पांच सालों से जेल में क़ैद, 'देशद्रोह' होने के तमगे में दबा अब्दुल मन्नान कभी 'प्रतिरोध की भाषा' पर पीएचडी थीसिस लिखा रहा था. आज अदालती कार्रवाइयों में फंसे इस 'स्कॉलर' को लगने लगा था कि असली प्रतिरोध 'बोलने' में नहीं, बल्कि इस ज़हर को ख़ामोशी से पी जाने में है जो आपको हर रोज़ पिलाया जाता है. पढ़िए अशअर नज्मी की कहानी 'अन्याय का शिलालेख'.