यह दुर्भाग्य है कि आज के लेखक के समक्ष पढ़ने का अभिनय करने वाले लोगों का हुजूम है - लेकिन पाठक नहीं. आज लेखक पाठक नहीं, उपभोक्ता की तलाश में भटक रहा है. एक चमकती हुई किताब और धुआं छोड़ते पिज़्ज़ा में बहुत कम अंतर रह गया है. 'रचनाकार का समय' में पढ़ें कवि अच्युतानंद मिश्र को.