ा काम था. प्रूस्त की यह रचना विश्व साहित्य के सबसे महान और प्रभावशाली उपन्यासों में से एक मानी जाती है. यह विश्व का सबसे लंबा उपन्यास है. इसमें प्रूस्त अनैच्छिक स्मृति (Involuntary Memory) की अवधारणा का प्रथम परिचय देते हैं जिसके बाद ही इसे मनोविज्ञान में प्रयोग में लाया जाता है. यह वर्ष इस महा-उपन्यास को पढ़ते-पढ़ते बीता.

फ्लेश (Flesh):

डेविड सेज़ले के इस उपन्यास को वर्ष 2025 के बुकर पुरस्कार से सम्मानित किया गया है. यह इस्तवान नाम के एक हंगेरियन व्यक्ति के जीवन की कहानी है, जो गरीबी से अमीरी और फिर वापस से एक साधारण जीवन की यात्रा तय करता है. यह अपनी महत्वाकांक्षा और सेक्सुअलिटी को नेविगेट करते एक इंसान की कहानी है जो किशोरावस्था में अपने मां के उम्र की स्त्री के शारीरिक आकर्षण के जुनून में उसके पति को सीढ़ियों से धक्का दे देता है.

बाल सुधार गृहों से सेना में भर्ती होने और फिर लंदन के धनाढ्य वर्गों में में अपनी जगह बनाने की इस्तवान की यात्रा अंततः अपने शीर्षक ‘फ्लेश’ (Flesh – मांस/शरीर) के अनुरूप, इस बात को केंद्र में रखती है कि मनुष्य दुनिया में एक ‘शरीर’/’देह’ के रूप में कैसे मौजूद है.

लेखक, इस्तवान के विचारों के बजाय उसकी शारीरिक क्रियाओं, यौन आंनद, भूख, दर्द या स्पर्श जैसे अनुभवों पर अधिक ध्यान देते हैं. पुरुष किस प्रकार दुनिया को देह से महसूस करते हैं, यह फ्लेश का कथ्य है. उपन्यास में दर्शाया गया पुरुष एक स्वयं से निर्वासित व्यक्ति कहा जा सकता है और बहुत हद तक भावहीन बना रहता है.

वह अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं कर पाता और अक्सर दुनिया से कटा हुआ महसूस करता है. मनुष्य अपनी नियति का निर्माण करने वाला होता है जैसी अवधारणा के विपरीत इस्तवान अपने आप को परिस्थितिओं के हवाले करता चला जाता है.

द कंप्लीट पोयट्री ऑफ सीज़र वालेज़ो (The Complete Poetry of Cesar Vallezo):

पेरुवीयन कवि सीज़र वालेज़ो मानवीय पीड़ा और दुख के कुछ महत्त्वपूर्ण कवियों में से एक माने जाते हैं, जो देश निष्कासन और जेलों में रहे, जिन्होंने अपनी मृत्यु को पहले ही देख लिया था. उन्होंने पहले ही अपनी एक कविता में यह भविष्यवाणी कर दी थी कि किसी बरसाती दिन में वह पेरिस में मरेंगे. उनकी समस्त कविताओं का यह द्विभाषीय संग्रह चार हज़ार पृष्ठों से अधिक का है. मेरा यह साल उन्हें रुक-रुक कर पढ़ते हुए बीता है.

तृण धरी ओट

मिथकों को नई दृष्टि देता अनामिका का यह उपन्यास भारतीय मिथकों में आयी नारी शक्ति के वैकल्पिक चित्रण पर आधारित एक सुंदर गाथा है. मुझे मिथकों में रुचि रही है. अनामिका के इस उपन्यास को पढ़ते हुए उनकी समरस दृष्टि और वैश्विक हित से ओत-प्रोत उनके मन की विलक्षण दयालुता का परिचय मिलता है. आपको लगता है आप किसी हरसिंगार की छाया में बैठे हैं और आप पर लगातार ख़ुशबू और कोमलता की वर्षा हो रही है.

(अदिति भारद्वाज के साथ बातचीत पर आधारित.)