यूजीसी समानता नियमों के विरोध ने भेदभाव के बदलते स्वरूप को उघाड़ के रख दिया है

जो लोग यह तर्क देते हैं कि 'भारत में अब जातिवाद नहीं होता' या 'हमने कभी पिछड़ों के साथ भेदभाव नहीं किया', उनके लिए अफ्रीकन इतिहासकार चिनुआ अचेबे का यह मत याद रखना ज़रूरी है कि इतिहास को सिर्फ शिकारी की निगाह से न देखें, बल्कि उसे शिकार होने वाले की निगाह से भी देखें, तब असली सच्चाई समझ में आती है.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

जनवरी 2026 की कड़कड़ाती ठंड में उत्तर भारत के विश्वविद्यालय परिसरों का राजनीतिक पाराउच्च शिक्षण संस्थानों में समता संवर्धन विनियमने एकाएक बढ़ा दिया है. जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) के ढाबे पर चाय के बीच होने वाली बहसों से लेकर इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रसंघ भवन  तक, यह दस्तावेज़ इस समय चर्चा के केंद्र में है.

एक ओर जहां बहुजन छात्र संगठन इसे रोहित वेमुला और पायल तड़वी जैसे संघर्षों की परिणति और सामाजिक न्याय की एक बड़ी जीत मान रहे थे, वहीं ‘सामान्य’ वर्ग का एक धड़ा इसेकाला कानूनकरार देकर इसके विरोध में सड़कों पर उतर आया.

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के लंका गेट से लेकर पटना और दिल्ली विश्वविद्यालय के गलियारों तक, यह नोटिफिकेशन केवल एक प्रशासनिक आदेश न रहकर अस्मिता की लड़ाई का जरिया बन गया है. इस मुद्दे की ऊर्जा का इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि पिछले पांच वर्षों से उत्तर प्रदेश में योगी के राज में छात्रसंघ चुनाव नहीं हुए, कोई छात्रसंघ नहीं है उसके बाद भी छात्र हज़ारों की संख्या में सड़कोंपर स्वतः निकल रहे हैं.

यह मुद्दा अब सामाजिक मुद्दा हो चुका है. इसी बीच, माननीय न्यायालय द्वारा इस विनियम के क्रियान्वयन पर लगाए गए अंतरिम रोक (स्टे) ने कैंपस के इस तनाव को एक नया और पेचीदा मोड़ दे दिया है.

कोर्ट के इस हस्तक्षेप को एक पक्ष अपनी नैतिक जीत बता रहा है, तो दूसरी तरफ इसे वंचित वर्गों के संवैधानिक अधिकारों को रोकने की साजिश के तौर पर देखा जा रहा है.

13 जनवरी के इस नोटिफिकेशन और उसके बाद छिड़ी कानूनी जंग ने भारतीय छात्र राजनीति को दो स्पष्ट ध्रुवों में बांट दिया है. अब यह संघर्ष केवल हॉस्टलों और सड़कों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संविधान, मेरिट और आरक्षण की पुरानी वैचारिक लड़ाई एक बार फिर अदालत के दरवाजों से होकर देश के भविष्य की दिशा तय करने को आतुर है.

रॉल्स का ‘केक’ और बांटने वालों की नीयत

इस पूरे विवाद के केंद्र में जॉन रॉल्स कीडिस्ट्रिब्यूटिव जस्टिस‘ (वितरणात्मक न्याय) की वह थ्योरी याद आती है, जिसमें केक काटने का उदाहरण दिया गया है. रॉल्स कहते हैं कि यदि किसी को पहले से बताकर केक काटने के लिए कहा जाए, तो वह अपने हिस्से में ज्यादा केक काट लेता है. लेकिन यदि उसे यह पता हो कि उसे कौन-सा टुकड़ा मिलेगा, तो वह बराबर हिस्सा काटता है.

भारतीय विश्वविद्यालयों मेंकेक‘ (संसाधन, पद और सम्मान) काटने वाले जो लोग शीर्ष पर बैठे हैं, वे दरअसल इसे सभी में बांटना ही नहीं चाहते. वे अपने वर्चस्व को बनाए रखना चाहते है जो हमे पीएचडी के एडमिशन से लेकर प्रोफेसर्स की नियुक्तियों तक देखने को मिलती है, उत्तर भारत के विश्वविद्यालयों में पिछले 25 सालों में एक अनूठा और विरोधाभासी छात्र आंदोलन देखने को मिला है.

यह आंदोलन अब दो स्पष्ट हिस्सों में बंटा है: एक वह जो सुप्रीम कोर्ट की रोक से पहले था, और दूसरा जो रोक के बाद शुरू हुआ और लगातार वृहद स्वरूप ले रहा जिसे मेनस्ट्रीम मीडिया दिखाने से बच रहा.

जब सामान्य वर्ग के छात्र सड़कों पर आए, तो महज दो दिनों के भीतर कोर्ट में सुनवाई के दौरान नए यूजीसी इक्विटी बिल पर रोक लगा दी गई. यह वही दौर था जब ‘हिंदू हृदय सम्राट’ कहे जाने वाले नरेंद्र मोदी रातों-रात ‘सवर्ण’ प्रदर्शनकारियों के लिए केवलतेलीबन गए, प्रदर्शनों में बोला गया कितेलिया तेल लगा दिया.’

गोंडा में तो नारे लगे कि मोदी तेरी कब्र खुदेगी यूजीसी की धरती पर, लेकिन उन पर कोई मुकदमा नहीं हुआ, उनका कोई मीडिया ट्रायल नहीं चला. इसके विपरीत, जब इसी तरह के नारे जेएनयू में लगे, तो छात्रों पर मुकदमों की झड़ी लगा दी गई और विश्वविद्यालय प्रशासन उन्हें फ्रिंज एलिमेंट घोषित करने लगा.

यह विरोधाभास दर्शाता है कि भारत में सामान्य वर्ग के लिए सरकार के पास अलग कानून है साथ ही जनरल कास्ट के आंदोलन में लगे नारे दर्शाते है कि उनके लिएक्लास‘ (वर्ग) मायने नहीं रखता, उनके लिए आपकी पहचान आपकी जाति ही रहेगी.

आप प्रधानमंत्री बन जाएं याअपर क्लासमें शामिल हो जाएं, लेकिन यथास्थितिवादी (status quo) सोच के लिए आपतेलियाही रहेंगे, पिछड़े ही रहेंगे. इसी सोच के ख़िलाफ़ यह रूल आया था. यही हाल शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का हुआ, जिन्हें दक्षिणपंथियों ने ओबीसी होने के कारण जातिसूचक गालियां दीं.

राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव

इतिहास गवाह है कि जब सरकार की मंशा साफ होती है, तो कानून अदालतों में नहीं रुकते. जब ईडब्ल्यूएस आरक्षण लाया गया, तो उसे भी कोर्ट में चुनौती दी गई, लेकिन वह नहीं रुका. वीपी सिंह के समय जब ओबीसी आरक्षण आया, तो भीषण विरोध के बावजूद वह लागू हुआ, न्यायालय में चैलेंज हुआ और नहीं रुका.

लेकिन यूजीसी का यह इक्विटी रूल, जो पहली बार आधिकारिक तौर पर यह स्वीकार कर रहा था कि ओबीसी छात्रों के साथ भी परिसरों में भेदभाव होता है, कोर्ट में जाते हीपिटगया. यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि मौजूदा सरकार की इस नियम को लेकर कोई ठोस राजनीतिक इच्छाशक्ति थी ही नहीं.

यह नियम दरअसल पिछड़ों को दिया गया एकलॉलीपॉपथा, जिसका मकसद छात्रों को बुनियादी मुद्दों से भटकाकर आपस में लड़ाना था. सरकार ने एक ऐसा कच्चा नियम पेश किया जो कानूनी कसौटी पर टिक ही सके, ताकि सवर्ण और ओबीसी छात्र एकदूसरे से भिड़ने लगें और सत्ता सुरक्षित रहे.

यदि मोदी सरकार वाकईबहुजन हितैषीहै, तो वह इस नियम को यूजीसी के पिछले दरवाजे से क्यों लाई?

आंदोलन कर रहे छात्र यह मांग कर रहे है कि इसे संसद में एक पूर्णविधेयकके तौर पर लाया जाए. जब तक यह संसद से पारित कानून नहीं बनेगा, तब तक इसे केवल एक राजनीतिक स्टंट ही माना जाएगा.

‘शिकारी’ और ‘शिकार’ का परिप्रेक्ष्य

जो लोग यह तर्क देते हैं किभारत में अब जातिवाद नहीं होतायाहमने कभी पिछड़ों के साथ भेदभाव नहीं किया‘, उनके लिए अफ्रीकन इतिहासकार चिनुआ अचेबे का यह मत याद रखना जरूरी है कि इतिहास को सिर्फ शिकारी की निगाह से देखें, बल्कि उसे शिकार होने वाले की निगाह से भी देखें, तब असली सच्चाई समझ में आती है.

विश्वविद्यालय में एक एससी/एसटी/ओबीसी छात्र क्या झेलता है, यह वही जानता है. एक छात्र चाहे यूनिवर्सिटी टॉप कर ले, फिर भी उसेकोटे वालाही कहा जाता है. भेदभाव अदृश्य भले कहा जा रहा है, लेकिन गहरा है. केंद्रीय विश्वविद्यालयों में ओबीसी के 80% पदों का खाली होना इस भेदभाव का सबसे बड़ा दस्तावेजी प्रमाण है.

कागज पर देखें तो 2026 के नियम ऐतिहासिक दिखते हैं. 2012 के नियम महजएडवाइजरीथे, लेकिन 2026 के ये नियमबाध्यकारी’ (mandatory) बनाए गए थे. इसमें शिकायत के 24 घंटों के भीतर बैठक और 15 दिनों में जांच पूरी करने का प्रावधान था. लेकिन इसका विरोध एक विशेष परिभाषा पर केंद्रित कर दिया गया. विनियम 3(c) में कहा गया कि जातिगत भेदभाव आरक्षित वर्गों के खिलाफ होता है.

‘सवर्ण’ इसे समानता का उल्लंघन कह रहे हैं, पर वे यह नहीं समझते कि जाति सत्ता की एक संरचना है. एक सवर्ण छात्र को उसके सरनेम की वजह से कभीअशुद्धनहीं माना गया. उसे इस वजह से कहीं कमरे देने से नहीं रोका गया.

मगर इस नियम का असलीखेलइसके क्रियान्वयन में है. नियम कहता है किसमता समितिका अध्यक्ष कुलपति (वीसी) होगा. हम जानते हैं कि पिछले एक दशक में कुलपतियों की नियुक्ति किस आधार पर हुई है. क्या एक पार्टी कैडर की तरह काम करने वाला कुलपति अपने ही विचारधारा के प्रोफेसर के खिलाफ कार्रवाई करेगा?

यह कानून हमें कागज पर ताकतवर बनाता है, लेकिन जमीन पर हमें उसी प्रशासन के सामने गिड़गिड़ाने को मजबूर करता है जो खुद इस व्यवस्था का हिस्सा है, इस नियम में संस्था के प्रमुख (कुलपति या प्रिंसिपल) को पदेन अध्यक्ष बनाया गया है, जबकि पदेन अध्यक्ष किसी बाहरी व्यक्ति को बनाना चाहिए .

साझा दुश्मन की पहचान करें

आज उत्तर भारत के विश्वविद्यालयों में साझा दर्द गायब हो गया है. छात्र अबफीस वृद्धियाबेरोजगारीपर बात नहीं कर रहे, बल्कि इस बात पर लड़ रहे हैं कि यूजीसी का नियम सही है या गलत. सत्ता यही चाहती थी. जब तक छात्र आपस में जाति के नाम पर लड़ेंगे, तब तक कोई सरकार से यह नहीं पूछेगा कि लाइब्रेरी में किताबें क्यों नहीं हैं या नौकरियां क्यों खत्म की जा रही हैं.

यह लड़ाई सवर्ण बनाम अवर्ण की नहीं, बल्किशिक्षा बनाम सत्ताकी है. सवर्ण छात्रों को समझना होगा कि उनका हक दलित छात्र नहीं मार रहा, बल्कि वह निजीकरण मार रहा है जो शिक्षा को एक उत्पाद बना रहा है. और बहुजन समाज के छात्रों को समझना होगा कि यह सरकार उनके जख्मों पर सिर्फ मरहम का नाटक कर रही है.

हमें मांग करनी चाहिए कि इसइक्विटी रूलको संसद में विधेयक के रूप में लाया जाए. अगर हम अब भी नहीं जागे और उस हाथ को नहीं पहचाना जो यह शतरंज खेल रहा है, तो इतिहास हमें माफ नहीं करेगा.

दिल्ली से लेकर प्रयागराज तक और पटना से लेकर लखनऊ तक, इस पाखंड को पहचानिए. एकजुट हो जाइए, क्योंकि जब तक हम व्यवस्था बदलने के बजाय आपस में लड़ते रहेंगे, ‘शिकारीकी जीत तय है.

(लेखक जेएनयू के सेंटर फॉर हिस्टॉरिकल स्टडीज के शोधार्थी हैं और एनएसयूआई से जुड़े हैं.)