न्यायपालिका पर जूते से प्रहार: आस्था की आड़ में संविधान पर आघात

किसी इंसान पर जूता फेंकना तिरस्कार का चरम है. चमड़े का वह प्रहार किसी व्यक्ति पर नहीं, बल्कि समानता के उस विचार पर लक्षित था, जो संविधान की आत्मा है. ऐसा लगा जैसे मनु का भूत राष्ट्र को फुसफुसाकर याद दिला रहा हो कि जातिगत पदानुक्रम आज भी जीवित है, भले ही आकाश धर्मनिरपेक्षता के रंग में रंगा हो.