समकालीन स्त्री लेखन स्पष्ट करता है कि स्त्री अस्मिता कोई तैयार परिभाषा नहीं, बल्कि एक सतत निर्माण की प्रक्रिया है. यह संघर्षों से गुज़रती है, सपनों से दिशा पाती है और अपने सरोकारों के माध्यम से समाज में हस्तक्षेप करती है. यह साहित्य किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने का दावा नहीं करता, बल्कि प्रश्नों को खुला छोड़ता है- ताकि संवाद बना रहे.
बजट सत्र में विपक्ष के लगातार सवालों के बाद मोदी सरकार अपनी भरपूर तल्ख़ी के बावजूद नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर ठीक से आक्रामक तक नहीं हो पा रही: विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव लाने का मंसूबा बांधा, जो टूट गया, क्योंकि सरकार को अचानक याद आया कि अभी तो उन्होंने लोकसभा की विशेषाधिकार हनन समिति ही नहीं बनाई, प्रस्ताव लाए तो भला उसे भेजेंगे कहां?
सरकार ने कहा है कि राष्ट्रगान से पहले अनिवार्य तौर पर हमेशा राष्ट्रीय गीत- वंदे मातरम, को पूरे छह छंदों के साथ गाना होगा. यह दावा करना कि वंदे मातरम का दर्जा बढ़ाया जा रहा है, असल में राष्ट्रगान को नीचा दिखाने का एक तरीका है.
यूजीसी के आंकड़ों में जाति-आधारित भेदभाव बढ़ने की बात सामने आई है, लेकिन उच्च शिक्षा में विकलांग या शारीरिक तौर पर अक्षम छात्रों की अदृश्यता पर चर्चा अब भी सीमित है. शारीरिक अक्षम व्यक्तियों की आर्थिक निर्भरता कोई व्यक्तिगत विफलता नहीं, बल्कि संस्थागत असमानता का परिणाम है. जब उच्च शिक्षा तक पहुंच सीमित होगी, तो कौशल, नेटवर्क और अवसर भी सीमित ही रहेंगे.
हिमंता बिस्वा शर्मा बांग्ला भाषी मुसलमानों के ख़िलाफ़ जो अभियान चला रहे हैं उसे यह कहकर उचित ठहराते हैं कि यह स्थानीय असमिया मुसलमानों के नहीं मात्र घुसपैठियों के विरुद्ध है. अगर मान भी लें कि ये मुस्लिम ठेठ असमिया नहीं हैं, फिर भी उनके ख़िलाफ़ हिंसा के प्रचार और हिंसा की क्या क़ानून इजाज़त देता है?
हिमंता बिस्वा शर्मा भाजपा में शामिल होने के बाद कई कट्टर आरएसएस कार्यकर्ताओं से भी ज़्यादा आक्रामक और मुस्लिम विरोधी हो चले है. उन्होंने अपने संवैधानिक पद का इस्तेमाल नफ़रती भाषणों के लिए किया है.
देश की संवैधानिक संस्थाएं नफ़रत से लड़ नहीं रहीं, वे महज़ दिखावे की कार्रवाई करती हैं या अक्सर नफ़रती भीड़ के साथ खड़ी रह जाती है. नफ़रत से लैस भीड़ के आगे समाज जिस तरह चुप्पी साध रहा है, उससे यही संकेत जाता है कि समाज भी उस हिंसा में शामिल है. दीपक ने इस चुप्पी को तोड़ दिया है.
जो लोग यह तर्क देते हैं कि 'भारत में अब जातिवाद नहीं होता' या 'हमने कभी पिछड़ों के साथ भेदभाव नहीं किया', उनके लिए अफ्रीकन इतिहासकार चिनुआ अचेबे का यह मत याद रखना ज़रूरी है कि इतिहास को सिर्फ शिकारी की निगाह से न देखें, बल्कि उसे शिकार होने वाले की निगाह से भी देखें, तब असली सच्चाई समझ में आती है.
1784 में भीषण अकाल के वक़्त अवध सूबे के नवाब आसफुद्दौला की हुकूमत ने लोगों को रोज़गार उपलब्ध कराने के लिए जो क़दम उठाए, उनके तहत मनरेगा की ही तर्ज पर उनसे काम लेकर मेहनताना कहें या मजदूरी दी जाती थी. इसने उस दुस्सह अकाल के दौरान जहां बड़ी संख्या में लोगों को भूखे मरने से बचाया, वहीं उनके आत्मसम्मान सम्मान की भी रक्षा की.
लोकतांत्रिक भागीदारी, समानता की भावना और समावेशी समाज बनाने की दिशा में अहम यूजीसी की नियमावली पर इतना हंगामा क्यों हुआ? क्या किसी भी क़ानून के दुरुपयोग की छिटपुट आशंकाओं के आधार पर उस क़ानून द्वारा बेहतरी लाने की कोशिश को ही ख़ारिज कर दिया जाना चाहिए?
सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसी नियमावली पर रोक लगाई है जो उसी के आदेश के कारण बनाई और घोषित की गई थी. लेकिन इसके ख़िलाफ़ जिस तरह ‘सवर्ण’ समुदायों का एक हिस्सा भड़क उठा. संख्या में कम होने पर भी इस समुदाय की ताक़त कितनी अधिक है और वह कितना प्रभावी है, सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश से पता लगता है.
जिन सत्य व अहिंसा के बल से महात्मा ने हमारे स्वतंत्रता संग्राम की अगुवाई की, उसे लड़ा व जीता और जिसकी पृष्ठभूमि में देश का संविधान बना और लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना हुई, आज की सत्ताओं द्वारा उनको उनकी धुरी पर सर्वथा विपरीत दिशा में घुमाकर लोकतंत्र व संविधान से दुश्मनी साधी जा रही है.
महाराष्ट्र की राजनीति में ‘दादा’ कहलाने वाले अजित पवार का 28 जनवरी, 2026 को एक विमान हादसे में निधन हो गया. सहकारिता, गठबंधन और सत्ता-यथार्थवाद की राजनीति के प्रतीक रहे पवार के जाने से राज्य की सत्ता-संरचना में एक पूरा ‘पावर-रूम’ अचानक खाली हो गया.
बीबीसी से अपने लगभग तीन दशक के कार्यकाल (1964-94) के दौरान मार्क टली ने भारतीय उपमहाद्वीप की शायद ही ऐसी कोई बड़ी घटना हो जिसे उन्होंने कवर न किया हो. मार्क टली ने अपनी रिपोर्टिंग के ज़रिए जो साख बनाई वह बहुत कम लोगों को नसीब हो पाती है.
स्मृति शेष: यूरोप व अमेरिका का पर्यावरण आंदोलन प्रकृति को मनुष्य से अलग कर संरक्षित करने का हिमायती रहा है. माधव गाडगिल को भारत के लिए संरक्षण का यह मॉडल इसलिए उपयुक्त नहीं लगता था क्योंकि यहां के वन कभी निर्जन नहीं रहे.