इलाहाबाद में गैस संकट की मार: पढ़ाई छोड़ घर लौटने को मजबूर हो रहे हैं प्रवासी छात्र

पश्चिम एशिया के युद्ध से उपजा ऊर्जा संकट कई शहरों को प्रभावित कर रहा है. ऐसे ही एक शहर इलाहाबाद में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्र रसोई गैस की किल्लत और महंगाई से जूझ रहे हैं. भोजन जैसी बुनियादी ज़रूरत संकट में है, जिससे उनकी पढ़ाई, मानसिक स्थिति और भविष्य पर गहरा असर पड़ रहा है.

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ग्रामीण क्षेत्रों से शहर में रहकर पढ़ाई करने वाले छात्र-छात्राओं का कहना है कि या तो गैस मिल नहीं रही, और अगर मिल भी रही है तो इतनी महंगी है कि उनके बजट से बाहर है. (फोटो: पीटीआई)

इज़रायल-अमेरिका बनाम ईरान के बीच जारी युद्ध, जिसकी चपेट में अब पश्चिम एशिया के कई देश आ चुके हैं, केवल अर्थव्यवस्था को ही नहीं, बल्कि युवाओं के भविष्य को भी प्रभावित कर रहा है. इसका असर उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद (सरकारी भाषा में प्रयागराज) जैसे शहरों में साफ दिखाई देता है, जिसे लंबे समय से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का गढ़ माना जाता रहा है.

शाम के समय जिन सड़कों, बाज़ारों और सब्ज़ी मंडियों में कभी छात्र-छात्राओं की चहल-पहल हुआ करती थी, अब वहीं एक अलग दृश्य नजर आता है. कई छात्र कंधे पर गैस सिलेंडर उठाए इधर-उधर भटकते दिखाई देते हैं. चेहरों पर थकान और अनिश्चितता साफ झलकती है.

इलाहाबाद में पढ़ने आने वाले अधिकांश छात्र ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते हैं. वे अपने साथ घर से आटा, चावल और दाल लाते हैं और किराए के कमरों में खुद खाना बनाकर गुज़ारा करते हैं. उनके रोज़मर्रा के जीवन का यह पूरा ढांचा छोटे सिलेंडरों में फुटकर भरी जाने वाली गैस पर टिका होता है. लेकिन मौजूदा हालात में यह व्यवस्था चरमराती दिख रही है.

फुटकर गैस की सप्लाई लगभग ठप है. जो गैस पहले आसानी से उपलब्ध हो जाती थी, वह अब या तो मिल नहीं रही, और अगर मिल भी रही है तो ब्लैक में. कीमतें 250 से 350 रुपये प्रति किलो तक पहुंच चुकी हैं, जो इन छात्रों की क्षमता से बाहर है.

स्थिति यह है कि गैस के लिए छात्रों को घंटों कतारों में लगना पड़ रहा है, फिर भी खाली हाथ लौटना पड़ता है. लंबा इंतज़ार और अनिश्चितता अब उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुके हैं. छोटे और सीमांत किसान परिवारों से आने वाले इन छात्रों के लिए यह संकट अब अस्थायी परेशानी से आगे बढ़कर अस्तित्व का सवाल बनता जा रहा है. कई छात्र कोचिंग और लाइब्रेरी छोड़कर गांव लौटने को मजबूर हैं.

सबसे चिंताजनक बात यह है कि प्रतियोगी परीक्षाओं का कैलेंडर जस का तस है. परीक्षाएं तय समय पर होंगी, लेकिन तैयारी इन बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर हो गई है. ऐसे में इस संकट का सीधा असर उनके परिणामों और भविष्य पर पड़ना तय है.

छात्र-छात्राओं के बीच बढ़ता मानसिक तनाव इस बात का संकेत है कि यह समस्या केवल गैस की कमी तक सीमित नहीं है, बल्कि एक बड़े सामाजिक और शैक्षणिक संकट का रूप ले रही है.

जहां लड़के शहर में इधर-उधर जाकर किसी तरह गैस का इंतजाम कर लेते हैं, वहीं एक अपरिचित शहर में सीमित दायरे में रहने वाली लड़कियों के लिए यह कहीं ज्यादा मुश्किल हो जाता है. (फोटो: पीटीआई)

अनिश्चितता का आलम

इसी सिलसिले में कई ऐसे विद्यार्थियों से सामना हुआ, जिनके लिए रसोई गैस की किल्लत महज़ एक असुविधा नहीं, बल्कि उनके भविष्य पर मंडराता संकट बन गई है. उत्तर प्रदेश के बांदा ज़िले की प्रियंका यादव, जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए इलाहाबाद के सलोरी इलाके में रहती हैं, इसकी एक मिसाल हैं.

प्रियंका बताती हैं कि उनके पिता छोटे किसान हैं. बारहवीं में अच्छे अंक आने के बाद ही वह बड़ी मुश्किल से उन्हें इलाहाबाद भेजने के लिए तैयार हुए थे. तीन साल से अधिक समय से वह वहां रहकर तैयारी कर रही हैं, लेकिन रोज़गार के मौजूदा हालात के चलते अब तक उन्हें सफलता नहीं मिली है. घर से हर महीने बमुश्किल तीन हज़ार रुपये मिलते हैं. समय के साथ परिवार का दबाव भी बढ़ता जा रहा है.

ऐसे में गैस की मौजूदा किल्लत ने उनकी परेशानियों को और गहरा कर दिया है. जिस दुकान से वह अब तक छोटे सिलेंडर में गैस भरवाती थीं, वहां अब सप्लाई बंद हो चुकी है. अन्य जगहों पर या तो गैस मिल नहीं रही, और अगर मिल भी रही है तो इतनी महंगी है कि उनके बजट से बाहर है.

प्रियंका कहती हैं कि हालात ऐसे हो गए हैं कि उन्हें अपनी कोचिंग बीच में छोड़कर घर लौटने के बारे में सोचना पड़ रहा है. उनके मुताबिक, हर संकट की मार लड़कियों पर ज्यादा पड़ती है और इस मामले में भी स्थिति अलग नहीं है. जहां लड़के शहर में इधर-उधर जाकर किसी तरह गैस का इंतजाम कर लेते हैं, वहीं एक अपरिचित शहर में सीमित दायरे में रहने वाली लड़कियों के लिए यह कहीं ज्यादा मुश्किल हो जाता है.

प्रियंका की ही तरह सुल्तानपुर ज़िले के लम्भुआ से आई शिवांगी छोटा बघाड़ा के एक पीजी में रहकर पढ़ाई कर रही हैं. किसान परिवार से आने वाली शिवांगी इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मास्टर करने के बाद अब नेट परीक्षा की तैयारी में जुटी हैं. मौजूदा हालात को लेकर उनकी चिंता साफ झलकती है.

वह बताती हैं कि गैस भरवाए काफी दिन हो चुके हैं और अब कभी भी सिलेंडर खाली हो सकता है. इसी आशंका के चलते उन्होंने रात का खाना बनाना लगभग बंद कर दिया है. वह और उनकी रूम पार्टनर रोज़ शाम को बाहर निकलकर ठेलों से खाना खरीदकर खाने लगी हैं.

उल्लेखनीय पहलू यह भी है कि बाहर से खरीदकर खाना खा सकने जैसी आर्थिक स्थिति भी कितने ही छात्र-छात्राएं अफोर्ड कर सकते हैं. हालांकि, बाहर का खाना भी अब सस्ता नहीं रहा. गैस संकट का असर वहां भी दिख रहा है.

शिवांगी बताती हैं कि काफी कोशिशों के बाद उन्हें एक दुकानदार के जरिए ब्लैक में दो किलो गैस 750 रुपये में मिली, जिसे वे अब बहुत सीमित तरीके से, सिर्फ एक वक्त का खाना बनाने के लिए इस्तेमाल कर रही हैं.

वह कहती हैं कि गांव से निकलकर शहर में पढ़ाई करना लड़कियों के लिए अपने आप में एक बड़ी चुनौती होती है. ऐसे में इस तरह की अनिश्चितता उनकी दिक्कतें और बढ़ा देती हैं.

सरकारी दावे के उलट हक़ीक़त

इलाहाबाद में प्रशासन की ओर से बार-बार यह कहा जा रहा है कि रसोई गैस को लेकर कोई संकट नहीं है और लोगों को संयम बनाए रखना चाहिए. लेकिन ज़मीन पर हालात इन दावों से बिल्कुल उलट नज़र आते हैं. शहर के अधिकांश पीजी अब अपने मेस बंद कर चुके हैं. इलाहाबाद विश्वविद्यालय के ज़्यादातर छात्रावासों में मेस या तो अनियमित हो गए हैं या पूरी तरह बंद हो चुके हैं. कुछ जगहों पर केवल एक वक्त का खाना मिल पा रहा है, जबकि सुबह-शाम का नाश्ता भी उपलब्ध नहीं है.

इलाहाबाद में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले कई छात्र आमतौर पर अपने कमरे में सब्ज़ी बनाकर खाते थे और रोटियां बाहर से खरीद लेते थे. लेकिन एलपीजी की किल्लत का असर अब इन छोटे भोजनालयों और ठेलों पर भी है. जो रोटी पहले 3 से 4 रुपये में मिलती थी, उसकी कीमत बढ़कर अब 8 से 9 रुपये तक पहुंच गई है. गरीब, मज़दूर, किसान और निम्न-मध्यवर्गीय परिवारों से आने वाले छात्रों के लिए इस महंगाई के साथ गुज़ारा कर पाना आसान नहीं रह गया है. ऐसे में कई छात्रों को लगने लगा है कि महंगे किराये और बढ़ते खर्च के बीच शहर में टिके रहने से बेहतर है कि वे वापस अपने घर लौट जाएं.

क्या घर लौट जाना ही विकल्प बचा है?

मध्य प्रदेश के रीवा ज़िले के रहने वाले अमित तिवारी इलाहाबाद विश्वविद्यालय में स्नातक अंतिम वर्ष के छात्र हैं. वे इस स्थिति को छात्रों की मजबूरी बताते हैं. वे कहते हैं कि एक ओर विश्वविद्यालय के छात्रों की सीयूईटी परीक्षाएं चल रही हैं और दूसरी ओर अंतिम सेमेस्टर की परीक्षाएं शुरू होने वाली हैं. ऐसे में छात्र न तो ठीक से शहर में रह पा रहे हैं और न ही उनके पास घर लौटने का विकल्प बचा है. परीक्षा के दबाव और रोज़मर्रा की दिक्कतों के बीच वे किसी तरह जोड़-तोड़कर इलाहाबाद में टिके रहने को मजबूर हैं.

गैस की कमी और बढ़ती कीमतें छात्र-छात्राओं के लिए इतनी बड़ी चुनौती बन चुकी हैं कि उनके सामने कोई व्यावहारिक विकल्प नहीं बचा है. अगर वे घर लौटते हैं तो पढ़ाई बाधित होती है, और इलाहाबाद में किराये के छोटे कमरों में वे चूल्हा या अंगीठी भी नहीं जला सकते, क्योंकि मकान मालिक इसकी अनुमति नहीं देते. ऐसे में वे एक ऐसे संकट में फंसे हैं, जहां हर रास्ता बंद नज़र आता है.

लंबे समय से इलाहाबाद में रहकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे जौनपुर के संजय के लिए यह दौर गहरी निराशा से भरा हुआ है. वे कहते हैं कि आज छात्र सिर्फ बेरोज़गारी के संकट से नहीं जूझ रहे, बल्कि भोजन जैसी मूलभूत आवश्यकता भी उनके लिए एक चुनौती बन गई है. समय पर खाना न मिल पाना, उसके लिए लगातार मानसिक तनाव में रहना और बढ़ते खर्च का दबाव, ये सभी चीज़ें अंततः उनकी पढ़ाई और भविष्य को प्रभावित कर रही हैं.

बकौल संजय, ‘आज जहां पूरी दुनिया में ईरान-अमेरिका, इज़रायल युद्ध के कारण बड़ा ऊर्जा संकट पैदा हो गया है, तेल और गैस की कीमतें आसमान छू रही हैं, वहीं हमारे देश में गैस सिलेंडर की दुकानों पर अंतहीन लाइनों में लगे ये छात्र, इनकी निराशा, इनकी बदहाली के लिए ज़िम्मेदार सिस्टम कह रहा है कि एलपीजी गैस का कोई संकट नहीं है, लोग सिर्फ़ अफवाह फैला रहे हैं’.

छात्रों की यह निराशा वस्तुतः उस व्यवस्था या उस वर्ग के लिए अकल्पनीय है, जिन्हें रसोई गैस की बढ़ती कीमतें प्रभावित नहीं करतीं या जिन्हें आसानी से अच्छा और पौष्टिक भोजन उपलब्ध है.

(रूपम मिश्र कवयित्री हैं.)