अजित पवार: खाली हो गया महाराष्ट्र की सियासत का ‘पावर-रूम’

महाराष्ट्र की राजनीति में ‘दादा’ कहलाने वाले अजित पवार का 28 जनवरी, 2026 को एक विमान हादसे में निधन हो गया. सहकारिता, गठबंधन और सत्ता-यथार्थवाद की राजनीति के प्रतीक रहे पवार के जाने से राज्य की सत्ता-संरचना में एक पूरा ‘पावर-रूम’ अचानक खाली हो गया.

मार्क टली: बीबीसी की आवाज़ और भरोसेमंद पत्रकारिता का एक दौर

बीबीसी से अपने लगभग तीन दशक के कार्यकाल (1964-94) के दौरान मार्क टली ने भारतीय उपमहाद्वीप की शायद ही ऐसी कोई बड़ी घटना हो जिसे उन्होंने कवर न किया हो. मार्क टली ने अपनी रिपोर्टिंग के ज़रिए जो साख बनाई वह बहुत कम लोगों को नसीब हो पाती है.

माधव गाडगिल: पर्यावरण के संरक्षक का जाना

स्मृति शेष: यूरोप व अमेरिका का पर्यावरण आंदोलन प्रकृति को मनुष्य से अलग कर संरक्षित करने का हिमायती रहा है. माधव गाडगिल को भारत के लिए संरक्षण का यह मॉडल इसलिए उपयुक्त नहीं लगता था क्योंकि यहां के वन कभी निर्जन नहीं रहे.

मार्क टली: देश की नब्ज़ को टटोलने वाली आवाज़ ख़ामोश हुई…

स्मृति शेष: जिस पीढ़ी ने ट्रांजिस्टर रेडियो पर राजनीति को समझना सीखा, उसके लिए मार्क टली सिर्फ़ संवाददाता नहीं थे. वह उलझन में साथी थे, एक ऐसे देश के लिए दिशासूचक, जो स्वयं को समझने की कोशिश कर रहा था.

‘मैं इस गणतंत्र का एक बंदी हूं…’

इस ‘गणतंत्र’ के बंदियों को सुप्रीम कोर्ट के कथनानुसार व संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार कभी हासिल होगा? ‘जेल अपवाद है व ज़मानत नियम,’ यह धरातल पर फलीभूत कभी होगा या जेलों के यातनागृह में बंदियों को पीसकर भ्रष्ट अधिकारियों के पौ-बारह होते रहेंगे? स्वतंत्र पत्रकार और पटना की बेऊर जेल में विचाराधीन बंदी रूपेश कुमार सिंह का लेख.

सुभाष बोस और छात्र राजनीति: जब विश्वविद्यालय असहमति के केंद्र थे, डिग्री की फैक्ट्री नहीं

जब विश्वविद्यालयों को राजनीति से मुक्त करने की मांग तेज़ है, तब सुभाष चंद्र बोस की विरासत एक असहज सवाल खड़ा करती है. बोस छात्रों को बदलाव का अग्रदूत मानते थे. यह लेख बताता है कि छात्र राजनीति का उनका पक्ष आज भी क्यों प्रासंगिक और ज़रूरी है.

एआर रहमान की टिप्पणी पर विवाद: क्या देश असहज सच्चाइयों को सुनने से डर रहा है?

जब कलाकारों, लेखकों या सामान्य नागरिकों को आईना दिखाने पर दंडित किया जाता है, तब समस्या वो दर्पण नहीं है क्योंकि उस पर तो दरारें पहले से थीं. बदला यह है कि हमें देखना छोड़ देने की ट्रेनिंग दी जा रही है- टूटन को नकारने की, स्वीकार को ग़द्दारी मानने की. हम सब जानते हैं कि रहमान ने सिर्फ वही बात कही जो हममें से लाखों लोग देख रहे हैं. उन पर बरसी आग बताती है कि हमें झूठ नहीं,

भूले-बिसरे: संविधान के बुनियादी ढांचे से छेड़छाड़ के अंदेशों पर अंकुश याद रखा जाना चाहिए

वर्तमान में हम भारतीय बेहद यक़ीन के साथ कहते हैं कि देश में कोई सरकार आए, वह संविधान के मूल यानी बुनियादी ढांचे से छेड़छाड़ नहीं कर सकती. क्योंकि यह ढांचा 'संविधान की आत्मा' है. हालांकि याद रखने योग्य बात यह है कि 1973 में केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सुनाए गए ऐतिहासिक फैसले से पहले यह विश्वास हमारे पास नहीं था.

क्या एसआईआर ने वोटर लिस्ट के लैंगिक अनुपात में दशकों से दर्ज हो रही प्रगति को प्रभावित किया है

एक आदर्श वोटर लिस्ट वही मानी जाती है, जो सभी योग्य वयस्क मतदाताओं को शामिल करे. लेकिन हक़ीक़त यह है कि वोटर लिस्ट में जेंडर अनुपात हमेशा इससे कम दर्ज होता रहा है. यूपी में एसआईआर शुरू होने से पहले, 27 अक्टूबर 2025 को वोटर लिस्ट का जेंडर अनुपात 876 तक पहुंच चुका था, लेकिन एसआईआर के बाद यह सुधार की दिशा पूरी तरह पलट गई.

नेहरू को कोसने वाले नहीं जानते कि सोमनाथ में राजेंद्र प्रसाद के भाषण में नेहरू की नीतियों की ही ताईद थी

बीते दिनों 'सोमनाथ स्वाभिमान पर्व' के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद की प्रशंसा करते हुए पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को कभी सोमनाथ न जाने को लेकर कोसा. हालांकि, 1951 में पुनर्निमित सोमनाथ मंदिर के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में डॉ. प्रसाद ने नेहरू से अपनी सारी 'असहमतियों' को धता बताते हुए कहा था कि आस्था और दृढ़ विश्वास ने भारत को धर्मनिरपेक्षता की नीति अपनाने के लिए प्रेरित किया है कि धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया

शिक्षा का मक़सद सवाल करने की आज़ादी सीखना है, गुरु शिष्य परंपरा इसके उलट है

भारत में आजकल गुरु शिष्य परंपरा का जो गुणगान किया जा रहा है, उसका कारण यह है कि सत्ता अब स्वतंत्र मन और मस्तिष्क वाले नागरिक नहीं चाहती, आज्ञाकारी, सत्ता के आगे समर्पणशील जन चाहती है. शिक्षा का काम इसके प्रति लोगों को सावधान करना और उनके भीतर आलोचनात्मक नज़रिया विकसित करना है. गुरु-शिष्य परंपरा इसमें बाधक है.

जब आज्ञा मानने को नैतिक गुण मान लिया जाता है, तब सत्ता जवाबदेही से मुक्त हो जाती है

लोकतंत्र केवल तब नहीं ढहते जब चुनावों में धांधली होती है; वे तब भी क्षीण होते हैं जब आज्ञाकारिता भागीदारी का स्थान ले लेती है, जब मतभेद को अवैध ठहराया जाता है, और जब सत्ता से प्रश्न पूछना ख़तरे के रूप में पेश किया जाता है, ज़िम्मेदारी के रूप में नहीं.

मनरेगा का ‘जी-राम-जीकरण’: कमियों को यथास्थिति छोड़ नियमों को कमज़ोर करने की कवायद

मनरेगा का नाम ही नही बदला गया है, बल्कि बहुत सारे ऐसे परिवर्तन किए गए हैं, जिन पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक है. नए क़ानून में कई विरोधाभास साफ़ देखे जा सकते हैं. जिन कमियों में सुधार किया जाना था, उन्हें ज्यों का त्यों छोड़ दिया गया हैं और जिन नियमों को और मज़बूत करना था, उन्हें कमज़ोर बना दिया गया.

जब देश को तरक्की की ज़रूरत है, तब एनएसए ‘बदले’ की भावना भड़का रहे हैं

ऐसे समय में जब भारत को आर्थिक, वैज्ञानिक, सामाजिक और नैतिक रूप से आगे बढ़ने पर चर्चा करनी चाहिए, यह दुखद है कि एक वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी 'बदले' की भाषा बोल रहा है. एनएसए की भूमिका वास्तविक ख़तरों के ख़िलाफ़ देश को एकजुट करने की होनी चाहिए, न कि ऐतिहासिक घावों को कुरेदकर समाज को बांटने की.

कुलपति द्वारा कथाकार के अपमान को क्या केवल उन्हीं का अपमान मानना चाहिए?

अध्यापकों, लेखकों, बुद्धिजीवियों से उम्मीद की जाती है कि वे स्वायत्तता की, व्यक्ति की गरिमा की रक्षा करेंगे और सतहीपन का विरोध करेंगे. इस विरोध से समझ की सामाजिकता का निर्माण होता है. किसी एक का अपमान सामूहिक अपमान होता है. जिस सभा को इन बातों का अहसास न हो, उसे सभ्य कैसे कहा जाए?

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