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भीमा-कोरेगांव हिंसा: गौतम नवलखा और आनंद तेलतुम्बड़े की अग्रिम जमानत याचिका ख़ारिज

भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में सप्रीम कोर्ट की पीठ ने नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं गौतम नवलखा और आनंद तेल्तुम्बड़े को तीन सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने को कहा है. दोनों को अपने पासपोर्ट तत्काल जमा कराने का भी निर्देश दिया गया है.

आनंद तेलतुम्बड़े और गौतम नवलखा. (फोटो साभार: फेसबुक/विकिपीडिया)

आनंद तेलतुम्बड़े और गौतम नवलखा. (फोटो साभार: फेसबुक/विकिपीडिया)

नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं गौतम नवलखा और आनंद तेलतुम्बड़े की अग्रिम जमानत याचिका सोमवार को खारिज कर दी.

नवलखा और तेलतुम्बड़े पर गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) की धाराओं के तहत आरोप लगाए गए हैं. न्यायालय ने अग्रिम जमानत की अस्वीकृति के संबंध में यूएपीए के तहत प्रावधानों का हवाला देते हुए उनकी याचिका को खारिज कर दिया. पीठ ने कहा कि वह आरोपियों के खिलाफ प्रथमदृष्टया मामले से संतुष्ट है.

जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने दोनों कार्यकर्ताओं को तीन सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है. पीठ ने इन दोनों को अपने पासपोर्ट तत्काल जमा कराने का भी निर्देश दिया है.

शीर्ष अदालत ने छह मार्च को इन दोनों को गिरफ्तारी से प्राप्त अंतरिम संरक्षण की अवधि 16 मार्च तक के लिए बढ़ा दी थी.

पुणे की सत्र अदालत से राहत नहीं मिलने पर गौतम नवलखा और आनंद तेलतुम्बड़े ने गिरफ्तारी से बचने के लिए पिछले साल नवंबर में बॉम्बे उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया था.

उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ इन दोनों नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने शीर्ष अदालत में अपील दायर की थी.

पुणे पुलिस ने भीमा कोरेगांव गांव में एक जनवरी, 2018 को हुई हिंसा की घटना के बाद गौतम नवलखा, आनंद तेलतुम्बड़े और कई अन्य कार्यकर्ताओं के खिलाफ माओवादियों से कथित संपर्क रखने के आरोप में मामला दर्ज किया था.

हालांकि इन कार्यकर्ताओं ने पुलिस के इन आरोपों से इनकार किया था.

जेल में बंद नौ अन्य नागरिक अधिकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं और वकीलों के साथ तेलतुम्बड़े पर कथित तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश रचने और पिछले साल 1 जनवरी को कोरेगांव-भीमा में पहुंचने वाले दलितों को हिंसा के लिए भड़काने का आरोप है.

मालूम हो कि एक जनवरी 2018 को वर्ष 1818 में हुई कोरेगांव-भीमा की लड़ाई को 200 साल पूरे हुए थे. इस दिन पुणे ज़िले के भीमा-कोरेगांव नाम के गांव में दलित समुदाय के लोग पेशवा की सेना पर ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना की जीत का जश्न मनाते हैं. इस दिन दलित संगठनों ने एक जुलूस निकाला था. इसी दौरान हिंसा भड़क गई, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई थी.

पुलिस ने आरोप लगाया है कि 31 दिसंबर 2017 को हुए एल्गार परिषद के सम्मेलन में भड़काऊ भाषणों और बयानों के कारण भीमा-कोरेगांव में एक जनवरी को हिंसा भड़की.

मालूम हो कि 28 अगस्त 2018 को महाराष्ट्र की पुणे पुलिस ने माओवादियों से कथित संबंधों को लेकर पांच कार्यकर्ताओं- कवि वरवरा राव, अधिवक्ता सुधा भारद्वाज, सामाजिक कार्यकर्ता अरुण फरेरा, गौतम नवलखा और वर्णन गोंसाल्विस को गिरफ़्तार किया था. महाराष्ट्र पुलिस का आरोप है कि इस सम्मेलन के कुछ समर्थकों के माओवादी से संबंध हैं.

इससे पहले महाराष्ट्र पुलिस ने जून 2018 में एल्गार परिषद के कार्यक्रम से माओवादियों के कथित संबंधों की जांच करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता सुधीर धावले, रोना विल्सन, सुरेंद्र गाडलिंग, शोमा सेन और महेश राउत को गिरफ्तार किया था.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)