हवाओं की दस्तक: समाजवाद से कॉरपोरेट दौर तक हिंदी पत्रकारिता का बदलता चेहरा

पुस्तक समीक्षा: हिंदी पत्रकारिता, समाजवाद और बदलते भारत के बीच एक पत्रकार की यह आत्मकथात्मक यात्रा उस दौर की साक्षी है जब अख़बार बिक रहे थे और ईमान भी. ‘हवाओं की दस्तक’ स्मृति, संघर्ष और स्वप्नभंग के बीच लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाए रखने की ज़िद की कहानी है.