हिंदी साहित्य जगत का पुरुष स्त्री को समकक्ष कब समझेगा?

जब कोई व्यक्ति हिंदी साहित्य के संसार के भीतर पहला कदम रखता है, तब वह अनेक नए अनुभवों से गुज़रता है. कुछ ऐसे तजुर्बे होते हैं जिनके बारे में मालूम तक नहीं होता कि उनका अस्तित्व भी है. ऐसे ही एक अनुभव ने सिखाया कि जेंडर के दबाव से मुक्त होकर पुरुषों से संवाद करना आज भी स्त्रियों के लिए संभव नहीं. हमारा समाज आज भी इसके लिए प्रस्तुत नहीं.

मसूरी के वे झिलमिले दिन

स्मृति की माया विचित्र है. यह अनायास उमड़ती है, वर्तमान को नया आयाम दे जाती है. हिंदी लेखक दिव्या विजय इस स्वप्निल संस्मरण में उस मसूरी को उकेरती हैं, जिसकी वादियों में कभी एक इंसान उन्हें मिला था, और जिसके शब्दों ने बरसों बाद उनके भीतर के कोने-कोटर रोशन कर दिए थे...

कहानियां कही जाती रही हैं, जब भाषा नहीं थी तब भी कहानियां थीं : दिव्या विजय

युवा लेखिका दिव्या विजय अपने कहानी-संग्रह ‘तुम बारहबानी’ को लेकर कहती हैं कि कहानियां एक समांतर संसार रचती हैं, जिसकी अधिकतर बातें इस संसार से मेल खाती हैं लेकिन जो मेल नहीं खातीं, वह कहानी की आत्मा होती हैं , जिसकी खोज सबको होती है, पर सब न उसे पहचान पाते हैं न स्वीकार.