पुस्तक समीक्षा: शाहू पटोले की ‘दलित किचेंस ऑफ मराठवाड़ा’ भूख, जाति और भोजन के जटिल रिश्तों का मार्मिक बयान है. यह बताती है कि कैसे दलित समाज ने संसाधनों के अभाव में भी अपनी खाद्य संस्कृति बचाई, और भोजन को हथियार बनाकर किए गए जातिगत शोषण का साहसपूर्वक सामना किया.
क्या पीड़ित समुदाय कभी उनकी तरह बेफ़िक्र हो कर लिख पाएंगे जिनकी ज़िंदगी उन शिकारियों की तरह रही, जिन्होंने पीड़ितों की गाथाएं एक शिकारी के नज़रिए से लिख दी और जंगल से उनके पैरों के निशान तक मिटा डाले... रचनाकार का समय में पढ़ें कवि-कथाकार अनिता भारती को.