बेंगलुरु: देश की शीर्ष हरित अदालत- नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने सोमवार (16 फरवरी) को कहा कि अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह के ग्रेट निकोबार द्वीप पर प्रस्तावित बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को दी गई पर्यावरणीय मंजूरी में हस्तक्षेप करने का कोई ठोस आधार नहीं है.
केंद्र सरकार ने इस द्वीप पर एक अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, टाउनशिप, विद्युत संयंत्र और एक ग्रीनफील्ड हवाई अड्डे सहित कई परियोजनाएं प्रस्तावित की हैं. 80,000 करोड़ रुपये से अधिक लागत वाली इन परियोजनाओं के तहत द्वीप के लगभग 130.75 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में पेड़ों की कटाई भी शामिल है.
विशेषज्ञों और पारिस्थितिकीविदों का अनुमान है कि इससे वर्षावन सहित करीब दस लाख पेड़ काटे जा सकते हैं.
हालांकि, 16 फरवरी के अपने आदेश में एनजीटी ने कहा कि द्वीप की जैव विविधता और स्थानीय समुदायों की सुरक्षा के लिए सभी आवश्यक उपाय किए गए हैं.
‘राष्ट्रीय महत्व’
जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव की अध्यक्षता वाली छह सदस्यीय पीठ ने परियोजना का विरोध करने वाली दो प्रमुख याचिकाओं पर नई सुनवाई शुरू की थी. इस पीठ में जस्टिस दिनेश कुमार सिंह और जस्टिस अरुण कुमार त्यागी के साथ विशेषज्ञ सदस्य ए. सेंथिल वेल, अफरोज अहमद और ईश्वर सिंह थे.
यह पीठ पर्यावरण संगठन कल्पवृक्ष के संस्थापक आशीष कोठारी द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी. कोठारी ने 2022 में परियोजनाओं को दी गई स्टेज-1 पर्यावरणीय मंजूरी सहित कई पहलुओं पर आपत्ति जताई थी.
उन्होंने 2019 की आइलैंड कोस्टल रेगुलेशन ज़ोन (आईसीआरज़ेड) अधिसूचना का हवाला देते हुए तर्क दिया था कि ये परियोजनाएं आईसीआरजेड-IA श्रेणी में आती हैं, जहां इस तरह की गतिविधियां प्रतिबंधित हैं.
केंद्र सरकार ने 2024 में अपने जवाब में कहा था कि ग्रेट निकोबार का समग्र विकास ‘राष्ट्रीय महत्व’ की परियोजना है, जो सुरक्षा, सामाजिक-आर्थिक लाभ और सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है. सरकार ने यह भी कहा था कि केवल ‘अप्रमाणित आशंकाओं’ के आधार पर इस परियोजना को रोका नहीं जाना चाहिए.
सरकार ने उच्चाधिकार प्राप्त समिति (एचपीसी) की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने से भी इनकार किया था, यह कहते हुए कि इसमें ‘रणनीतिक और रक्षा से जुड़ी गोपनीय जानकारी’ है. एनजीटी ने भी इस रुख से सहमति जताते हुए कहा था कि केवल वही हिस्से रिकॉर्ड पर रखे जाएंगे जो सार्वजनिक किए गए हैं.
सोमवार के आदेश में भी एनजीटी ने कहा कि यह परियोजना ‘रणनीतिक और रक्षा दृष्टि से भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण’ है.
आदिवासी समुदाय और पर्यावरण संबंधी सवाल
एनजीटी ने अपने आदेश में कहा कि परियोजना किसी राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्य या उनके इको-सेंसिटिव जोन की सीमा के भीतर नहीं आती और वन भूमि का उपयोग राष्ट्रीय वन नीति, 1988 के प्रावधानों के अनुरूप है.
न्यायाधिकरण ने कहा कि पर्वतीय और पहाड़ी क्षेत्रों में दो-तिहाई भूभाग को वनाच्छादित बनाए रखने का लक्ष्य है और 130 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र के उपयोग के बाद भी द्वीप का दो-तिहाई से अधिक हिस्सा वनाच्छादित रहेगा.
पीठ ने यह भी कहा कि पहले चरण की सुनवाई में यह पाया गया था कि जनजातीय समुदायों का सार्वजनिक सुनवाई में ‘उचित प्रतिनिधित्व’ था और उनका विस्थापन नहीं होगा.
हालांकि, हाल के महीनों में कुछ जनजातीय समुदायों ने आरोप लगाया है कि प्रशासन ने उनसे जमीन ‘सरेंडर सर्टिफिकेट’ पर हस्ताक्षर करने को कहा, जिसके तहत उन्हें अपनी भूमि पर दावों का त्यागना होता. पर्यावरणविदों ने भी आरोप लगाया है कि सामाजिक प्रभाव आकलन (Social Impact Assessment) की सार्वजनिक सुनवाई में जनजातीय परिषद के सदस्यों की टिप्पणियों को कार्यवाही में शामिल नहीं किया गया.
इन आपत्तियों के बावजूद एनजीटी ने अपने आदेश में कहा कि परियोजना के लिए संतुलित दृष्टिकोण अपनाया गया है और पर्यावरणीय मंजूरी में पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं.
एनजीटी का ‘संतुलित दृष्टिकोण’
एनजीटी (राष्ट्रीय हरित अधिकरण) ने अपने आदेश में कहा कि इस मामले में ‘संतुलित दृष्टिकोण’ अपनाया जाना आवश्यक है.
उसने कहा, ‘यह स्पष्ट मामला है, जिसमें न तो परियोजना के सामरिक महत्व से इनकार किया जा सकता है और न ही आईसीआरजेड अधिसूचना (तटीय विनियमन क्षेत्र अधिसूचना) की शर्तों की अनदेखी या उपेक्षा की जा सकती है. इसलिए, एक रणनीतिक स्थान पर बंदरगाह के विकास की अनुमति देने के प्रश्न पर विचार करते समय संतुलित दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए. इस आदेश के पूर्ववर्ती अनुच्छेदों में इसके महत्व का उल्लेख किया जा चुका है. साथ ही, गतिविधि को पूरी तरह प्रतिबंधित करने के बजाय, यदि आपत्ति केवल आशंका पर आधारित है, तो आईसीआरजेड अधिसूचना, 2019 के प्रावधानों के अनुसार सख्ती से गतिविधि संचालित करने के लिए पर्याप्त कदम उठाए जाने चाहिए.’
एनजीटी ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार और उच्चाधिकार प्राप्त समिति ने ‘पाया’ है कि गैलाथिया खाड़ी में परियोजना के लिए चिह्नित क्षेत्र – जो लेदरबैक कछुओं (leatherback turtles) का प्रजनन स्थल है – सीआरजेड-1 श्रेणी में नहीं आता.
एनजीटी ने आगे कहा कि परियोजना से संबंधित सभी सुरक्षा उपाय लागू किए गए हैं और केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने पर्यावरणीय स्वीकृति में इनका प्रावधान किया है. इनमें मैंग्रोव पुनर्स्थापन, कोरल (corals) का स्थानांतरण, स्थानीय जनजातीय समुदाय – शोम्पेन और निकोबारी – के कल्याण के उपाय, तथा लेदरबैक समुद्री कछुए, निकोबार मेगापोड, खारे पानी के मगरमच्छ, निकोबार मकाक और ग्रेट निकोबार द्वीप की अन्य स्थानिक पक्षी प्रजातियों की सुरक्षा शामिल है.
एनजीटी ने उल्लेख किया कि इन सुरक्षा उपायों के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए प्रबंधन समितियों के गठन का भी प्रावधान किया गया है.
एनजीटी ने भारतीय प्राणी सर्वेक्षण की परस्पर विरोधाभासी निष्कर्ष का भी हवाला दिया- जिसमें कहा गया कि प्रस्तावित क्षेत्र में कोरल नहीं हैं, लेकिन परियोजना के निकट 15 मीटर गहराई के भीतर 16,150 कोरल कॉलोनियों पाए गए हैं (जो यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि क्षेत्र में कोरल मौजूद हैं) और उनकी सुरक्षा के लिए उन्हें स्थानांतरित किया जा सकता है. एनजीटी के आदेश के अनुसार, यह तटीय विनियमन क्षेत्र अधिसूचना का उल्लंघन नहीं है.
एनजीटी ने केंद्र सरकार से सहमति जताते हुए कहा कि पर्यावरण प्रभाव आकलन के लिए तीन ऋतुओं का अध्ययन आवश्यक नहीं है और मौजूदा एक-ऋतु अध्ययन – जिस पर विशेषज्ञों ने 2022 में आपत्तियां उठाई थीं – स्वीकार्य है.
अपने आदेश में एनजीटी ने कहा, ‘अतः हम पाते हैं कि पर्यावरणीय स्वीकृति की शर्तों में पर्याप्त सुरक्षा उपाय प्रदान किए गए हैं. पहले दौर की सुनवाई में अधिकरण ने पर्यावरणीय स्वीकृति में हस्तक्षेप करने से इनकार किया था और शेष मुद्दों पर उच्चाधिकार प्राप्त समिति ने विचार किया है. परियोजना के सामरिक महत्व और अन्य प्रासंगिक तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हमें हस्तक्षेप करने का कोई ठोस आधार नहीं दिखाई देता.’
