पुस्तक समीक्षा: दीप मुखर्जी और तबीना अंजुम की ‘फ्रॉम डायनेस्टीज़ टू डेमोक्रेसी: पॉलिटिक्स, कास्ट एंड पावर स्ट्रगल इन राजस्थान’ पत्रकारीय अनुभवों का रोज़नामचा भर नहीं है, किताब के निरीक्षण बहुत सूक्ष्म हैं. यह भाषा में पत्रकारीय सरलता रखते हुए भी समझ और प्रस्तुति में शोधपूर्ण इतिहास ग्रंथ का अहसास देती है.
पुस्तक समीक्षा: कविता-संग्रह 'बिना कलिंग विजय के' में यतीन्द्र मिश्र अपने पाठक के काव्य रसास्वादन को परिष्कृत करते चलते हैं. कुछ कवियों की कविताओं के भीतर दुनिया में किसी बदलाव की कामना होती है. यतीन्द्र का कवि दुनिया में बहुत कुछ बचा लेना चाहता है, जो खोता जा रहा है.
रचनाकार को अक्सर यह मुगालता होता है कि वह अपने समय को दर्ज कर रहा है, और दर्ज भी ऐसे कि गोया अहसान कर रहा है. और गोया ऐसे भी कि सिर्फ वही कर रहा है, अगर वह नहीं करेगा तो समय दर्ज हुए बिना ही रह जाएगा. इस चमकीले मुहावरे से खुद को बचा लेना चाहता हूं कि मैं अपने समय को दर्ज करने के महान काम में लगा हुआ हूं.