ज्ञानरंजन (1936-2026) कथाकार होकर भी पारंपरिक अर्थों में कथाकार नहीं रहे. उन्होंने सत्तर के दशक में अपनी चरम ख्याति के दौर में अपने कहानीकार को रोक दिया, विश्राम दिया और पूरी तरह से हिंदी पत्रिका ‘पहल’ के संपादन के साथ-साथ मौजूदा साहित्यिक-सांस्कृतिक वातावरण को बदलने में जुट गए.
इस अर्थ में ज्ञान जी दो टूक थे. उन्हें जो काम करना है, उसके लिए फिर उसे पूरा करने के लिए हर जोखिम उठाने को तैयार रहते थे. ‘इस महादेश के वैज्ञानिक विकास’ के लिए गोया स्टीम रेल इंजन में कोयले की तरह उन्होंने खुद को पूरी तरह ‘पहल’ में झोंक दिया.
एक स्थानीय पत्रिका को अपने सीमित संसाधनों से पांच दशक तक निकालते रह सकना, उसे देश के कोने-कोने के प्रबुद्ध और विचारवान पाठकों की अनिवार्य पत्रिका बना देना, ज्ञान जी की रचनात्मकता का बड़ा आयाम है.
ज्ञानरंजन जी के 90 वर्षीय सतत सक्रिय, कर्मठ और वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध जीवन के कई आयाम हैं. इलाहाबाद में बीता उनका किशोर और युवा जीवन, यहां दोस्तों के साथ बिताया गया लगभग विद्रोही और बोहेमियन जीवन, यहीं उनका कथाकार बनना, सुनयना जी से प्रेम फिर विवाह, नौकरी की खातिर इलाहाबाद से जबलपुर आना और फिर जबलपुर को एक सांस्कृतिक केंद्र बना देना.
जबलपुर आना उनके लिए कई अर्थों में निर्णायक सिद्ध हुआ. यहां हरिशंकर परसाई जी रहते थे, प्रगतिशील लेखक संघ मध्य प्रदेश के केंद्रीय व्यक्तित्व. ज्ञान जी इस बात को स्वीकारते हैं कि परसाई जी से मिलने के बाद ,उनके सानिध्य में उनके जीवन में बहुत बड़ा बदलाव आया. इसके बावजूद उनके व्यक्तित्व में आजीवन एक अपनी ही किस्म की अराजकता रही.
मार्क्सवाद और उसके लक्ष्यों के प्रति बेहद गहरी प्रतिबद्धता
यह अराजकता किसी ‘हीरोइज्म’ मार्के की नहीं थी जिसमें केवल वही केंद्र में होता है, बल्कि मार्क्सवाद और उसके लक्ष्यों के प्रति बेहद गहरी प्रतिबद्धता रखते हुए विकसित होने वाली सकारात्मक और गहरे सामाजिक सरोकारों से लैस.
एक साक्षात्कार में वह कहते हैं, ‘एक छात्र के रूप में, अध्यापक के रूप में, संगठक के रूप में मैंने कठोर नैतिकताओं के साथ काम किया पर अराजकता मेरी आत्मिक शक्ति थी. वह प्रतिरोध को जीवित रखती है. अराजकता मेरे व्यक्तित्व और सृजनात्मक क्रियाकलापों का नमक है. ’
ज्ञान जी का व्यक्तित्व किंतु-परंतु के ढुलमुलपने वाला बिल्कुल नहीं था, उनके निर्णयों में त्वरा होती थी. अपने साक्षात्कारों में वह कहते कि मैं हमेशा ‘फोर्थ गियर’ में रहता हूं.
ज्ञान जी के भीतर अपने समय, समाज को लेकर एक भीषण और विस्फोटक बेचैनी थी. उनकी कहानियां हिंदी कथा साहित्य में एक नई लकीर खींचती हैं. ये परंपरागत रूप से चली आती यथार्थवादी कहानियों से अपने कथावस्तु और शिल्प में बहुत भिन्न हैं. उनकी कहानियों को मोटे तौर पर तत्कालीन समाज, व्यवस्था, और सड़ी-गली रूढ़ियों, यथास्थितिवादिता के खिलाफ क्षुब्ध युवा बौद्धिक के असहमति और विरोध के पर्याय के रूप में देखा जा सकता है.
उनकी पीढ़ी को साठोत्तरी कथा पीढ़ी के तौर पर याद किया जाता है, जिसमें ज्ञान जी के साथ काशीनाथ सिंह, दूधनाथ सिंह, रविंद्र कालिया, मार्कंडेय प्रमुख हैं. ये अपने समय को पहले से कहीं ज्यादा सूक्ष्मता से देख रहे थे.
उस दौर में आते नैतिक और मूल्यगत बदलाव, भ्रष्ट्राचार उनकी कहानियों में बहुत प्रबलता से प्रकट होते हैं. ज्ञान जी की ‘घंटा’, ‘फेंस के इधर और उधर’, ‘बहिर्गमन’, ‘हास्यरस’, ‘अनुभव’, ‘संबंध’ जैसी बेहद चर्चित कहानियां अपने समय की जटिलताओं को, उसके अंतर्विरोधों को बेहद निर्ममता से दिखाती हैं.
उनकी कहानियां भीतर गहरी बेचैनी और उद्वेलन भर देती हैं
ज्ञान जी की अधिकांश कहानियां आत्मपरक शैली में हैं जो तत्कालीन संशलिष्ट यथार्थ को सीधे और गहरे उतारती हैं. इनके पाठ का आस्वाद परंपरागत कहानियों से बिल्कुल भिन्न हैं. ये पाठक को किसी मार्मिक दृश्य, या आनंद में विभोर नहीं करतीं, बल्कि इसके उलट उनके भीतर गहरी बेचैनी और उद्वेलन भर देती हैं.
ये कहानियां अपनी समग्रता में उस पूरे छल, आडंबर और नैतिक क्षरण को पूरी शक्ति से दिखाती हैं जो मध्यवर्ग में बड़ी तेजी से पसर रहा था. इसे रेखांकित करते हुए आलोचक विश्वनाथ प्रसाद त्रिपाठी लिखते हैं, ‘जीवन के प्रति ज्ञानरंजन की दृष्टि बड़ी तीखी और आलोचनात्मक है. वे अत्यंत क्रूर होकर मानवीय संबंधों की छानबीन करते हैं और व्यक्ति के भीतर छिपे सही चोर को पकड़ लेते हैं. ‘
वहीं हमारे समय के विशिष्ट और संजीदा कथाकार योगेंद्र आहूजा लिखते हैं, ‘ये कहानियां आज भी उसी तरह विचलित और परेशान करती हैं, जिस तरह पहली बार प्रकाशित होने पर किया था. आज भी वे भीतर कोई न कोई मंथन,बहस या संवाद शुरू करती हैं और उनके सवालों, ख्यालों और आग्रहों में से कुछ आपकी जीवन दृष्टि का हिस्सा बनकर हमेशा साथ रहता है. अभी तक वे ठंडी, निर्जीव, निरावेग और ‘कालातीत’ नहीं हुईं. यह इनकी सबसे बड़ी ताकत है. ‘
यूं देखा जाए तो ज्ञान जी, कहानियों में ही अपना जीवन जीते रहे. उनका अनूठा गद्य, उनकी आवारगी और एक आवेगमयी हस्तक्षेपकारी चेतना की गहन और सतत विचारशीलता से उपजा है. हिंदी में कोई दूसरा नहीं है जिनके गद्य में इतना चुंबकीय आकर्षण और जादू हो जो पहली पंक्ति से आपको बांध ले. वे बेहद सचेत कलमकार थे, बावजूद अपने आंवागर्द जीवन शैली के.
इस जीवन शैली से ही उन्होंने अपनी ऐसी अचूक भाषा अर्जित की. उनके भीतर अपने समाज की बेहतरी के लिए- जाहिर है मार्क्सवादी वैचारिकता की ठोस ज़मीन पर आधारित- निरंतर चलने वाला संघर्ष था, बेचैनी थी. कबीर, निराला, मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय की तरह वे उन लेजेंड की परंपरा में आते हैं जिनके लिए सब कुछ खुला और दूसरों के लिए है.
उनके गद्य का योगदान कहानी से किसी तरह उन्नीस नहीं, बल्कि बीस ही है. अपने समय को जितनी व्यापकता और सूक्ष्मता में, उसकी तमाम जटिलताओं और अंतर्विरोधों को जिस देशज ठेठपना के साथ वे देख और दर्ज कर रहे थे, वह उन्हें एक विशिष्ट क़िस्म के जागरण के प्रवक्ता का दर्जा देता है.
उल्लेखनीय है कि उन्होंने दैनिक भास्कर के लिए लिखे कॉलम में भी अपना यही तेवर बनाए रखा. उनके लेखों, संस्मरणों और साक्षात्कारों की किताब ‘कबाड़खाना’ इसका श्रेष्ठ उदाहरण है. यहां विलक्षणीय सूक्ष्मता, दग्धता और पैनेपन के साथ हमारे विकृत, बर्बर, शातिर, क्रूर और हिंसक होते समय के साथ-साथ समझौतापरस्ती या कि नतमस्तक होती बौद्धिकता को लेकर तीक्ष्ण व्यंग्य है.
हिंदी साहित्य की अनमोल धरोहर
मुक्तिबोध सच्चे प्रेम के साथ जिस गहरी और सच्ची घृणा की बात करते थे, ज्ञान जी उसके साक्षात् उदाहरण थे. उनकी असहमति तीखी और गर्वीली हुआ करती थी. उनका एक लेख ‘समय,समाज और कहानी’ अत्यंत मूल्यवान और अविस्मरणीय है, जिसमें वे दर्ज कर रहे हैं-
‘आज नए रचनाकारों के सामने भी एक नया आइसबर्ग और अंडरवर्ल्ड है. अब यह और विशाल,अधिक जटिल तथा भयानक हो गया है. इसमें प्रवेश करने के लिए सदिच्छा,उच्च ताप. बेचैनी,मुठभेड़ का साहस और दृष्टि की ज़रुरत है. यह संसार आपको बार-बार टुकड़े फेंकेगा,इसकी मार से अपने को बचाते हुए, आपको तलघर में जाना होगा. इसके लिए जन आकांक्षा और लुचपन और भरपूर साहस की दरकार होगी. एक जल्लाद और संखिया भाषा बनानी होगी. ‘
ज्ञानरंजन का परिसर बेहद विशाल था. खासकर पहल संपादक की हैसियत से उन्होंने खुद को ज्यों हवा में बिखेर दिया. सुदूर उत्तरपूर्व से लेकर दक्षिण के कोनों तक. यहां तक देश-विदेश में अपने सूत्र और संबंध रखे. पहल की पारी हिंदी जगत में अविस्मरणीय है.
उस दौर में पत्रिका उनके लिए जैसे बौद्धिक जन-जागरण का एक मुहिम था. उसके अंक आज हिंदी साहित्य की अनमोल धरोहर हैं. पहल का सा ख्यात कहानी अंक किसी और पत्रिका से संभव नहीं हो सका. चीनी साहित्य विशेषांक, वाल्टर बेंजामिन अंक, इतिहास अंक, नामवर सिंह अंक जैसे बेहद चर्चित विशेषांक के साथ-साथ पहल पुस्तिकाओं को भी अपार स्वीकृति मिली.
पहल को इमरजेंसी के विरोध के कारण संकटों का सामना करना पड़ा. पहल से ही पंजाबी के क्रांतिकारी कवि पाश को हिंदी पाठकों ने जाना. आलोक धन्वा, मंगलेश डबराल, राजेश जोशी जैसे कवि ख्यातिलब्ध हुए. कवि और कहानीकारों का दीर्घ और गंभीर मूल्यांकन पहल की सतत योजना का हिस्सा था.
ज्ञान जी के जाने कितनों से गहरे आत्मीय संबंध थे. खासकर नौजवानों से उनकी गहरी दोस्तियां थीं. हमारी पीढ़ी के कवियों ने कथाकार ज्ञान जी के संपर्क में आने से अपना रचनात्मक विकास किया. युवाओं की कई पीढ़ियों को उन्होंने साहित्य से गहरे जोड़ा, जिनमें मैं भी शामिल हूं. मेरी कई कहानियों को उन्होंने लौटाया. इसके बावजूद उनके भीतर मेरे प्रति आत्मीयता में कोई कमी नहीं आई. उनसे एक संकोच से मिलता था. वे छोटे कस्बों से आने वाले लेखकों को स्थानीयता की साजिशाना चमक और पकड़ से बाहर आने को कहते थे.
कहते थे, मासूमियत रचना के लिए अच्छी बात है लेकिन यह तुम्हारी सीमा बन जाए इसलिए इसको तोड़ना ज़रूरी है. मुझे 2010 में बांदा के ‘प्रेमचंद स्मृति कथा सम्मान’ के लिए चयनित किया गया. आयोजक मयंक खरे ने मुझसे पूछा कि पुरस्कार किनके हाथों लेना चाहेंगे.
मैंने बिना एक पल गंवाए कहा था, ज्ञान जी से. मयंक जी ने उनसे बात की. मेरी ख़ुशी का ठिकाना न रहा, जब ज्ञान जी ने बतौर मुख्य अतिथि इस कार्यक्रम में आने की सहमति दी. यह मेरे लिए खुशी का दुर्लभ अवसर था कि एक तो प्रेमचंद की स्मृति में दिया जाने वाला कथा सम्मान, दूसरा ज्ञानरंजन जी जैसे विलक्षण कथाकार के हाथों से मिलना.
उस क्षण की अनुभूति बहुत गहरी है. अभिभूत कर देने वाली जब मैं उनके द्वारा सम्मानित हुआ. मेरे लिए यह खुशी तब चौगुना बढ़ गई जब पाया ज्ञान जी और मुझे एक ही कमरे में रुकने की व्यवस्था की गई. मुझे इस बात पर बेइंतहा ख़ुशी और आश्चर्य हुआ था,जब मेरी ट्रेन रात के दस बजे बांदा स्टेशन पहुंची थी, तो उस कड़ाके की सर्दीली, कुहरीली रात में मुझे लेने मयंक जी के साथ ज्ञान जी मौजूद थे- पूरी बांह का एक धूसर स्वेटर पहने, अपनी कृष मगर चुस्त काया में, बावजूद अपनी चौहत्तर वर्ष की अवस्था और चली आती अस्वस्थता के.
बांदा स्टेशन की उस रात का ट्यूबलाइट के नीले उजाले में वह दृश्य हमेशा के लिए मेरी आंखों में, हृदय में दर्ज हो गया, जिसकी चमक आज भी वैसी ही है. और उनके साथ बिताए वे दो दिन भी मेरी स्मृतियों का अटूट हिस्सा हैं जिसमें वे देर रात तक देश, समाज, संस्कृति और साहित्य को लेकर वे बात कर रहे हैं, अपनी चिंता जता रहे हैं…अपनी लोहे जैसी खनकदार, साफ़ आवाज़ में गहरी उत्तेजना- उनकी स्वाभाविक लय यही थी- के साथ, और गहरे सरोकार, लगाव के साथ.
और आप पाते हैं, ज्ञान जी आप से संवाद करते हुए दरअसल खुद से भी संवाद कर रहे हैं.
( कैलाश बनवासी जाने माने कथाकार हैं. )
