क्या प्रतिरोध का एकमात्र तरीका किसी प्रचलित यथार्थवादी परिणति तक पहुंचना ही है? क्या वे ही रचनाएं प्रतिरोधी चेतना की मानी जाएंगी जिनके चरित्र हथियार उठाए घूमेंगे? दरअसल, ‘दीवार में खिड़की रहती थी’ हमारे एक जिम्मेदार लेखक द्वारा देखा गया स्वप्न है. रचनाकार का समय में पढ़िए मनोज कुमार पांडेय को.