नए साल की शुरुआत में हमारे समय के लेखकों और चिंतकों ने अपनी अलमारी से पिछले साल क्या सब पढ़ा, इसकी चर्चा हम कर रहे हैं अपनी साहित्यिक शृंखला ‘लेखकों की अलमारी से’ में. लेखक जो स्वयं लिखते हैं, वह किन्हें पढ़ते हैं, सराहते हैं, एक अच्छा ज़रिया है न केवल प्रचलित पुस्तकों की समीक्षा का बल्कि उन रचनाओं को भी जानने का जो प्रसिद्धि से दूर रहकर भी कुछ मानीखेज़ कह जाती हैं. इस भाग में सविता सिंह की अलमारी पर नज़र, श्रृंखला की चौथी और अंतिम क़िस्त में:
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इस साल (2025) जो मैंने किताबें पढ़ी उनकी संख्या तो बहुत है लेकिन कुछ कविता संग्रह के ब्लर्ब मैंने लिखे, जिसकी वजह से उनको मैंने बहुत ध्यान से पढ़ा. वैसे तो कविता की दुनिया में ही मेरा जीवन आजकल लिप्त रहता है. मैं मुख्यतया कवि ही हूं इसीलिए यहां मैं कुछ हाल ही में आई कविता संग्रहों की बात करूंगी.
अभी निवेदिता झा की एक किताब आई है. वाणी प्रकाशन से आई इस किताब का शीर्षक है ‘आवाज़ एक उम्मीद है‘. इसमें एक खास किस्म से समाज में चल रहे भीषण अंतर्विरोध, खास करके उसमें स्त्रियों की जो दुर्दशा हो रही है, उससे मुताल्लिक बहुत सारी कविताएं हैं. तो यह किताब पढ़ते हुए मुझे लगा कि इसमें इन सारी बातों को बहुत ही राजनीतिक ढंग से और समझदारी से उठाया गया है.
मैंने उसके ब्लर्ब में यह लिखा है कि पूंजीवादी पितृसत्तात्मकता, एक दूसरी ज्यादा आक्रामक विकृत व्यवस्था बना रही है, जिसे हम देख पा रहे हैं. हर जगह नए-नए तानाशाह पैदा हो रहे हैं. वे अपने को ईश्वर कह रहे हैं और उनके फ़रमान से दिन और रातें हो रही हैं. कविता हक्का बक्का है कि यह क्या हो रहा है और अंततः फिर बोल ही उठती है कि इस दुनिया को प्रेम ही रच सकता है और अब इसके लिए ही लड़ना है.

अभी तो दुनिया की स्त्रियों ने आंख भर चांद को भी नहीं देखा. उन्हें अभी खरबों तारों का हिसाब लगाना बाकी है. वे उन्हें गिनना चाहती हैं. कायनात को समझना चाहती हैं. कोई भी समाज या देश इन इच्छाओं की पूर्ति किए बगैर, ढहाया नहीं जा सकता. वैसे भी सभ्यता के ऐसे मोड़ पर हम आ खड़े हुए हैं जहां से प्रकृति विदा ले रही है. ऐसे गहरे ख़तरों को समझती है कविता. इस संग्रह की कविताएं एक दूसरा अवसर मांगती हैं, इस संसार को नए ढंग से रचने के लिए. निवेदिता की यह कविताएं हमारे समय की विलक्षण उपलब्धियां है. इन्हें पढ़ते हुए अहसास होता है कि अभी कितने ही फूलों को खिलना है, उगना है और स्त्रियों को उन्हें गिनना है और इस दुनिया को न्यायपूर्ण और सुंदर बनाना है.
दूसरी किताब देवयानी की है, जिसका शीर्षक है ‘उसकी इच्छाओं में बारिश थी‘. यह संग्रह भी बहुत ही सुंदर संग्रह है जिसमें स्त्री का प्रकृति को देखने का एक नया नज़रिया सामने आता है. कविताएं यह सम्प्रेषित करती हैं कि जो स्त्री पुरुष का नहीं बल्कि बारिश का इंतजार करती है उसका दमन नहीं हो सकता, यानी कि जो स्त्री प्रकृति से जुड़ जाती है उसका संसार वृहत हो जाता है और उसका दमन मामूली इंसान नहीं कर सकता है. उसके साथ प्रकृति रहती है.

इस बात को बहुत सारे लोग गंभीरता से नहीं लेते हैं, लेकिन जब यह संभव होगा कि प्रकृति और स्त्री एक हो जाए तो निश्चित रूप से यह सभ्यता, ख़ासकर कि यह पूंजीवादी सभ्यता बदल जाएगी. इस तरह की बातें मैं अपनी कविताओं में भी कहती रहती हूं और जब दूसरे लोग भी इस तरह से कविता को देखते हैं तो अच्छा लगता है.
इसके अलावा मेरी दुनिया काफ़ी आक़दमिक है, तो अभी हाल ही में मैं एक इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस जो कि इंटरनेशनल हर्बर्ट मार्क्यूज़े सोसाइटी द्वारा आयोजित था, उसमें सम्मिलित हुई थी और उसमें मैंने ‘अचीविंग ग्रीन कॉमनवेल्थ’ पर बात की. एक मार्क्यूजन फिलॉसफर है चार्ल्स रिट्ज़, उनकी किताब है ‘इकोलॉजी एंड रिवॉल्यूशन‘, उसके संदर्भ में मैंने कुछ बातें कीं.

उस किताब पर बोलने के सिलसिले में मैं यह किताब पढ़ गई थी. बहुत ही मानीखेज किताब है यह. इस किताब में यह बतलाया गया है कि कैसे अब दुनिया में मनुष्य कोई भी क्रांति सिर्फ अपने वर्गों के हितों बारे में सोचते हुए नहीं कर सकते हैं जब तक कि प्रकृति को भी अपने सरोकार में उसी ढंग से शामिल नहीं किया जाएगा. तब तक वाक़ई कोई रिवॉल्यूशन संभव नहीं है क्योंकि जो टेक्नोलॉजी है और टेक्नोलॉजी को बरतने वाले जो लोग हैं, वह उसके मालिक हो गए हैं. इसलिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल उनके अपने हितों को साधने के लिए है ना कि पूरी मनुष्यता को मुक्त करने के लिए.
तकनीक का आविष्कार, मनुष्य के श्रम को कम करने के लिए, उसके समय को जिसमें वह सोच सके, पढ़ सके -जिसको लीज़र टाइम कहते हैं- अवकाश का समय बढ़ा सके, उसके लिए किया गया था. मार्क्स की तकनीक संबंधी जो यह कल्पना थी, वह एक तरह से धूमिल कर दी गई है. पूरी दुनिया में जिस तरह से अरबपतियों-खरबपतियों का आगमन हुआ उसने पुरानी यूटोपिया को एकदम समाप्त कर दिया है क्योंकि प्रचंड ढंग से वह केवल अपने हितों के बारे में सोच रहा है.
(अदिति भारद्वाज के साथ बातचीत पर आधारित.)
