प्रतियोगी परीक्षाएं सिर्फ़ रट्टू तोते चाहती हैं, विचारशील मनुष्य नहीं

तमाम प्रतियोगी परीक्षाएं न तो विद्यार्थी की समझ को जांच पाती है और न ही ये उसकी आगामी भूमिका के लिए कोई तैयारी करा पाती हैं. ये परीक्षाएं तथ्यों और आंकड़ों के रटने पर टिकी हुई हैं. इनका रोज़गार की पात्रता से शायद ही कोई रिश्ता है. पढ़िए आलोचक मृत्युंजय का यह पैना लेख.

अजी समझ लो उनका अपना नेता था जयचंद, हिटलर के तंबू में अब वे लगा रहे पैबंद

नागार्जुन की कविता राजनीति के चरित्र का पर्दाफ़ाश करती है. जो लोग लोकतंत्र को बचाने और उसे मज़बूत बनाने की लड़ाई लड़ना चाहते हैं, उनके लिए नागार्जुन कभी अप्रासंगिक नहीं होंगे.