पूर्व-राग: लेखक के निर्माण की यात्रा के बहाने जीवन की कुछ सीख

पुस्तक समीक्षा: जयशंकर जी की डायरी ‘पूर्व-राग’ एक लेखक के बनने की अंतर्कथा के रूप में ही नहीं एक लेखक की पढ़ने-लिखने के प्रति अपार आस्था और समर्पण के लिए भी पढ़ी जानी चाहिए. एक लेखक को वह दृष्टि प्राप्त करने के लिए पर्याप्त रियाज़ करना पड़ता है, ठीक किसी संगीतकार या अन्य किसी भी कला साधक की तरह. ये नोट्स उसी सतत अभ्यास के बीच लिखे गए आत्म-साक्षात्कार के क्षण हैं.

पुस्तक का कवर. (फोटो साभार: आधार प्रकाशन)

कविताओं की तरह ही कथेतर गद्य में कुछ बेहतरीन पढ़ने की तलब लगती है. अंग्रेज़ी में बहुत कुछ सुंदर मिलता रहता है, उन तक मेरा पहुंचना आसान रहता है. हिंदी में मैं अक्सर कुछ सार्थक, मोहक गद्य की तलाश में भटकती रहती हूं. कई बार कुछ साहित्यिक सान्निध्य माध्यम बनते हैं, कई बार नहीं. स्त्री होने के नाते कहूं या अपनी निर्मिति, बहुत समृद्ध करने वाले सान्निध्य से वंचित ही रह जाती हूं, जिनसे अच्छी किताबों, लेखकों तक पहुंचने का रास्ता बनता है. यही कारण है कि अच्छी पुस्तकों तक पहुंचने का रास्ता अक्सर लंबा हो जाता है.

कई ऐसे लेखक हैं, उनकी कितनी ही अद्भुत किताबें हैं, जो सोशल मीडिया के विज्ञापन से दूर अपने मौन, अपने एकांत में ख़ुद तक पहुंचने की प्रतीक्षा करती हैं. ऐसे ही भटकते हुए मैं जयशंकर जी की डायरी ‘पूर्व-राग’ तक पहुंचती हूं और यही थम जाती हूं.

कुछ ऐसी किताबें होती हैं, जिन्हें मैं हमेशा अपने आस-पास रखती हूं. दुविधा, भटकन, सुंदर पढ़ने की तलब या उलझन वालों दिनों के बीच कहीं से उनके पन्ने खोलती हूं, ज्यों मानस की राम शलाका में उत्तर खोजे जाते हैं, और वे किताबें मुझे थाम लेती हैं, उबार लेती हैं- रसूल हमज़ातोव की मेरा दागिस्तान, पेसोआ की द बुक ऑफ डिस्क्वाइट, काफ्का की डायरी, मेरी ऑलिवर की कविताएं, निर्मल वर्मा की धुंध से उठती धुन और बहुत कुछ, और ऐसी ही किताबों में इन दिनों ‘पूर्व-राग’ भी शामिल हो गई है.

पूर्व-राग एक लेखक की तड़प, तलब और तलाश के नोट्स हैं, जो न सिर्फ़ उसकी रचनाकार के तौर पर निर्मिति की यात्रा-कथा कहते हैं, जीवन और कला को बेहद संजीदगी से देखने-परखने-महसूसने का नज़रिया भी देते हैं. एक रचनाकार का जीवन, उसकी दृष्टि, उसके सुंदर और सार्थक के निरंतर संधान की वजह से औरों से अलग और असाधारण बन जाता है.

मनुष्य जीवन की नियति है कि वह बहुत साधारण, बहुत औसत दिनचर्या में उलझकर जीवन की असाधरणता से दूर होता जाता है. कला और साहित्य इसी साधारण में हस्तक्षेप कर, अपने परिवेश में उपस्थित असाधारणता को देखने-समझने की दृष्टि प्रदान करते हैं. वह असाधरणता, वह विशिष्टता अक्सर बहुत छोटी- छोटी घटनाओं, चीज़ों, दृश्यों में उपस्थित होती है, जिन्हें देख सकने की संवेदनशीलता और सलाहियत कला और साहित्य के माध्यम से मिलती है.

एक लेखक को वह दृष्टि प्राप्त करने के लिए पर्याप्त रियाज़ करना पड़ता है, ठीक किसी संगीतकार या अन्य किसी भी कला साधक की तरह. ये नोट्स उसी रियाज़, उसी सतत अभ्यास के बीच लिखे गए आत्म साक्षात्कार के क्षण हैं, जिन्हें पढ़ते हुए किसी भी युवा लेखक को उसकी अपनी यात्रा के लिए बहुत सारा रसद मिल जाने की संभावना है.

लेखक के निर्माण और आत्म संधान की यात्रा

एक लेखक के निर्माण और आत्म संधान की यह यात्रा इक्कीस की वय से आरंभ होकर चालीस के जिस पड़ाव पर रुकती है, वहां लेखक का ‘मैं’ एक समर्थ, संवेदनशील मनुष्य के रूप में निर्मित हो चुका दिखता है, जिसके पास अपने परिवेश को देखने की रचनात्मक और मौलिक दृष्टि है, जो अपने याचित एकांत में भी मित्रता, प्रेम, साथ के महत्त्व पर गहनता से सोचता है, जो निरंतर अपने आत्म मंथन द्वारा अपने प्रभावों, पूर्वाग्रहों, प्रतिक्रियाओं पर भी विचारता रहता है.

यह सुखद संयोग ही रहा कि लेखक की इस आत्म यात्रा से गुज़रने का अवसर जब मुझे मिला है, मैं भी चालीस की वय में हूं, थोड़ा बहुत जो लिखा- पढ़ा है, पर्याप्त नहीं लगता, रोज़ की दौड़ भाग और एक सम्मानित जीवन जी पाने के तमाम संघर्षों के बीच मुश्किल से लिखने-पढ़ने का वक्त चुराते हुए एक अनाम बेचैनी हावी रहती है. तब लेखक के इस पड़ाव का यह व्यर्थता बोध जैसे रुई के नरम फाहे की तरह मेरी तड़प पर पड़कर मुझे सुकून देता है और कहीं- कहीं एक सकारात्मक दिशा भी.

यह अज्ञात बेचैनी, यह व्यर्थता की भावना जो मुझे कभी-कभी भटकाने उठती है, शायद यहीं से आगे का रास्ता बनता है, शायद यहीं से अंतरसंवाद की प्रक्रिया और सघन होती जाती है. जयशंकर लिखते हैं:

‘लिखते-लिखते लगभग बीस बरस होने को आए हैं, लेकिन जब कभी अपना कुछ बेहतर-सा, कुछ कम नाक़ामियां लिया हुआ भी पढ़ता हूं, तब अपने लिखने से गहरी निराशाएं ही हाथ आती हैं. …अपनी किशोरावस्था के दिनों में गरीबी, अभावों और संघर्ष के दिनों में मेरे साथ कितने संकल्प हुआ करते थे. कितने सारे स्वप्न, क्या हुआ उन सबका?

इस बरस बीसवीं सदी समाप्त हो रही है. क्रिसमस में अपनी जिंदगी के इकतालीस बरस पूरे करूंगा. अपने जीने की बंजरता पर शर्म आती है. खुद को कथाकार समझने में संकोच होता है. मेरे ऊपर किसी के हँसने की आवाजें आती रहती हैं और कभी-कभार खुद के रोने की आवाज भी.’

बेहतरीन फ़िल्मों, किताबों, लेखकों के साथ यात्रा कराती लेखक की यह नोटबुक जाने-अनजाने आपके अंदर के रचनाकार को भी रियाज़ के पर्याप्त सूत्र थमाती चलती है. इन सबसे अधिक जिस चीज़ ने मुझे इस नोटबुक से जोड़ा, वह लेखक का अपने जीवन से जुड़े लोगों, रिश्तों के बारे में अंतरसंवाद है, जिसे लेखक एकालाप कहते हैं, लेकिन उससे गुज़रता हुआ पाठक भी उस संवाद का हिस्सा बनता जाता है और उसके परिप्रेक्ष्य में अपने सबंधों, उनकी जटिलताओं, पूर्वाग्रहों, अपेक्षाओं को तौलता जाता है.

चालीस के इस पड़ाव में मैं भी अक्सर बीती ज़िंदगी पर नज़र डालती हूं, और एक निचाटता की भावना घेर लेती है. सोचती हूं, प्रेम हो या मित्रता, कहां चूक रह जाती है कि अक्सर हासिल अधूरापन होता है.

मोहभंग के बाद भी कहीं कुछ तो जुड़ा बचा रहता है

कोई किस प्रकार अपनी संपूर्ण प्रतिबद्धता देने के बाद भी बदले में कोई उम्मीद न रखे! क्या इस प्रकार की संन्यासियों-सी निरपेक्षता संभव है! मोहभंग के बाद भी कहीं कुछ तो जुड़ा बचा रहता है, जो दुखता है, टीसता है! हर कोई, चाहे किसी भी रूप में जीवन से जाता है, जाते हुए हमारे अंदर भी कुछ बदलता जाता है. शायद हम पहले से अधिक आशंकित, भयभीत और पूर्वाग्रह पालने वाले एक विरक्त मनुष्य बनते जाते हैं, जिसे हर नए जुड़ने वाले को संदेह से देखने की आदत हो जाती है.

अपने याचित एकांत के बाद भी उस एक सान्निध्य की तलाश हम सब को ताउम्र होती है, जो हमारे एकांत को और समृद्ध करता हो, हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने की ओर बढ़ाता हो. जबकि ऐसे साथ की कामना भी अब धीरे- धीरे एक ऐसे यूटोपिया में तब्दील होता गई है जो आज के अस्थायी सबंधों, तमाम विविधताओं और विकल्पों के चयन की अबाध स्वतंत्रता वाले समय में असम्भव जान पड़ता है.

जयशंकर अपने चयनित एकांत से बाहर आना चुनते हुए प्रायः दुविधा और संशय की स्थिति में होते हैं. किसी साथ से पाली गई उम्मीदें और उनकी टूटन, उनके लिए चाहे जितनी पीड़ादायक हो, दूसरे व्यक्ति के परिप्रेक्ष्य में उसका कारण समझने का प्रयास करते हुए, स्वयं को शायद एक ऐसी निर्लिप्तता के लिए तैयार करते हुए, जहां दूसरे से कोई उम्मीद नहीं हो, ना ही स्वयं के कारण उसे तनिक भी पीड़ा हो.

मित्रता, साथ, शायद प्रेम भी, पर उनके आत्मालाप को बार-बार पढ़ती हुई, रेखांकित करती हूं, शायद ऐसा ही कुछ सोचना मुझे भी मेरी मनःस्थिति से निजात दिला सके-

‘हमें अपने जीवन मे आए लोगों को कम-से-कम अपने ढंग से सुखी होने के लिए छोड़ देना चाहिए भले ही इससे हमारे भीतर दुख जन्मता हो.……………क्या मानवीय संबंधों को उनकी समूची सजीवता और निरंतरता के रहते किसी सीमा में बांध पाना सरल होता होगा?

हमारी आकांक्षाएं, हमारे विश्वासों को छलने लगती हैं. हमने जिस तरह जो कुछ सोचकर अपने किसी संबंध की शुरुआत की थी उसकी हल्की-सी छायाएं बची रहती हैं और हम किसी दूसरी धुन के बीच, किसी अंजानी धुंध के बीच अपने आपको पाते हैं. यह मनुष्य होने की विडंबना है. तब यही मनुष्य होने का सुख भी.’

एक मनुष्य और लेखक के तौर पर अपनी इस लघु यात्रा में मुझे यह भी लगता है कि बहुत सी व्यर्थ चीज़ों, लोगों, घटनाओं से जुड़ती गई, कई बार लोगों ने अपने लाभ के लिए मुझे चुना और मेरी रचनात्मक ऊर्जा को कहीं-न कहीं दिशाहीन किया. जी पाने का ही संघर्ष इतना समय लेता है कि उसमें कुछ रचनात्मक सोचने का समय बहुत छल से उससे चुरा लेना पड़ता है, ऐसे में कई ऐसी जगहों, प्रसंगों और लोगों से बहुत दूरी बनाकर ही हम कुछ सार्थक लिखने- पढ़ने का सोच सकते हैं.

विशेषकर इन दिनों जब हमारे आसपास बहुत सी अनुर्वर लेकिन चमकीली चीज़ें हैं, जो सिर्फ़ हमें नष्ट ही कर सकती हैं. लेखक के नोट्स पढ़ती हूं-

‘फ्रांज काफ्का ने छोटा-सा जीवन जिया था लेकिन कितना गंभीर जीवन. उनका अपना संघर्ष और समर्पण हमें कितना कुछ बता जाता है. वे सदा ही लेखक के लिए अनिवार्य एकांत की खोज करते रहे. अपनी अस्वस्थता के बीच और बावजूद लिखते रहे. रूसी लेखक एंटन चेखव की तरह. काफ्का के पिता को लिखे गए पत्र का हिंदी अनुवाद आया है. उसे पढ़ने की शुरुआत की. दुपहर में गोरा और मैं सौरभ में बैठकर बातचीत करते रहे. दुपहर का ही कुछ वक्त कॉफी हाउस में इला जी के साथ.

लेखकों के लिए अपने काम के प्रति निष्ठा और उसके लिए जरूरी साधना और श्रम पर कुछ बातचीत. गैर जरूरी, बंजर और बनावटी किस्म की सामाजिकता और सजावट से बचने के लिए प्रयत्न की जरूरत.’

पूर्व-राग एक लेखक के बनने की अंतर्कथा के रूप में ही नहीं एक लेखक की पढ़ने-लिखने के प्रति अपार आस्था और समर्पण के लिए भी पढ़ी जानी चाहिए. एक ऐसा लेखक जो अपने जीवन की हर रिक्तता, हर कमी को शब्दों की ऊष्मा से भर देना चाहता है. जो जीवन के हर उतार-चढ़ाव, लोगों और घटनाओं की प्रतिकूलता के बीच व्यर्थ होते जीवन को सार्थक करने का एकमात्र हल कला और साहित्य को मानता है.

ओलिविया लैंग की ‘द लोनली सिटी’

पढ़ने-लिखने के प्रति ऐसी गहन निष्ठा और अनुराग एक लेखक की आत्मा को नष्ट होने से बचाए रखती है, उसे कुछ सुंदर, कुछ महत्त्वपूर्ण रचने के लिए प्रेरित करती रहती है. पूर्व-राग पढ़ते हुए मुझे ओलिविया लैंग की ‘द लोनली सिटी’ की याद आती रही.

ओलिविया भी जीवन की तमाम रिक्तताओं और एकाकीपन के बीच कला को एक ऐसे जरिए के रूप में देखती हैं जो भले ही हमें हमारे खालीपन और दुखों से निजात नहीं दे सके, उन्हें पूरी गरिमा और सौंदर्य से सहने की ताकत ज़रूर देती है. हम अपनी रिक्तताओं के बीच भी समृद्ध होने की कला सीखते जाते हैं. पूर्व-राग को पढ़ते हुए ठीक यही हासिल होता है.

‘ऐसी बहुत सी चीज़ें हैं जो कला नहीं कर सकती. …….फिर भी, इसके कुछ असाधारण काम हैं, लोगों के बीच संवाद करवाने करने की कुछ विचित्र-सी क्षमता है, जिसमें ऐसे लोग भी शामिल हैं जो कभी मिलते नहीं हैं और फिर भी एक-दूसरे की ज़िंदगी में शामिल होकर उसे बेहतर बनाते हैं. इसमें निकट लाने की क्षमता है; इसमें दुखों को भरने का एक तरीका है, और इससे भी बेहतर, यह दिखाने का तरीका है कि सभी पीड़ाओं से मुक्ति की आवश्यकता नहीं होती और मन पर छूट गए सभी दाग बदसूरत नहीं होते.’ (द लोनली सिटी)

शायद यह वही विचित्र-सी क्षमता है जो दशकों का अंतराल पारकर दो मनुष्यों के बीच संवाद करवाती है. एक लेखक चालीस की वय में जिन प्रश्नों से जूझता हुआ अपने लेखन और जीवन को एक दिशा देने का प्रयास कर रहा था, आज उसी वय में, लगभग उसी मनोदशा से गुज़रती हुई, अनायास ही अपने जीवन के रियाज़ के कुछ तरीके सीख लेती हूं.

(रश्मि भारद्वाज कवयित्री और अनुवादक हैं.)