भारतीय न्यायिक व्यवस्था दोहरे संकट से गुज़र रही है. एक ओर न्यायिक क्षेत्र को कम बजट मिलता है और दूसरी ओर उपलब्ध बजट का पूरा और प्रभावी उपयोग नहीं हो पा रहा. नतीजा यह है कि पुलिस, जेल, न्यायालय, क़ानूनी सहायता, फॉरेंसिक और मानवाधिकार संस्थाएं, सभी पूरी क्षमता के साथ काम नहीं कर पा रहे हैं.