'समकालीन अकादमिक विमर्श एक विचित्र सुझाव देता है कि हिंदी एक ब्राह्मणवादी भाषा है, इसलिए दलितों को इसे त्याग देना चाहिए. क्या एक लेखिका जिसने हिंदी के माध्यम से अपनी राजनीतिक चेतना को पाया है केवल इस डर से हिंदी में लिखना त्याग दे कि कहीं वह ब्राह्मणवादी प्रभुत्व की सहयोगी न ठहरा दी जाए?' हिंदी की राजनीति पर पढ़िए यह विचारोत्तेजक लेख.
दिल्ली विश्वविद्यालय की यह घटना उन शिक्षाविदों से सामूहिक प्रतिक्रिया की मांग करती है जो निष्पक्षता, बौद्धिक स्वायत्तता और शैक्षणिक स्वतंत्रता के मूलभूत मूल्यों में विश्वास जताते हैं. विश्वविद्यालय कॉरपोरेट संस्थाएं नहीं हैं जहां बिना जवाबदेही के सत्ता का प्रयोग किया जा सके. वे विश्वास, संवाद और प्रशासन की साझा भागीदारी पर आधारित संस्थाएं हैं.
दुल्हनों की अदला-बदली या स्त्रियों के रेलवे प्लेटफॉर्म पर भटक जाने को लेकर हिंदी सिनेमा ने कई प्रयोग किए हैं, लेकिन इनमें से कोई भी फिल्म वह सामाजिक-सांस्कृतिक टिप्पणी करने में सफल नहीं रही जो किरण राव निर्देशित ‘लापता लेडीज़’ कर सकी है.
एक स्त्री निर्देशक जब काली की छवि को अपनी बात कहने के लिए चुनती है तो वह लैंगिक न्याय और स्वतंत्रता में उसकी आस्था का प्रतीक है. क्या इंटरनेट पर आग उगल रहे तमाम ‘आस्थावान’ स्त्री स्वतंत्रता के इस उन्मुक्त चित्रण से भयभीत हो गए हैं? या उन्हें काली की स्वतंत्रता के पक्ष में स्त्रियों का बोलना असहज कर रहा है?
जो लोग जेएनयू गेट पर लाठियां लेकर खड़े थे और भीतर जो लोग लाठियां लेकर शिक्षकों और छात्र-छात्राओं की लिंचिंग पर उतारू थे, उनकी मंशा को समझना क्या इतना मुश्किल है?
हिंदी से फ़ारसी या अरबी के शब्दों को छांटकर बाहर निकाल देना असंभव है. एक हिंदी भाषी रोज़ाना अनजाने ही कितने फ़ारसी, अरबी या तुर्की के शब्द बोलता है, जिनके बिना किसी वाक्य की संरचना तक असंभव है.