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‘तुम्हारा यह (साबुन-शैम्पू) दान एक गाली है मेरे आत्मसम्मान के लिए’

पिछले हफ़्ते उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के दौरे से पहले मुसहर समुदाय के लोगों को साबुन और शैम्पू बांटे गए ताकि वे मुख्यमंत्री से मिलने के लिए नहा-धोकर आएं. कवि असंग वानखेड़े ने इसके जवाब में एक कविता लिखी जो सोशल मीडिया पर ख़ूब वायरल हुई. मूलत: अंग्रेज़ी में लिखी गई इस कविता का अनुवाद अवढर ने किया है.

फोटो: एएनआई

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प्रतिदान

यह रहा मेरा प्रतिदान
मुझे अस्वच्छ बनाया तुम्हारे मनु ने
तुम्हारे मनुवादी दिमाग को
मुझसे मेरे जातिनाम की बू आती है
छूत लगती है
मैं तो अपने जख्मों के सोंधेपन से
जगमगा रहा हूं
जो तुम्हें लग रही है
तुम्हारे किए उत्पीड़न की सड़ांध है
तुम्हारे उस पाख़ाने की बदबू नहीं
जिसे मैं अपने सिर पे ढो रहा हूं
यह साबुन शैम्पू जो तुमने दिया
आका को ख़ुश करने के वास्ते
काश तुम इनसे
उस गंदी बदबूदार ज़बान को साफ़ कर लेते
जो अक़लियतों के साथ ज़िना और तशद्दुद करना चाहती है
या उस दिमाग़ को जो मनुवाद और वर्णाश्रम धर्म सिखाता है
तुम्हारा यह दान
एक गाली है मेरे आत्मसम्मान के लिए
इस प्रतिदान से मैं गरियाता हूं
इस कपट को तुम्हारे
हमारे बाबा साहेब को हमसे छीनने की तुम्हारी यह कोशिश
हमारे लिए उबटन सरीखी है
लेकिन यह साबुन तुम्हारा
जाति और छूत के हमारे जख़्मों में
भर देता है मवाद
मुझे तुम्हारी सहानुभूति नहीं
नफ़रत चाहिए
मैं बग़ावत की पुकारों के बीच
गाता हूं दावेदारी का गीत
यही मेरा आत्मसम्मान है
यही मेरी आज़ादी
प्यारी आज़ादी
वो आज़ादी जिसके लिए लड़ा और मरा जा सकता है
सिर्फ़ दो जून रोटी के लिए
मुझे सिर पर तुम्हारा पाखाना ढोना है
न ढोऊं तो तुम्हारे गणतंत्र में
हर रात मुझे भूखा ही सोना है
इस साबुन शैम्पू से
तुम्हारी मूर्खता का पेट भरे तो भरे
मेरा कतई नहीं भरेगा
आज पधारे हैं तुम्हारे आका
देश में छा जाने का इरादा लेकर
हमारी धुलाई की जा रही है
हमें दिखाने लायक बनाया जा रहा है
हमें चमचों की तरह उछलना सिखाया जा रहा है
मालिक, आओ देखो यह हमारा घर है
तुम्हारे इस भगवा अंगोछे से अधिक स्वच्छ
लेकिन बोलना मत अगर तुम्हें
अपनी अंतरात्मा भी इतनी ही स्वच्छ न लगे
बिहंसना मत
जब तक जला न दो अपने मन में नाचते मनु की तस्वीर
क्योंकि अब टूटने ही वाली है मेरी ख़ामोशी
भुरुकवा उग आया है आसमान में
जा रहे हो तो ले जाओ मेरा प्रतिदान
ये मेरे साबुन लो
बुद्ध और आंबेडकर
साफ़ कर लो अपनी दिमाग़ी ग़ुलामी
जला दो अपनी सोच में समाए मनु को
मिटा दो जात-पात
भगवे को धो कर सफ़ेद कर डालो
एक साथ दो सूरज नहीं रह सकते आसमान में
यह हमारा सूरज है
उगा है तुम्हारे पापसूर्य को जला कर राख कर देने.

(असंग वानखेड़े कवि और वकील हैं. वे नेशनल लॉ यूनीवर्सिटी में आंबेडकर पेरियार फुले स्टडी सर्किल के सहसंस्थापक भी हैं.)