क़ानून के छात्रों को मनुस्मृति पढ़ाने की तैयारी में दिल्ली विश्वविद्यालय, विरोध में वीसी को लिखा गया पत्र

दिल्ली विश्वविद्यालय का विधि संकाय अपने स्नातक कार्यक्रम में उस संस्कृत ग्रंथ 'मनुस्मृति' को शामिल करने की योजना बना रहा है, जिसे जलाकर भारत के पहले क़ानून मंत्री डॉ. बीआर अंबेडकर ने समाज में मौजूद जाति व्यवस्था का विरोध किया था.

जेल मैनुअल में जाति-आधारित नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई, नोडल अफसर तैनात करने का इरादा

शीर्ष अदालत द वायर की पत्रकार सुकन्या शांता द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उन्होंने अपनी पड़ताल के आधार पर बताया है कि कई राज्यों के जेल मैनुअल जेलों में जाति-आधारित भेदभाव को बढ़ावा देते हैं, जहां जेलों के अंदर काम के आवंटन में भेदभाव किया जाता है.

हिंदी साहित्य हिंदी समाज का राजनीतिक प्रतिपक्ष बन गया है: अशोक वाजपेयी

परंपरा पर जो दबाव हिंदी अंचल पर पड़े हैं, वे केरल या महाराष्ट्र में नहीं थे. वहां परंपरा अधिक सजीव रही है, सुरक्षित रही है और उसे आत्म विस्तार, आत्माविष्कार  का अवसर मिलता रहा. यहां बार-बार आक्रमण होते रहे हैं. इसलिए यहां की संस्कृति अस्थिर है. इसके जो दुष्परिणाम हैं, उनमें से एक है हिंदुत्व.

हम सियासत और वोट के लिए किसी जाति-धर्म का अपमान नहीं कर सकते: पप्पू यादव

वीडियो: बिहार के पूर्णिया से नवनिर्वाचित सांसद पप्पू यादव का कहना है कि निर्दलीय चुनाव लड़ने के बावजूद वे ख़ुद को कांग्रेसी ही मानते हैं और उनका समर्थन कांग्रेस को है. उनसे बातचीत.

पक्ष-विपक्ष में बंटे विमर्शों में जनतंत्र के पाले में कौन है?

जनतंत्र के नाम पर अब कोई भी पक्ष लिया जा सकता है. इसका एक कारण यह भी है कि अब किसी चीज़ के कोई मायने नहीं: न मुक्ति, न समानता, न धर्मनिरपेक्षता, न पूंजी, न मज़दूर: सारे शब्द और अवधारणाएं व्यर्थ हो चुके हैं. कविता में जनतंत्र स्तंभ की 30वीं क़िस्त.

भाजपा के सवर्ण नेताओं पर मतदाता हुए कठोर, दलितों-आदिवासियों के बीच बढ़ी कांग्रेस की साख

हिंदी पट्टी में भाजपा ने 51 सीटें गंवा दी हैं, जिनमें से 22 सीटें सवर्ण सांसदों के पास और केवल सात सीटें ओबीसी सांसदों के पास थीं.

नहीं का मुक़ाम

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: अगर हम मनुष्य हैं, भारतीय लोकतंत्र के नागरिक हैं और अपने राष्ट्रीय आप्तवाक्य ‘सत्यमेव जयते’ पर विश्वास करते हैं, अगर अब लग रहा है कि संविधान और उसके बुनियादी मूल्यों स्वतंत्रता-समता-न्याय-बंधुता को बचाना है तो हम चुपचाप नहीं रहें.

विवादित स्थल पर सिमट गया राम का साम्राज्य

कुंवर नारायण की कविता राम को सकुशल सपत्नीक वन में लौट जाने की सलाह देती है. लेकिन हमारे काव्यों ने तो उन्हें वहां से निकालकर युद्धक्षेत्र में भेज दिया था! आज फिर एक युद्ध चल रहा है और राम एक पक्ष के हथियार बना दिए गए हैं. कविता में जनतंत्र स्तंभ की तेरहवीं क़िस्त.

जनतंत्र का लोप अचानक आई आपदा नहीं, एक प्रक्रिया है

एक आराध्य का चुनाव भीड़ को जन्म देता है. एक नेता में आस्था जिससे कोई सवाल नहीं किया जा सकता, जिसकी सिर्फ़ जय-जयकार ही की जा सकती है. कविता में जनतंत्र स्तंभ की बारहवीं क़िस्त.

जनता की सजगता और सक्रियता के बिना जनतंत्र का बने रहना संभव नहीं

जनतंत्र में आशंका बनी रहती है कि जनता प्रक्रियाओं को लेकर निश्चिंत हो जाए और यह मानकर उन पर भरोसा कर बैठे कि वे अपना काम करते रहेंगे और जनतंत्र सुरक्षित रहेगा. मगर अक्सर यह नहीं होता. कविता में जनतंत्र स्तंभ की ग्यारहवीं क़िस्त.

हिंदुत्व हिंदू धर्म और भारतीय राजनीति में घुसपैठिया है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: हिंदुत्व के प्रतिपादक और उसके अनुयायी किसी हिंदू अध्यात्म या चिंतन परंपरा का कभी उल्लेख नहीं करते. असल में तो हिंदुत्व एक शुद्ध राजनीतिक विचारधारा है जो धर्म में घुसपैठ कर रही है.

लोकतंत्र ही नहीं हमारी मानवीयता में भी लगातार कटौती हो रही है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: हिंदी अंचल इस समय भाजपा और हिंदुत्व के प्रभाव में है, लगभग चपेट में. इस दौरान सार्वजनिक व्यवहार में कुल पंद्रह क्रियाओं से ही काम चलता है. ये हैं: रोकना, दबाना, छीनना, लूटना, चिल्लाना, मिटाना, मारना, पीटना, भागना, डराना-धमकाना, ढहाना, तोड़ना-फोड़ना, छीनना, फुसलाना, भूलना-भुलाना.

चुनाव आयोग के नोटिस के बाद उद्धव ठाकरे बोले- अभियान गीत से नहीं हटाएंगे ‘जय भवानी’, ‘हिंदू’ शब्द

चुनाव आयोग ने शिवसेना (यूबीटी) के अभियान गीत से 'जय भवानी जय शिवाजी’ और ‘हिंदू हा तुझा धर्म’ शब्द हटाने के लिए नोटिस दिया है. पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे ने कहा कि पहले आयोग को पीएम नरेंद्र मोदी और अमित शाह के ख़िलाफ़ कार्रवाई करनी चाहिए जिन्होंने कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान ‘बजरंग बली की जय’ और अयोध्या में रामलला के दर्शन के नाम पर वोट मांगा था.

लोकतंत्र को सीधी राह पर लाने का क्या उपाय है?

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: लोकतंत्र अपने आप सीधी राह पर वापस नहीं आता या आ सकता. हम ऐसे मुक़ाम पर हैं जहां नागरिक के लोकतांत्रिक विवेक की परीक्षा है. उन्हें ही निर्णय करना है कि वे लोकतंत्र पर सीधी राह पर वापस लाने की कोशिश करना चाहते हैं या नहीं.

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