संस्मरण: मनरेगा श्रमिकों की उम्मीद बन गया था…

नरेगा का लागू होना देश के श्रमिक इतिहास में पहली घटना थी जब महिलाओं को भी पुरुषों के समान मज़दूरी मिलने लगी थी. बेबस और लाचार ग्रामीण दलित आदिवासी महिलाओं में एक अदृश्य राजनीतिक, सामाजिक सौदेबाज़ी की ताक़त का संचार तेज़ी से हुआ था. अब सरकार ने उनकी उम्मीद छीन ली है.

ज्ञान की गर्दन और हिंदुत्व की तलवार

दिल्ली विश्वविद्यालय में पाठ्यक्रम निर्माण ज्ञान और हिंदुत्ववादी विचारधारा की रस्साकशी बन गया है. जेंडर, जाति, भेदभाव और विश्व इतिहास जैसे विषयों को हटाने का दबाव बढ़ रहा है. इससे अकादमिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक विश्वविद्यालयों की बौद्धिक गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. इसी विषय पर पढ़ें दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद का लेख.

संविधान, समाजवाद और नव-फ़ासीवाद: प्रभात पटनायक की किताब के बहाने भारत का विश्लेषण

प्रभात पटनायक की नई पुस्तक 'सोशलिज़्म एंड द इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन' के ज़रिए हर्ष मंदर भारत के उत्तर-औपनिवेशिक समाजवाद, नव-उदारवाद के संकट और नव-फ़ासीवाद के उभार का गहन विश्लेषण करते हैं. यह लेख संविधान में निहित समतावादी मूल्यों को पुनः हासिल करने की ज़रूरत पर ज़ोर देता है.

बास्केटबॉल कोर्ट में हार्दिक व अमन की मौत का जवाब कौन देगा?

हरियाणा के दो युवा खिलाड़ियों का बास्केटबॉल कोर्ट में जान गंवा देना व्यवस्थागत विफलता है. इन दुर्घटनाओं को लेकर खेल विभाग की जांच के बारे में कोई स्पष्टता नहीं है. इन दोनों निर्मम घटनाओं से यह साफ दिखाई दे रहा है कि व्यवस्थाएं संवेदनहीन और ग़ैर-ज़िम्मेदार हो चुकी हैं.

क्रिसमस से पहले हिंसा और हमले: क्या ईसाई भारत के लोग नहीं हैं?

ईसाइयों के ख़िलाफ़ अभियान पिछले सालों में तेज़ होता चला जा रहा है. भारत की कुल जनसंख्या के मात्र 2.3% ईसाई हैं. पिछले कई दशकों से भारत की आबादी में उनका हिस्सा लगभग यही रहा है. फिर धर्मांतरण से ईसाइयों की जनसंख्या में विस्फोटक बढ़ोत्तरी का ख़तरा क्यों सबको वास्तविक जान पड़ता है?

नेल्ली के पीड़ितों ने 42 साल इंतज़ार किया, लेकिन उन्हें अब भी इंसाफ़ नहीं मिला

नेल्ली के पीड़ितों का दर्द हमें याद दिलाता है कि जो लोग बड़े पैमाने पर हिंसा झेल चुके हैं, उनमें से कई लोग अब भी इंसाफ़ का इंतज़ार कर रहे हैं. लेकिन सरकार ने आज तक किसी को भी इस हद तक बेसहारा नहीं छोड़ा है, जैसा इन लोगों के साथ हुआ है.

क्या मुख्यमंत्री को किसी का चेहरा उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ देखने-दिखाने का अधिकार है?

नीतीश कुमार द्वारा की गई असभ्यता के पक्ष में दलीलें दी जा रही हैं कि मुख्यमंत्री को महिला विरोधी नहीं कहा जा सकता और न मुसलमान विरोधी क्योंकि इन दोनों के हित के लिए उन्होंने कई काम किए हैं. तो क्या इसका यह अर्थ समझें कि अगर आपने मेरी कोई मदद की है तो मैं आपको अपने साथ बदतमीज़ी करने का हक़ दे दूं?

इंडिगो संकट: मुनाफ़े के लिए नियमों की कुर्बानी, सरकार की दोहरी भूमिका और पूंजीवाद की बेरुखी

दिसंबर 2025 का इंडिगो संकट अनियंत्रित पूंजीवाद, डुओपॉली और नियामक विफलता का प्रतीक बन गया. उड़ान रद्द होने से लेकर 400 प्रतिशत तक किराया बढ़ने तक, इस संकट ने दिखाया कि भारतीय विमानन में नागरिक नहीं, मुनाफ़ा केंद्र में है, और सरकार कॉरपोरेट हितों की साझेदार बन चुकी है.

द ग्रेट शम्सुद्दीन फैमिली: औरतों की जानिब से ग़ैर-आधिकारिक हिंदू राष्ट्र युक्त भारत को एक जवाब

अनुषा रिज़वी की 'द ग्रेट शम्सुद्दीन फैमिली' फिल्म के किरदारों के नाम भले मुस्लिम हैं मगर उनके अभिनय में हिंदू राष्ट्र के किरदारों की परछाई तैर रही है. नारों की ध्वनि सुनाई दे रही है. फिल्म के पर्दे पर इनमें से कोई साक्षात दिखाई नहीं देता लेकिन उनकी मौजूदगी का अहसास बना हुआ है. यही इस फिल्म का कमाल है.

जब बस्तर नक्सल मुक्त हो जाएगा, तब क्या होगा?

देश में माओवाद के ख़त्म होने की चर्चाएं तेज़ हैं, और दावा किया जा रहा है कि यह विकास की शुरुआत है. लेकिन माओवाद प्रभावित क्षेत्रों का आदिवासी समाज अपने जल-जंगल-ज़मीन को लेकर चिंतित है. खनन, सैन्य कैंपों के विस्तार और संसाधनों पर बढ़ते कॉरपोरेट दावों के बीच उनके अधिकारों और भविष्य की सुरक्षा पर बड़े सवाल खड़े हैं.

नए लेबर कोड्स: ‘सुधार’ के नाम पर श्रमिक अधिकारों का दमन और कॉरपोरेट हितों को वैधता

'सुधार' और 'सरलीकरण' के नाम पर एक ऐसा तंत्र खड़ा किया गया है, जो दशकों पुराने श्रमिक संघर्षों और उनकी सुरक्षा के अधिकारों को ताक में रखकर पूंजीपतियों की सुविधाओं को प्राथमिकता देता है. श्रम सुधारों का यह स्वरूप कारोबार के ऐसे माहौल का निर्माण कर रहा है जहां कॉरपोरेट हित सर्वोपरि हैं, और श्रमिकों की जायज़ मांगों की अनदेखी की जा रही है.

भारत, इज़रायल और फ़िलिस्तीन: हिंदुत्व विदेश नीति को दे रहा दिशा

नई दिल्ली अब इज़रायल के साथ सैन्य, आर्थिक और वैचारिक संबंधों को भी बढ़ावा दे रहा है. यह लेख ऐतिहासिक घटनाक्रमों की पड़ताल कर बताता है कि कैसे हिंदुत्व भारत की विदेश नीति और घरेलू प्रतिक्रियाओं को नया रूप दे रहा है.

बिहार: प्रशांत किशोर की पदयात्रा लंबी रही, लेकिन चुनावी ज़मीन छोटी पड़ गई

प्रशांत किशोर ने ऐसे हाई-रिस्क मॉडल का प्रयोग किया, जिसमें पूरा अभियान एक लोकप्रिय चेहरे और केंद्रीय नैरेटिव पर टिका था. यह मॉडल विज्ञापन और राजनीतिक ब्रांडिंग की दुनिया में चलता है, लेकिन ज़मीनी राजनीति में यह तभी सफल होगा जब उसके साथ मजबूत स्थानीय नेतृत्व हो.

बिहार ने बदल दी राजनीति, क्या अब महिलाओं का भविष्य बदल पाएगा?

बिहार की महिलाएं अब केवल तटस्थ वोटर नहीं, चुनाव की निर्णायक शक्ति बन चुकी हैं. अब सवाल यह है कि क्या नई सरकार उन महिलाओं के जीवन में वास्तविक परिवर्तन ला पाएगी, जिनके भरोसे वह सत्ता तक पहुंची है?

बिहार चुनाव नतीजे: विजयी दलों के साथ ज्ञानेश कुमार को मिल रही बधाई लोकतंत्र की दशा बताती है

बिहार के विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद सत्तारूढ़ गठबंधन की जीत के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त को इस तरह 'बधाइयां' दी जा रही हैं. ये रोष में दी जा रही हों, क्षोभ में या हताशा में, इनसे इतना तो पता चलता ही है कि बधाइयां देने वालों को इन नतीजों में कितना गहरा अविश्वास है. यह अविश्वास लोकतांत्रिक मूल्यहीनता बरतकर जनादेश को बरबस छीन लेने की उस 'परंपरा' की उपज है, जिसे भाजपा ने पिछले दशक भर में पोषित किया

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