Budget 2019-20

तमाम योजनाओं और करोड़ों रुपये ख़र्च होने के बावजूद गंगा अगर साफ़ नहीं, तो ज़िम्मेदारी किसकी है

उत्तर प्रदेश के वाराणसी के घाटों पर अत्यधिक मात्रा में शैवाल पाए जाने के बाद से एक बार फिर से बहस तेज़ हो गई है कि आखिर हज़ारों करोड़ रुपये ख़र्च करने के बाद भी गंगा स्वच्छ क्यों नहीं हो पा रही है. सवाल उठता है कि क्या भारत सरकार द्वारा गंगा पुर्नरुद्धार के नाम पर बनाई गई परियोजनाएं काग़ज़ी दावे बनकर रह गई हैं.

सरकार ने पीपीएफ और वरिष्ठ नागरिकों की बचत योजनाओं की ब्याज दरों में की भारी कटौती

सरकार ने राष्ट्रीय बचत प्रमाणपत्र और लोक भविष्य निधि समेत लघु बचत योजनाओं पर ब्याज दरें 2020-21 की पहली तिमाही के लिए 1.4 फीसदी तक घटा दी हैं.

श्रम मंत्रालय ईपीएफ जमा पर 8.65 प्रतिशत की ब्याज दर कायम रखने का इच्छुक

वित्त मंत्रालय श्रम मंत्रालय पर इस बात के लिए दबाव बना रहा है कि ईपीएफ पर ब्याज दर को सरकार द्वारा चलाई जाने वाली अन्य लघु बचत योजनाओं मसलन भविष्य निधि जमा और डाकघर बचत योजनाओं के समान किया जाए.

बजट 2020: मौजूदा वित्त वर्ष के लिए गंगा सफाई के बजट में 50 फीसदी की कटौती

वित्त वर्ष 2020-21 के लिए रिवरफ्रंट के सौंदर्यीकरण का बजट घटाकर सिर्फ एक लाख रुपये कर दिया गया है. वहीं राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना के बजट में करीब 30 फीसदी की कटौती की गई है.

बजट में पारदर्शिता को लेकर कई बड़े राज्य फिसड्डी, असम पहले नंबर पर, मणिपुर सबसे नीचे: रिपोर्ट

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक राज्यों की तुलना में केंद्र का बजट ज़्यादा पारदर्शी होता है. हालांकि केंद्र स्तर पर भी अभी भी कई ज़रूरी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया जाता है.

कॉरपोरेट कर दरों में कमी से 1,45,000 करोड़ रुपये की राजस्व हानि होने के आसार: केंद्र

केंद्र सरकार ने यह भी कहा है कि कॉरपोरेट कर में कटौती के ज़रिये दिए गए प्रोत्साहनों से अर्थव्यवस्था में जल्द प्रभाव होने का अनुमान है. भारत में नए निवेश से न केवल नई नौकरियां सृजित होने का अनुमान है बल्कि इससे आय में भी बढ़ोतरी होगी.

कॉरपोरेट टैक्स में कमी का राजकोषीय घाटे पर मामूली असर होगा: नीति आयोग उपाध्यक्ष

नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने कहा कि कंपनी कर में दी गई छूट से उच्च वृद्धि हासिल होगी और कर संग्रह बढ़ेगा जिससे नुकसान की भरपाई हो जाएगी.

बजट 2019 में महत्वाकांक्षाओं की कमी साफ दिखती है

जो लोग इस बजट से भाजपा के चुनावी वादों को पूरा करने के किसी रोडमैप की उम्मीद कर रहे थे, उन्हें इस बजट में एक भी बड़ा विचार या कोई बड़ी पहल दिखाई नहीं दी. रोजगार सृजन और कृषि को फायदेमंद बनाने जैसे मसले पर चुप्पी हैरत में डालने वाली है.

बजट में दीर्घकालिक विकास के लिए रणनीति नहीं दिखाई देती

मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का पहला बजट काफी अच्छी-अच्छी बातें करता है, लेकिन जब एक बड़ी तस्वीर बनाने की कोशिश करते हैं, तो इसमें काफी दरारें दिखाई देती हैं.

विमानन मंत्रालय के लिए बजट में 4,500 करोड़ रुपये आवंटित, पिछले वित्त वर्ष से 115 फीसदी कम

पिछले वित्त वर्ष में विमानन मंत्रालय के लिए 9,700 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे. इस बार क्षेत्रीय संपर्क योजना ‘उड़ान’ के लिए 480 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं. इसके तहत 50 हवाईअड्डों का नवीनीकरण और पूर्वोत्तर संपर्क के लिए धन मुहैया करने का प्रस्ताव है.

अंतरिक्ष विभाग और सरकार के विज्ञान से जुड़े विभागों के बजट में मामूली बढ़ोतरी

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के बजट में पिछले वित्त वर्ष की आवंटित राशि के मुकाबले इस बार 101 करोड़ रुपये की वृद्धि हुई है. वहीं, अंतरिक्ष विभाग के बजटीय आवंटन में पिछले वित्त वर्ष की आवंटित राशि के मुकाबले इस बार 1273 करोड़ रुपये की वृद्धि हुई है.

बजट 2019: पिछले साल की तुलना में इस साल गंगा सफाई के बजट में 1500 करोड़ की कटौती

इस साल मई तक उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक विभिन्न परियोजनाओं के लिए 28,451 करोड़ रुपये की मंज़ूरी दी गई, लेकिन उनमें से केवल 25 फीसदी राशि ही ख़र्च की जा सकी.

बजट 2019ः गैर हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी शिक्षकों की नियुक्ति के लिए 50 करोड़ रुपये आवंटित

नई योजना के तहत ऐसे स्थानों पर उर्दू शिक्षकों की भी नियुक्ति की जाएगी, जहां की 25 फीसदी से अधिक आबादी उर्दू बोलती है. हालांकि, देश में शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों को मजबूत बनाने के लिए शुरू की गई योजना के लिए इस साल बजट आवंटित नहीं किया गया.

New Delhi: Finance Minister Nirmala Sitharaman with MoS Anurag Thakur and others outside the North Block ahead of the presentation of Union Budget 2019-20 at Parliament, in New Delhi, Friday, July 05, 2019. (PTI Photo/Ravi Choudhary)(PTI7_5_2019_000014B)

वित्तमंत्री अगर ‘न्यू इंडिया’ में नई अर्थनीति का जोखिम उठा लेतीं तो बेहतर होता

जब तक भूमंडलीकरण की आर्थिक नीतियों में कोई निर्णायक परिवर्तन नहीं होता, भारत विश्वशक्ति बन जाए तो भी, सरकार का सारा बोझ ढोने वाले निचले तबके की यह नियति बनी ही रहने वाली है कि वह तलछट में रहकर विश्वपूंजीवाद के रिसाव से जीवनयापन करे.