रचनाकार के सामने खड़ा एक कालजयी सवाल-आखिर क्यों लिखें?

ऑरवेल कहते हैं कि अच्छा लेखन करने के लिए लेखक को अपने व्यक्तित्व के साथ लगातार मुठभेड़ करनी पड़ती है. वे लेखन को एक कष्टप्रद क्रिया मानते हैं. यदि हमारे जिस्म में एक किस्म की बेचैनी, पेट में आग नहीं होती, तो इस कष्ट को कोई भी झेलना नहीं चाहता.