पुस्तक अंश: बलवंत कौर अपनी पुस्तक ‘स्मृति और दंश’ में लिखती हैं, '1992 में मस्जिद का ढांचा गिराते समय भी अतीत में हुए अन्याय और उत्पीड़न का कथानक रचकर न सिर्फ़ इस कृत्य को जायज़ ठहराया गया बल्कि धार्मिक विभाजन का विरोध कर पाकिस्तान न जाने का फ़ैसला लेने वाले और नये बन रहे लोकतंत्र में आस्था दिखाने वाले मुसलमानों को भी उसी अतीत के उत्पीड़न के तर्क के आधार पर प्रताड़ित किया गया. यहां तक कि 'समय-समय पर उन्हें