जातिगत भेदभाव, अस्थायी नौकरियों से जूझ रहे हैं देश के सफाई कर्मचारी

शहरी भारत में स्वच्छता सेवाओं के निजीकरण के साथ सफाई कर्मचारी जातिवाद, मज़दूरी में कटौती, और गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार न मिलने से भी जूझ रहे हैं. स्वच्छता कर्मियों को पूरी तरह ठेके पर भर्ती करने का चलन तेज़ी से बढ़ रहा है. स्थायी नियुक्तियां घट रही हैं और वाल्मीकि समुदाय के कामगारों को अधिकतर अस्थायी भूमिकाओं तक ही सीमित किया जा रहा है.