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हमारे घरों के बच्चे जेएनयू आकर ‘देशद्रोही’ क्यों हो जाते हैं?

ऐसा क्यों है कि अलग-अलग जगहों से आने वाले बच्चे यहां आकर लड़ने वाले बच्चे बन जाते हैं? बढ़ी हुई फीस का मसला सिर्फ जेएनयू का नहीं है. घटी हुई आज़ादी का मसला भी सिर्फ जेएनयू का नहीं है.

New Delhi: Jawaharlal Nehru University President Aishe Ghose addresses during a protest march towards Parliament, on the first day of the Winter Session, in New Delhi, Monday, Nov. 18, 2019. The students have been protesting for nearly three weeks against the draft hostel manual, which has provisions for a hostel fee hike, a dress code and curfew timings. (PTI Photo/Shahbaz Khan)(PTI11_18_2019_000290B)

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ की अध्यक्ष आईसी घोष. (फोटो: पीटीआई)

जेएनयू एक यूनिवर्सिटी थी. अब वह वैसी नहीं रही. जेएनयू अब या तो प्यार है या नफ़रत. पिछले पांच सालों में देश और दुनिया के लिए अब यही जेएनयू बचा है. उनकी लड़ाइयों के साथ खड़े होना या उनकी लड़ाइयों से नफ़रत करना. उनके मूल्यों की तरफ़दारी में खड़े होना या उनकी तरफ़दारी को बेगारी और बीमारी कहना. पिछले पांच सालों की अपनी ‘तारीफ़’ से जेएनयू की अब यही ‘तारीख़’ बन गई है.

एक ‘देशद्रोही और गद्दार’ जेएनयू. एक सरकार से असहमत लोगों का प्यार जेएनयू. इस जेएनयू के भीतर कई जेएनयू थे और हैं. जो बदलकर बना हुआ जेएनयू है, वह असहमतियों की एकता का जेएनयू है.

पहले वह सिर्फ जेएनयू के भीतर तक ही था अब वह पूरे मुल्क में है. वह एक आदत सा हो गया है. अब देश में कहीं भी असहमत होना ही वहां का विद्यार्थी होना सा हो गया है. जो जहां भी असहमत है वह जेएनयू वाला है. वह उस तरफ है जो असहमतियों वाला जेएनयू है.

वे जो जेएनयू को ‘देशद्रोही और गद्दार’ कहते हैं. वे इतनी सारी असहमतियों वाले जेएनयू को एक सहमति की एकता देते हैं. असहमत लोगों की एकता. ‘देशद्रोही और गद्दार’ कहने वालों ने उसे एक तरह की मजबूती दी है. उसे एक तरह की ताक़त दी है. असहमतियों वाला जेएनयू यहीं से लड़ने के लिए सहमत होता है.

क्या असहमत होना बुरी चीज है? कम शब्दों में यही तो लोकतंत्र का हासिल है. असहमत होने का हक़. पुरानी तारीखों में इन्हीं असहमतियों ने ही दुनिया को बदला है. असहमतियों ने ही उस राजा को बदला था. जो दुनिया में लोकतंत्र के विचार आने के पहले हुआ करता था. पुरानी तारीखों की असहमतियों ने राजशाही को बदला है. दुनिया को चलाने की यह बदली हुई व्यवस्था असहमतियों से होती हुई यहां तक आई है. जो अभी है. जो जैसी भी अभी बन बिगड़ रही है. दिन इसके, अभी बहुत कम हुए हैं. दिन इसके जैसे लद से गए हैं.

जिस लोकतंत्र में वे शासक बनकर आए हैं, उसके लिए अतीत में जाने कितने पुरखों ने अपने खून बहाए हैं. जिनके ख़ून बहे वे सब असहमत लोग थे. जो जैसा चल रहा था उससे असहमत लोग. वे सहमत होते तो आज एक राजा होता. दुनिया में कई राजा होते. वोट देने और चुनने के हक़ को पा कर बहल जाने की मोहलत न होती. राजा के राजा होने से कुछ लोग सहमत नहीं थे. वे सब अपने समय के जेएनयू थे. जो बहा था वह इन्हीं असहमत लोगों का ख़ून था.

राजा और सत्ता के साथ सहमत तब भी बहुत थे. सत्ता और सरकार के साथ सहमत आज भी बहुत हैं. तब भी ज़्यादा तादाद उन्हीं की थी. अब भी ज़्यादा तादाद उन्हीं की है. क्योंकि सहमति एक तरह की सुविधा है. सहमति सुकून है. ताकतवर के साथ खड़े होने का सुकून. सत्ता के साथ अड़े होने का सुकून.

लेकिन उन तारीखों के बाद की तारीखों में वे हार गए थे. वे, जो सहमत थे. वे अपने ही खिलाफ़ थे. अपने पर ही जुल्म के साथ थे. क्योंकि सत्ता की सुविधा सिर्फ सत्ता के पास होनी थी. जनता के लिए सहमति का सुकून इक जुनून था. जनता के लिए सत्ता से सहमति का सुकून आज भी इक जुनून है. सहमति बदलाव की गुंजाइश को ख़त्म करती है. सहमति ताकतवर के साथ खड़े होने की सुविधा जैसी है.

वे, जो आज सरकार की तरफ़दारी में बोल रहे हैं. वे, जो ताकतवरों की तरफदारी में बोल रहे हैं. वे उनकी तरफ़दारी में बोल रहे हैं जो हम पर शासन करते हैं. अपने पर शासन करने वालों की तरफ़दारी में बोलना, अपने खिलाफ़ ही बोलना है. अपने हक़ के लिए बोलना, उनके खिलाफ बोलना है. उनसे असहमत होना है. यही असहमति ही जेएनयू है.

पिछले दिनों कन्हैया कुमार और जेएनयू देश में पर्याय बन गए. कन्हैया कुमार और उनके विचारों से असहमत लोग सबसे ज़्यादा जेएनयू में मिलेंगे. देश में कन्हैया के प्रसंशक और सहमत लोग भले ही बहुत हों. जेएनयू की यही असहमति ही लोकतंत्र की खूबसूरती है. जिसे वे कुचलना चाहते हैं. वे असहमति वाले लोकतंत्र के साथ नहीं चलना चाहते हैं.

(फोटो: पीटीआई)

(फोटो: पीटीआई)

एक यूनिवर्सिटी का डर जब इतना बढ़ जाए कि पुलिस के साथ सैन्य बल उतारने पड़ें. एक यूनिवर्सिटी का डर जब इतना बढ़ जाए कि सरकार को उसके खिलाफ़ प्रचार के लिए खर्च करना पड़े. देश के नागरिकों के भीतर अपने ही देश के बच्चों के खिलाफ़ उनका ज़ेहन भरना पड़े. घर-घर में अपने होने का दावा करने वाला प्रधानमंत्री जब डर-डर के बदला लेने की योजनाएं बनाए और बनवाए. ऐसा क्या है एक विश्वविद्यालय में. ऐसा क्यों है उस विश्वविद्यालय में?

ऐसा क्यों है कि अलग-अलग जगहों से आने वाले बच्चे यहां आकार लड़ने वाले बच्चे बन जाते हैं? आपके बच्चे ‘देशद्रोही’ बच्चे बन जाते हैं? वह यही असहमत होने का हक़ है. वह सबके लिए समानता की मांग है. सबके लिए सस्ती शिक्षा की मांग इसीलिए है. सबके लिए मुफ्त शिक्षा की मांग इसीलिए है.

बढ़ी हुई फीस का मसला सिर्फ जेएनयू का नहीं है. घटी हुई आज़ादी का मसला भी सिर्फ जेएनयू का नहीं है. पढ़ने-लिखने के हक़ का मसला क्या सिर्फ जेएनयू का है? यह मसला आवाम का है. आने वाली आवाम का. जो या तो आपके बच्चे होंगे या तो आपके बच्चों के बच्चे.

लोगों ने लड़कर जो हासिल किया था वह लोकतंत्र के और लोकतांत्रिक होते जाने की बात थी. वह राज्य के और कल्याणकारी होते जाने की बात थी. राज्य के तरफ से जनता को वादे की बात थी. उनके दावे की बात है. उनके दावे की बात जो आज विकास और वृद्धि के नारे को दोहरा रहे हैं. जिनका समर्थन करते हुए आप साइनिंग इंडिया गा रहे हैं. जो कह रहे हैं कि सत्तर सालों में भारत पहली बार बेहतर हुआ है. फिर वह बेहतरी उन्हीं की जुबान तक क्यों रहे. आपके मकान तक क्यों न पहुंचे.

यह फीस क्यों बढ़ाई जाए. यह फीस क्यों न घटाई जाए. पहले से कम क्यों न कर दी जाए. भले ही वह 100 रूपए से 99 रूपए कर दी जाए. सत्तर सालों में जो पढ़ाई का खर्च था आपको उससे कम खर्च करना पड़े. क्योंकि देश बेहतर हुआ है. जेएनयू ही नहीं सबकी पढ़ाई के खर्च कम कर दिए जाएं. सबके दवाई के खर्च कम कर दिए जाएं. बेहतर हुआ राज्य आपको और हमको भी थोड़ी बेहतरी दे.

क्या आपको इसके खिलाफ़ खड़ा होना चाहिए? क्या बेहतर हो रहे मुल्क़ में आपको और आवाम को बेहतरी नहीं मिलनी चाहिए? क्या आप ऐसी मांग करेंगे कि बेहतर होते देश में आपको बदतरी मिले? जब राजशाही समृद्ध होती थी तो सोने के सिक्के बनवाती थी. समृद्ध होते देश को अपने लोगों को सुविधा और सुकून देना ही चाहिए. बल्कि शिक्षा को मुफ्त कर देना चाहिए.

आवाम पढ़ाई का खर्च क्यों दे. जबकि सरकार छात्रों को पढ़ा कर अपने लिए मानव संसाधन तैयार कर रही. यह खर्च मां-बाप क्यों दें. वे सरकार को उसके मानव संसाधन के तौर पर अपनी औलादें तो दें. औलादों को राज्य का संसाधन बनाने के लिए लागत क्यों दें? राज्य अपने संसाधन तैयार करने के लिए दोहरी वसूली क्यों करे? जबकि संसाधन बनने के बाद अपनी मेहनत का टैक्स भी हम अदा ही कर रहे हैं.

हमारी मेहनत का एक हिस्सा उसका मुनाफा बन रहा है. हमारी मेहनत के एक हिस्से से वह टैक्स लेता है. हम जो कुछ भी खरीदतें हैं उस पर फिर से टैक्स लेता है. जब वह हमें संसाधन के रूप में तैयार कर रहा होता है तो उसकी भी वसूली हमसे क्यों की जाए? क्या राज्य एक वसूली गिरोह है?

क्या यह हमसे कोई सौदा करता है? क्या मुफ्त शिक्षा कोई उपकार है? यह किसी के टैक्स के पैसे की अय्यासी भी नहीं. यह राज्य द्वारा अपने संसाधन तैयार होने के पहले का इन्वेस्टमेंट है. जिसे उसे करना चाहिए. जिसे आप और हम वर्षों से करते आ रहे हैं, भरते आ रहे हैं. जेहन को इसकी आदत पड़ गई है और अब हम राज्य से मोहलत तक नहीं मांग रहे कि राज्य अपने संसाधन की तैयारी में खुद खर्च करे. क्योंकि वह राज्य है, वह कोई वसूली गिरोह नहीं.

फीस की बढ़ाई और टैक्स के पैसे की पढ़ाई का जो लोग समर्थन कर रहे हैं. वे देश से और आवाम से प्यार करने वाले लोग नहीं हैं. वे आवाम के खिलाफ खड़े लोग हैं. वे लोग इस राज्य को गिरोह में तब्दील कर देना चाहते हैं. वे उसे एक लोकतांत्रिक राज्य नहीं, उसे वसूली गिरोह बनाना चाहते हैं.

ऐसा गिरोह जो आपसे गलत वसूली करता है. डराता है. धमकाता है. और आपकी असहमति पर आपको अपने हथियारों से पीटता है. नागरिक के तौर पर इसका समर्थन कौन करेगा? जो देश से प्यार करते हैं क्या वे उसे गिरोह बनने देंगे? धमकाने, डराने और वसूली करने वाला गिरोह.

वे देश के खिलाफ और देश से नफरत करने वाले लोग हैं जो उसे वसूली गिरोह तक ले जाना चाहते हैं. उसकी वसूली बढ़ाना चाहते है. उस वसूली से मुनाफे में हिस्सा पाना चाहते हैं. इस मुनाफ़े और वसूली में वे नागरिकों से नागरिक होने का ज़ेहन तक छीन रहे हैं. नागरिक के तौर पर हम सबको वह बचा लेना चाहिए. उनसे असहमत हो जाना चाहिए. असहमति जो इन दिनों जेएनयू कही जाने लगी है.

(लेखक जेएनयू में फेलो हैं.)