किसी पाठक के लिए उसके प्रिय लेखक की मृत्यु का क्षण अजीब होता है. बरसों की जड़ता सहसा मृत्यु की सूचना से टूट जाती है! सालों से पढ़े जाने का इंतज़ार कर रही किताबें अब एक बार में पढ़ ली जाती हैं. कई दिन वह लेखक की स्मृति के घेरे में रहता है, मित्रों से बातचीत के किसी भी प्रसंग को मोड़कर ऐसी दिशा में लाना चाहता है, जहां लेखक उपस्थित हो. और अंत में अपने ढंग से कुछ लिखकर पाठकीय ऋण से मुक्त होने की कोशिश करता है.
तीन बरस पहले छपकर आई आत्मकथा ‘अ वॉक अप द हिल: लिविंग विद द पीपल एंड नेचर’ में वे अपने जन्म को दो संयोगों से जोड़ते हैं. जन्म का वर्ष था 1942, जब महात्मा गांधी ने अंग्रेज़ों से भारत छोड़ने को कहा था और उत्कृष्ट चित्रों के साथ सलीम अली की ‘बुक ऑफ इंडियन बर्ड्स’ पहली बार प्रकाशित हुई थी.
उनका जन्म पुणे में हुआ था. करीब 20 बरस पहले उन पर लिखा रामचंद्र गुहा का निबंध, ‘द डेमोक्रेटिक सोशल इकोलॉजी ऑफ माधव गाडगिल’ पुणे के बारे में इस वाक्य से शुरू होता है, ‘आधुनिक भारत के किसी दूसरे शहर में विद्वता और समाज सुधार वैसे एक दूसरे से अंतर्ग्रथित नहीं है जैसे पुणे में.’
वे आगे लिखते हैं, ‘यह शहर भारत के अग्रणी उदार विचारकों ज्योतिबा फुले, गोपालकृष्ण गोखले, ताराबाई शिंदे, डीके कर्वे, भीमराव आंबेडकर की कर्मभूमि रहा है. इन विचारकों को स्त्री शिक्षा, जाति उन्नयन, समाज सुधार व उदार मूल्यों को स्थापित करने के लिए जाना जाता है. ये नाम उन्नायकों के हैं, पर इनके अलावा अनेक ऐसे पुणेकर (पुणेवासी) हैं जिनके नाम उतने परिचित भले नहीं है, पर उनमे भी अर्जित ज्ञान को सामाजिक बदलाव के लिए उपयोग करने की महती आकांक्षा रही है. ऐसे ही पुणे वासियों में एक नाम था, माधव गाडगिल के पिता अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री और संस्थान निर्माता धनंजय रामचंद्र गाडगिल.
उसी निबंध में रामचंद्र गुहा ने अर्थशास्त्री वैज़िली लियोंटीफ़ और 13 बरस के किशोर माधव के बीच हुई रोचक बातचीत का ज़िक्र किया है. लियोंटीफ़ पुणे के गोखले इंस्टिट्यूट में एक व्याख्यानमाला के लिए आए थे और धनंजय गाडगिल के मेहमान थे. एक दिन बातचीत में लियोंटीफ़ ने माधव से पूछा कि वो बड़े होकर क्या बनना चाहते हैं तब उन्होंने जवाब दिया, ‘जीवविज्ञानी यानी बायोलॉजिस्ट। इस पर लियोंटीफ़ की प्रतिक्रिया थी, ‘बेहतरीन, बहुत बढ़िया! कभी भी वो नहीं करना चाहिए जो आपके पिता करते हैं, खासतौर पे तब जब वे अपने काम में बेहद अच्छे हों. ‘
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पुणे की प्राकृतिक सुंदरता ने उनमें पर्यावरण और जीव जगत के प्रति जिज्ञासा और प्रेम का बीज बचपन में ही डाल दिया था. पुणे सह्याद्रि की गोद में बसा है. बाद में वे अक्सर कालिदास के रघुवंशम के उस अंश को उद्धृत करते हैं, जहां कालिदास पश्चिमी घाट की पर्वतमालाओं को नवयौवना की उपमा देते हैं. गाडगिल ने लिखा है— वे बचपन में ही इस युवती के प्रेम में पड़ गए थे.
उन दिनों जब कीटनाशकों का प्रयोग नहीं होता था, तब पुणे के आस-पास पक्षी भी भरपूर थे. पिता के साथ वैताल पहाड़ियों पर सैर करते हुए पक्षियों की अनेक प्रजातियों को वे बचपन में ही पहचानने लगे थे.
पुणे में रहते हुए ही उनकी यह समझ बनने लगी थी कि पर्यावरण संरक्षण और आजीविका तथा आर्थिक विकास के प्रश्न अलग-अलग नहीं है. बाद में प्रकृति और विभिन्न मानव संस्कृतियों से व्यापक परिचय के बाद यह समझ और पुष्ट हुई. उन्होंने पर्यावरण के संरक्षण के प्रश्न को हमेशा मनुष्य और उसकी आजीविका के प्रश्न से जोड़कर देखा.
उन्होंने पर्यावरण की कल्पना इस रूप में कभी नहीं की जिसमें मनुष्य का प्रवेश वर्जित हो, वह मनुष्य के स्पर्श से भी अछूता हो. समूचे इतिहास में भारतीय उपमहाद्वीप के निवासियों का अपने पर्यावरण से जो रिश्ता रहा है, उसके ज्ञान के कारण उनकी यह समझ बनी.
यूरोप व अमेरिका का पर्यावरण आंदोलन प्रकृति को मनुष्य से अलग कर संरक्षित करने का हिमायती रहा है. वहां यह समझ रही है की संरक्षित भूखंड जितना संभव हो उतना विशाल होना चाहिए. उदाहरण के लिए 100 वर्ग मील का एक क्षेत्र 50-50 वर्गमील के दो अलग भूखंडों की अपेक्षा पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से अधिक उपयुक्त होगा. एडवर्ड विल्सन द्वारा प्रस्तावित ‘हाफ अर्थ प्रोजेक्ट‘ (Half Earth Project) , जिसमें आधी धरती को मानवीय क्रियाकलापों से मुक्त कर संरक्षित करने की बात कही गई है, संरक्षण की इसी दृष्टि पर आधारित है. आधी धरती मानवी कार्य-व्यापारों के लिए है, आधी में मनुष्य की कोई भी गतिविधि निषिद्धि है.
माधव गाडगिल को भारत के लिए संरक्षण का यह मॉडल इसलिए उपयुक्त नहीं लगता था क्योंकि यहां के वन कभी निर्जन नहीं रहे. प्राचीनकाल से ही हमारी बड़ी आबादी वनों की वासी रही है और अच्छी-ख़ासी आबादी अब भी है. यहां बहुत बड़ा जन समुदाय जीविका के लिए वनों पर आश्रित रहा है.
ऐसा नहीं कि यह निर्भरता सिर्फ़ शिकारी-खाद्य संग्राहकों और घुमंतू चरवाहों या झूम खेती करने वाली जातियों की ही थी. हल की खेती भी वनों पर उतनी ही आश्रित थी. वहां किसानों के चौपाये चरा करते थे, वे वनों के बायोमास का उपयोग करते और उनके गोबर की खाद से धरती उर्वरा होती. भारतीय उपमहाद्वीप के बड़े भू भाग की मिट्टी में पोषक तत्त्वों की कमी है. बिना खाद के खेती हो नहीं सकती, इसलिए पशुपालन और कृषि सदैव एक दूसरे से जुड़े रहे हैं.
इसके अलावा शिल्पकारों को भी जरूरत की चीजें वनों से ही मिलती थी. बांस और दूसरे प्रकार की लकड़ी, गाद, महुआ, चंदन और दूसरी उपजों पर पूरी अर्थव्यवस्था टिकी थी. वन पर सामूहिक स्वामित्व होता था और जनता सतत और किफायती ढंग से संसाधनों का उपयोग करती थी.
हमारे समूचे इतिहास में हर शासक ने वनों पर जनता के साझे अधिकार को स्वीकार किया. वनों पर जनता के अधिकार को ख़त्म किया गया औपनिवेशिक शासन में, जब वन विभाग बना. उपनिवेशवादियों को लगता था कि यहां की जनता के तौर-तरीक़े बर्बर और पुराने है. वनों पर इनका स्वामित्व संसाधनों की बर्बादी है. वनों को राज्य की संपत्ति घोषित कर दिया गया, ऐसा निश्चित हुआ कि वनों का उपयोग पूंजी की तरह होना चाहिए, वनों में उगने वाली अनुपयोगी वनस्पतियों को काटकर उनके स्थान पर इमारती लकड़ी वाले और दूसरे किस्म के उपयोगी वृक्ष लगाने चाहिए.
रेल के विस्तार के समय स्लीपर बनाने के लिए अंधाधुंध वन काटे गए, यहां के वनों की लकड़ी से ब्रिटेन की नौसेना मजबूत हुई, दोनों विश्व युद्धों के समय तो दोहन की कोई सीमा नहीं रही, वनों को ब्रिटेन के रईसों के शिकार के शौक़ के लिए इस्तेमाल किया गया. जब भारत स्वतंत्र हुआ तब इन कारकों के सम्मिलित प्रभावों ने भारत की प्राकृतिक संपदा को तहस-नहस कर दिया था.
भारत के अनगिनत इतिहासकारों ने भारतीय सामाजिक संरचना, उसकी अर्थव्यवस्था, उसकी संस्कृति और ज्ञान परंपराओं पर उपनिवेशवाद के प्रभाव के बारे में लिखा था, पर उपनिवेशवाद के हमारे पर्यावरण और प्राकृतिक संपदा पर विनाशकारी प्रभाव के बारे में संभवतः पहली बार माधव गाडगिल ने लिखा.
उपनिवेशवादी इतिहास के अनुभव के चलते ही उनकी यह समझ बनी कि पर्यावरण के विनाश का कारण वे लोग नहीं है, जो सदियों से वनों में और उनकी दहलीज़ पर रहते आए हैं, वहां से अपनी अजीविका चलते आए हैं. विनाश का कारण था उपनिवेशवाद, संसाधनों के उपयोग का उसका तरीका और आधुनिक औद्योगिक विकास का मॉडल.
अपने इसी दृष्टिकोण के चलते उन्होंने ऐसे समुदायों को अहमियत देना सीखा, जिन्हें पर्यावरणविद भी शंका की दृष्टि से देखते हैं
अपनी आत्मकथा में उन्होंने पुणे के पास रहने वाली ढांगर, गवली जैसी भैंसपालक जातियों का उल्लेख किया है. उनकी काली चमकदार खाल वाली पुष्ट भैंसे उन्हें बहुत आकर्षक लगती थीं. ‘मैं शहरों के उन प्रकृतिप्रेमियों से अलग बना, जो गांव के लोगों और उनके चौपायों को भारत की प्राकृतिक संपदा का दुश्मन समझते हैं. मैं भैंस को भी उसी निगाह से देख सकता था जिस निगाह से गौर को. भैंस पालने वाले किसानों से भी मेरी वैसी ही पटती थी जैसी पुणे के विद्वानों से.’
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रामचंद्र गुहा के साथ मिलकर लिखी पुस्तक ‘दिस फिशर्ड लैंड‘ [This Fissured Land] में उन्होंने पारिस्थितकी संघर्षों और संसाधनों के उपयोग के आधार पर भारतीय इतिहास की नई व्याख्या प्रस्तुत की है. तब तक समाजविज्ञानियों और इतिहासकारों ने मानव जीवन के पारिस्थितकी आधार की अनदेखी ही की थी, जबकि यह जीवन और संस्कृति के विकास की बुनियाद है.
किसान और जमींदार के संबंधों का अध्ययन हुआ था, पर इस बात का नहीं कि कैसे खेती अपने परिवेश की जल, वन तथा खनिज संपदा पर निर्भर है, जिनसे जीवन यापन के बुनियादी आधार उपलब्ध होते हैं.
मार्क्सवादी इतिहास लेखन उत्पादन प्रणाली (Modes of Production) पर ध्यान केंद्रित कर इतिहास की व्याख्या करता है, पर यह किताब उत्पादन के संसाधनों के इस्तेमाल (Modes of Resource Use) के आधार पर इतिहास की गति को व्याख्यायित करती है. मार्क्सवादी ‘उत्पादन-प्रणाली’ की अवधारणा की आलोचना करते हुए यह किताब एक अद्भुत अंतर्दृष्टि देती है.
यह कहती है कि पारिस्थितकी दृष्टि से ‘उत्पादन-प्रणाली’ का सिद्धांत पर्याप्त भौतिकवादी नहीं है. मार्क्सवाद के विषय में यह कहना कि वह पर्याप्त भौतिकवादी नहीं है थोड़ा अजीब लग सकता है, पर आगे विचार करने पर बात पूरी तरह स्पष्ट होगी. मार्क्सवादी विश्लेषण आर्थिक ‘बुनियादी ढांचे’ से आरंभ होता है. पर इसमें पारिस्थितकी संदर्भ पर ध्यान नहीं दिया जाता. इसमें समाज के भूमि, जल, पशु, खनिज, पौधों और फसलों से संबंधित उन आधारों की उपेक्षा की जाती है, जिनमें ‘बुनियादी-ढांचा’ निहित होता है. आधुनिक भारत के मार्क्सवादी और ग़ैर मार्क्सवादी दोनों ही ढंग के इतिहासों की कमजोरी यह है कि वे मानव समाज की परिस्थितकी बुनियाद की अनदेखी करते हैं. इसलिए यह इतिहास उत्पादन प्रणाली के पूरक के रूप में संसाधनों की उपयोग प्रणाली की अवधारणा का प्रस्ताव करता है.
आगे यह किताब एक और स्थापना करती है— ‘संसाधनों के उपयोग की प्रणाली’ की अवधारणा का उपयोग करने पर पूंजीवादी और समाजवादी दोनों ही औद्योगिक प्रणालियों की एक ही सिद्धांत से व्याख्या हो जाती है. यह सच है कि विकास के पूंजीवादी और समाजवादी रास्तों में अंतर है. संपत्ति और बाज़ार की भूमिका के संदर्भ में इनके बीच स्पष्ट अंतर है. पर परिस्थितिकी दृष्टिकोण से विकास के इन दोनों रास्तों के बीच अंतर से ज़्यादा समानताएं हैं. प्राकृतिक संसाधनों के प्रवाह की मात्रा और दिशा, संसाधनों के दोहन की तकनीक, ऊर्जा के उपयोग के स्वरूप, मानव और प्रकृति के बीच के संबंध के विचार और विशिष्ट संसाधन प्रबंधन का व्यवहार, एक जैसे हैं. उनकी उत्पादन प्रणाली जीवित पर्यावरण पर एक सा ही असर डालती है. इसीलिए पारिस्थितिक रूप से औद्योगिक समाजवाद और औद्योगिक पूंजीवाद को संसाधन उपयोग की एक औद्योगिक प्रणाली के दो प्रकारों के रूप में देखा जा सकता है.
पुस्तक का एक हिस्सा प्राचीन भारत में हुए संघर्षों के पारिस्थितिक आधार पर है और अन्य औपनिवेशिक शासन की वन नीतियों के कारण भारत में पारिस्थितिक बदलावों के चलते उपजे सामाजिक टकरावों पर. पुस्तक यह भी स्थापित करती है कि आजाद भारत में संसाधनों के उपयोग का ढंग औपनिवेशिक शासन जैसा ही रहा है, तथा सामाजिक टकराव भी जारी रहे हैं, कहीं-कहीं और तीव्र हुए हैं, क्योंकि आजाद भारत के पास वनों की वह विपुल संपदा नहीं थी जो 19वीं शताब्दी में उपनिवेशवादियों को मिली थी. आजाद भारत की सरकारों ने वनों पर अपने क़ब्ज़े को और मज़बूत किया, वन जनता की पहुंच से और दूर होते गए, संसाधनों के लिए होना वाला संघर्ष तीव्रतर होता गया.
यह किताब 1992 में आई थी. किताब का हिंदी अनुवाद है, ‘यह दरकती ज़मीन’. इसके बीस बरस बाद 2012 में आए नए संस्करण की भूमिका में लेखकद्वय ने निराशा के साथ लिखा किया है कि भारत के पारिस्थितिकी हालातों पर यह शीर्षक अब और उपयुक्त बैठता है. अब यह ज़मीन पहले से कुछ अधिक दरक गई है.
लेखकों को आशा थी कि इस पुस्तक के युवा पाठक इसकी बातों को आत्मसात करेंगे, और देश के लिए ऐसा रास्ता चुनेंगे जो सामाजिक समरसता का भी हो और संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग का भी.
इन पंक्तियों को लिखे हुए भी डेढ़ दशक हो चला. इस दरमियान इस ज़मीन की दरारें पहले से और चौड़ी होती गई हैं.
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माधव गाडगिल के बारे में बोलते वक़्त रामचंद्र गुहा हर बार उनकी सादगी, विनम्रता तथा जनतांत्रिक स्वभाव का ज़िक्र करते है. वे कहते हैं कि— ये वे गुण है जो किसी वैज्ञानिक या प्रभावशाली भारतीय में विरले ही पाए जातें हैं. उनमें और माधव गाडगिल की आयु में 16 बरस का अंतर था. भारतीय समाज में यह अंतर एक पीढ़ी का हो जाता है. आयु में इतना अंतर हो तो ज्ञान की दुनिया में गुरु-शिष्य का संबंध बनता है. पर उनके साथ माधव गाडगिल का रिश्ता सदैव मित्र और सहकर्मी का रहा.
गुहा यह भी कहते है कि सिर्फ़ उनके साथ ही नहीं, वे अपने रचनात्मक जीवन में भारत के मछुआरों, शिकारियों, किसानों, मज़दूरों, पर्यावरण विस्थापितों आदि जिसके भी साथ रहे, उसी के जीवन को अंगीकार कर लिया.
उनकी सरलता और भिन्नताओं को अंगीकार करने की ललक के प्रमाण उनकी आत्मकथा में जगह-जगह हैं. एक बार इंडियन अकैडमी ऑफ साइंस के 70 वर्ष होने पर एक व्याख्यान के सिलसिले में मिज़ोरम वे गए हुए थे. व्याख्यान के बाद दो दिन का समय इस पहाड़ी प्रदेश को घूमने के लिए तय हुआ था. सबेरे जल्दी निकले, साथ में दो मिज़ो छात्र भी थे. दोनों छात्र चुप और सहमे हुए से थे.
उन्होंने पूछा— आप लोग किस बात से डरे हुए हैं? क्या मैं ओग्रे जैसा हूं? छात्रों ने कहा— ‘नहीं सर, बात ये है कि यहां अधिकांश अध्यापक बीएचयू के हैं और गेस्ट भी ज़्यादातर वहीं के होते हैं. हमें अक्सर उन्हें आस-पास के गांव दिखाने और घुमाने का जिम्मा मिलता है. कुछ देर में ही उन्हें भूख लगने लगती है, और वे खाने के लिए जलेबी या बासुंदी वगैरह मांगने लगते हैं. सर, ये चीजें तो यूनिवर्सिटी गेस्ट हाउस में ही मिल सकती हैं और जब हम उन्हें बताते हैं कि यहां आसपास तो पोर्क सूप ही मिल सकता है. सुनते ही वे तमतमा उठते हैं. ‘कितना बर्बर चलन है, तुम लोग कब सुधरोगे?’ थोड़ी और देर तक गुस्से में बड़बड़ाते हुए वे वापस लौट जाते हैं.’
‘मैंने कहा, चिंता मत करो, मुझे पक्का यक़ीन है कि मुझे आपका पोर्क सूप भाएगा. तुरत उनके चेहरों पर चमक आ गई और मुझसे बातें करना शुरू कर दिया. वास्तव में वहां के देसी मसालों के साथ बना सूप बहुत स्वादिष्ट था.’
संस्कृतियों में विविधता पाई जाती है, किसी पर्यावरणविद और मानव विज्ञानी के लिए इसको अंगीकार कर सकना स्वाभाविक होना चाहिए.
आत्मकथा में ही अन्यत्र उन्होंने लिखा है कि उनके मित्र कैलाश चंद्र मल्होत्रा ने उन्हें सिखाया था—जब भी किसी अजनबी घर में जाओ, सबसे पहले एक गिलास पानी मांग लो. हमारे समाज में दूसरे धर्म और जातियों के यहां पानी पीने को लेकर तमाम वर्जनाएं हैं और ख़ुद से किसी घर से आपका पानी मांगना तुरत दूसरे को आपके प्रति सहज़ कर देता है, फिर आप उनसे आत्मीय रिश्ता बना सकते हैं.
उन्होंने लिखा है, ‘किस्मत से मेरी पाचन शक्ति इतनी जबरदस्त थी कि कुछ भी पचा लेता था और मेरी आदत बन गई थी जब कोई बोतल बंद पानी देता तो मना कर देता और जो पानी सब पी रहे हैं वही पीता.’
उनके अस्सी बरस के होने पर रामचंद्र गुहा ने उन पर लिखते हुए उन्हें ‘People’s Ecologist’ (जनता का पारिस्थितिकीविद्) कहा था. उनके लिए इससे अधिक उपयुक्त विशेषण नहीं हो सकता था.
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में शोधार्थी हैं.)
