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दिल्ली विश्वविद्यालय के अस्थायी शिक्षकों को सड़क पर क्यों उतरना पड़ा?

बीते एक सप्ताह से दिल्ली विश्वविद्यालय के एडहॉक शिक्षक दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के नेतृत्व में स्थायी नियुक्ति को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं. नियुक्ति के अलावा इनकी कई और मांगें हैं, जिनमें वीसी का इस्तीफ़ा भी शामिल है.

DUTA Protest FB Rajiv Ray

सभी फोटो साभार: फेसबुक/@Rajib Ray

नई दिल्लीः दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के लगभग 5,000 एडहॉक शिक्षक बीते एक सप्ताह से हड़ताल पर हैं. इसकी वजह है डीयू प्रशासन की ओर से 28 अगस्त को जारी किया गया नोटिस, जिसमें यूनिवर्सिटी के सभी कॉलेजों को निर्देश दिए गए थे कि वे एडहॉक शिक्षकों की नियुक्तियों पर रोक लगा दें और उनकी जगह गेस्ट टीचर की भर्ती करें.

इन शिक्षकों का नवंबर महीने का वेतन भी रोक दिया गया है. इसी के विरोध में कुछ अन्य मांगों के साथ दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (डूटा) के आह्वान पर एडहॉक शिक्षक सड़कों पर उतर आए.

शिक्षकों द्वारा यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर के ऑफिस का घेराव के बाद मानव संसाधन विकास (एचआरडी) मंत्रालय ने डीयू प्रशासन के साथ एक बैठक की थी, जिसमें मंत्रालय ने एडहॉक शिक्षकों के हित में फैसला सुनाया था लेकिन इसके बावजूद शिक्षकों की हड़ताल जारी है क्योंकि अब ये शिक्षक इस समस्या का स्थायी समाधान चाहते हैं.

शिक्षकों का कहना है कि बेशक एचआरडी मंत्रालय का फैसला हमारे पक्ष में आया हो लेकिन अभी इस संबंध में किसी तरह का आधिकारिक आदेश नहीं मिला है. एडहॉक शिक्षकों को उनके मौजूदा पदों पर स्थायी करना, वाइस चांसलर को हटाना, प्रमोशन, पेंशन और भत्ते देना उनकी प्रमुख मांगें हैं.

कौन हैं एडहॉक शिक्षक

अस्थायी शिक्षकों को एडहॉक कहा जाता है, जिनका स्तर असिस्टेंट प्रोफेसर के बराबर होता है. डीयू की कार्यकारी परिषद द्वारा 2007 में बनाए गए नियम के मुताबिक, अतिरिक्त वर्कलोड होने या किसी शिक्षक के छुट्टी पर जाने से खाली हुए पदों पर एडहॉक नियुक्त किए जाएंगे.

डीयू के नियमों के अनुसार एडहॉक शिक्षक की नियुक्ति अधिकतम चार महीने यानी 120 दिन के लिए की जाती है और इनकी संख्या विश्वविद्यालय के कुल शिक्षकों के 10 फीसदी से ज्यादा नहीं होगी और इनके प्रदर्शन के अनुरूप हर चार महीने पर इन्हें रिन्यू किया जाता रहेगा.

वर्तमान में डीयू में एडहॉक शिक्षकों की संख्या लगभग 5000 है. इन एडहॉक शिक्षकों का कहना है कि न तो इन्हें स्थायी शिक्षकों की तरह छुट्टियां, भत्ते आदि की सुविधाएं मिलती हैं और ये अनिश्चितता की स्थिति में ही रहते हैं. उनका आरोप है कि यह डीयू प्रशासन की तानाशाही है, वे जिसके खिलाफ हैं.

जिम्मेदारियां स्थायी शिक्षक की पर सुविधाएं नहीं

प्रदर्शन कर रहे एडहॉक शिक्षकों में से एक लता भी हैं. डीयू के श्रद्धानंद कॉलेज में पढ़ाने वाली लता बताती हैं, ‘मैं बीते नौ साल से स्वामी श्रद्धानंद कॉलेज में पढ़ा रही हूं. हमारी मांग है कि हमें जल्द से जल्द परमानेंट किया जाए. हमारी नौकरियों की कोई सिक्योरिटी नहीं है. हमें हर चार महीने पर रिचार्ज कूपन की तरह एक पत्र मिलता है, जिसके जरिए हमें रिन्यू किया जाता है, किसी तरह की जॉब सिक्योरिटी नहीं है. अगले चार महीने पर यह पत्र मिलेगा भी नहीं, इसे लेकर भी डर बना रहता है. न जॉब की सिक्योरिटी है और न ही छुट्टियों का ही कोई प्रावधान है. इस सिस्टम में हमारा उत्पीड़न हो रहा है, हमसे सारे काम करवाए जा रहे हैं.’

ऐसी ही शिकायत एक अन्य एडहॉक शिक्षक महिमा भी बताती हैं. वे कहती हैं, ‘एक महिला शिक्षक को किन-किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा रह है, ये प्रशासन नहीं समझ सकता. कभी किसी गेस्ट टीचर से पूछना कि क्या कभी उन्हें मातृत्व अवकाश मिला है? जब वो अस्पताल में भर्ती होती है तो क्या कभी कॉलेज किसी तरह की मदद करता है? मैं खुद सीजेरियन डिलीवरी के बाद अपने 10 दिन के बच्चे को घर में छोड़कर कॉलेज पढ़ाने आ गई थी. किसी स्थायी प्रोफेसर की नौकरी, नौकरी है, हमारी (एडहॉक) नहीं, किसी स्थायी महिला प्रोफेसर की डिलीवरी, डिलीवरी है लेकिन हमारी नहीं.’

28 अगस्त को डीयू प्रशासन की ओर से जारी नोटिस में इन्हीं एडहॉक शिक्षकों की नियुक्ति पर रोक लगाने का निर्देश दिया गया था. इस नोटिस के बारे में हंसराज कॉलेज के एडहॉक शिक्षक विपिन रावत बताते हैं, ‘डीयू प्रशासन ने नोटिस में कहा था कि अब आगे से एडहॉक शिक्षकों की नियुक्तियां नहीं की जाएं, गेस्ट शिक्षकों की भर्तियां हों. गेस्ट टीचर को एक क्लास का 1,500 रुपये मिलता है, महीने में उसे 50,000 रुपये से अधिक वेतन नहीं मिलेगा और उसमें भी टीडीएस वगैरह कटने का प्रावधान है जबकि एक एडहॉक शिक्षक को असिस्टेंट प्रोफेसर के बराबर वेतन मिलता है.’

वे आगे कहते हैं, ‘इस तरह डीयू प्रशासन के इस फरमान से हमें एडहॉक से भी निचले पायदान पर लाकर खड़ा करने की साजिश रची गई थी. हमें दिहाड़ी मजदूर बना दिया. ये प्रशासन दिहाड़ी शिक्षक के आधार पर हिंदुस्तान की उच्च शिक्षा को चलाना चाहते हैं, जो बहुत ही खतरनाक ट्रेंड हैं. सरकार आए दिन नीतियां बदल रही है, जिस नीति के जरिए सरकार शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए धन मुहैया करती है, उसे हटाकर शिक्षा को प्राइवेट माफिया के हवाले किया जा रहा है.’

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‘अगर एडहॉक शिक्षकों का प्रदर्शन संतोषजनक तो स्थायी करने में दिक्कत क्यों?’

डीयू में इस समय सेमेस्टर परीक्षाएं चल रही हैं और विरोध कर रहे इन एडहॉक शिक्षकों ने उनका बहिष्कार किया हुआ है, जिसके बाद अब नॉन टीचिंग स्टाफ छात्रों की परीक्षाएं करा रहा है. एडहॉक शिक्षकों की प्रमुख मांग समायोजन यानी एब्सॉर्प्शन की है.

विपिन रावत कहते हैं, ‘फिलहाल हमारी सबसे महत्वपूर्ण मांग एब्सॉर्प्शन की है. 2005 में डीयू में 500 एडहॉक शिक्षक थे, जिनकी संख्या बढ़कर अब 5,000 के पास पहुंच गई है. अब संख्या क्यों बढ़ी? इस पर तो सरकार को पहले सोचना चाहिए था. इतनी बड़ी संख्या को नियुक्तियां कैसे दें, अब इसी बहाने एडहॉक पद को ही खत्म किया जा रहा है. प्रशासन की 28 अगस्त का नोटिस एक बहाना था, जिसके जरिए सरकार हमें सड़क पर लाना चाहती थी लेकिन वह प्रयास असफल रहा. अब हम एब्सॉर्प्शन लेकर रहेंगे.’

प्रदर्शन कर रहे शिक्षकों में से शिवम सवाल करते हैं कि एडहॉक शिक्षक को टीचर इंचार्ज, कॉलेज के प्रिंसिपल और गवर्निंग बॉडी की मंजूरी के बाद ही हर चार महीने पर रिन्यू किया जाता है. एडहॉक के प्रदर्शन से संतुष्ट होकर ही उसे दोबारा रिन्यू किया जाता है तो अगर शिक्षकों का प्रदर्शन संतोषजनक है तो फिर हमें स्थायी करने में दिक्कत कहां है?

वे आगे बताते हैं, ‘डीयू में बीते पांच-छह सालों में बिल्कुल जीरो नियुक्तियां हो रही हैं. आज समस्या ये खड़ी हो गई है कि आप आप इतनी बड़ी तादाद में एडहॉक शिक्षकों को नियुक्त नहीं कर सकते क्योंकि एक कॉलेज के एक विभाग में नियुक्ति होने में चार दिन लगते है. डीयू में 60 कॉलेज हैं और हर कॉलेज में 10 विभाग हैं तो इस लिहाज से इन सभी को रेगुलर करने में ही पांच साल लग जाएंगे. एक समस्या ये है कि रेगुलर अपॉइन्टमेंट कभी होते ही नहीं, कभी वीसी बदल जाता है, कभी एचओडी की बदली हो जाती है, कभी प्रिंसिपल बदल जाता है. इसमें डीयू प्रशासन की तरफ से राजनीति हो रही है क्योंकि देशभर के विश्वविद्यालयों में नियुक्तियां हो रही हैं लेकिन डीयू में दूर-दूर तक ऐसा कुछ नहीं है तो मैं इसे राजनीति ही कहूंगा.’

शिक्षक बताते हैं कि यही एडहॉक शिक्षक सालों-साल कॉलेजों में पढ़ाते रहते हैं और उनको नियुक्ति नहीं दी जाती. पिछले दस साल से किरोड़ीमल कॉलेज में बतौर एडहॉक पढ़ा रहे कमलेश कहते हैं, ‘डीयू के सिस्टम में जितने भी 4,800 एडहॉक शिक्षक हैं, उन्हें डीयू के नियम-कायदों के तहत स्थायी किया जाए. डीयू के नियमों के अनुरूप अगर आपको एक सेमेस्टर से अधिक समय के लिए शिक्षकों की जरूर है तो उसे अस्थायी स्टेटस देना होता है. इस अस्थायी स्टेटस में वित्तीय लाभ होता है लेकिन उनकी सर्विस स्थायी नहीं है. डीयू में ऐसे बहुत से शिक्षक हैं, जो 20 से अधिक सालों से पढ़ा रहे हैं, 65 साल की उम्र पार कर जाते हैं लेकिन उनका रिक्रूटमेंट नहीं होता फिर यह तो सरकार और वीसी की जवाबदेही है.’

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डीयू के श्यामलाल कॉलेज में धरने पर बैठे एडहॉक शिक्षक

स्थायी नियुक्ति को न क्यों?

रामलाल कॉलेज में पढ़ा रहे जितिन त्रिपाठी इसी बात को आगे बढ़ाते हैं, ‘हम एडहॉक शिक्षकों का कभी इंक्रीमेंट नहीं होता. हमारी महिला साथियों को मैटरनिटी लीव नहीं मिलती. हर परिस्थितियों में हम काम करते हैं. हमारा मानना है कि सामान्य प्रक्रिया से एडहॉक शिक्षकों को स्थायी नहीं किया जा सकता क्योंकि किसी न किसी कारणवश या बहाने से यहां नियमों में बदलाव किया जाता है. कभी रोस्टर प्रणाली में बदलाव ,तो कभी किसी तरह का संशोधन. देश के कई राज्यों उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश में एडहॉक शिक्षकों को स्थायी किया जा रहा है तो दिल्ली विश्वविद्यालय में ऐसा क्यों नहीं हो सकता?’

डूटा के अध्यक्ष राजीब रे कहते हैं, ‘प्रशासन को चाहिए कि वन टाइम रेगुलेशन के जरिए इन एडहॉक को स्थायी बनाया जाए. हमारी एक और प्रमुख मांग पेंशन है. जिन वरिष्ठ शिक्षकों को पेंशन मिलनी चाहिए थी, अदालत में सरकार की ओर से एसएलपी डालकर उन्हें पेंशन से महरूम रखा गया. इसके साथ ही प्रमोशन का मुद्दा भी एक अहम मांग है.’

एक अन्य शिक्षक कहते हैं कि डीयू के नियमों के तहत अगले चार महीने तक पोस्ट खाली रहती है तो उस पोस्ट के लिए इंटरव्यू कराने का प्रावधान है. इसमें एडहॉक शिक्षक का कोई कसूर नहीं है, यह पूरी तरह से डीयू की नाकामी है. डीयू में ही तीन बार एडहॉक शिक्षकों को स्थायी किया जा चुका है तो इस बार क्यों नहीं? अगर एडहॉक शिक्षकों को यूं ही निकाल देंगे तो इससे उनकी रोजी-रोटी में दिक्कत आ जाएगी.

इस पूरे घटनाक्रम पर जाकिर हुसैन कॉलेज में एडहॉक शिक्षक लक्ष्मण यादव कहते हैं, ’28 अगस्त के नोटिस, एनईपी की पॉलिसी इन सबके जरिए टीचिंग में कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम लाया जा रहा है. शिक्षा का बाजारीकरण किया जा रहा है, इसी का उदाहरण था कि सारे एडहॉक टीचर को गेस्ट टीचर करने की साजिश हुई. हमारा आंदोलन भी इन्हीं मांगों को लेकर है. एचआरडी मंत्रालय का कहना है कि हमारी एडहॉक की पोस्ट हमें वापस दे दी गई है लेकिन इस पूरी समस्या का समाधान केवल तभी होगा, जब हम एडहॉक शिक्षकों को स्थायी किया जाएगा.’

प्रशासन के खिलाफ उठ रही आवाज में डीयू के वाइस चांसलर (वीसी) को हटाए जाने की भी मांग उठ रही हैं. इसकी वजह क्या है?

राजीब रे बताते हैं, ‘डीयू के वाइस चांसलर योगेश त्यागी बहुत अयोग्य तरीके से काम कर रहे हैं. कई सालों से शिक्षकों के प्रमोशन, उनकी नियुक्तियां, उनकी पेंशन की फाइलों का ढेर लगा हुआ है लेकिन कोई फुर्ती नहीं दिखाई जा रही. डीयू में कामकाज पूरी तरह से ठप पड़ा है इसलिए हमारी मांग है कि वीसी को हटाया जाए. हमने सरकार को भी इस बाबत पत्र सौंपा है लेकिन अभी तक इस पर कोई एक्शन नहीं लिया गया.’