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राज्य सरकारों द्वारा श्रम क़ानूनों में संशोधन को लेकर आठ दलों ने राष्ट्रपति को पत्र लिखा

पत्र के अनुसार, गुजरात, मध्य प्रदेश, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान और पंजाब ने फैक्ट्री अधिनियम में संशोधन के बिना काम की अवधि को आठ घंटे प्रतिदिन से बढ़ाकर 12 घंटे कर दिया है. इससे मजदूरों के मौलिक अधिकार को लेकर गंभीर ख़तरा पैदा हो रहा है.

फोटो: रॉयटर्स

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नई दिल्ली: देश के सात राजनीतिक दलों ने सरकार पर श्रम कानूनों को कमजोर करने का आरोप लगाते हुए शुक्रवार को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को पत्र लिखा और इस मुद्दे पर अपना विरोध दर्ज कराया.

माकपा महासचिव सीताराम येचुरी, भाकपा महासचिव डी. राजा, भाकपा (माले) महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य, ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक के महासचिव देबव्रत विश्वास, आरएसपी के महासचिव मनोज भट्टाचार्य, राजद सांसद मनोज झा और वीसीके (तमिलनाडु का दल) के अध्यक्ष थोल तिरुवमवलवन ने इस पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक नेताओं ने पत्र में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को मजदूरों के अधिकारों की रक्षा के लिए हस्तक्षेप करने का आग्रह किया. साथ ही उन्होंने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि कोरोना वायरस के बहाने श्रम कानूनों को कमजोर किया जा रहा है.

पत्र में कहा गया है कि, ‘कोरोना महामारी से लड़ने के बहाने देश के मौजूदा श्रम कानूनों में भारी बदलाव किए जा रहे हैं जो आगे चलकर लोगों की ज़िंदगी को खतरे में डाल सकते हैं. देशव्यापी लॉकडाउन लागू होने के बाद प्रवासी मजदूरों की दुर्दशा पहले से भी अमानवीय और दुखद हो गई है.’

पत्र में दलों ने कहा, ‘गुजरात, मध्य प्रदेश, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान और पंजाब ने फैक्ट्री अधिनियम में संशोधन के बिना काम की अवधि को आठ घंटे प्रतिदिन से बढ़ाकर 12 घंटे कर दिया है. जिसके बाद अन्य राज्यों द्वारा भी इस तरह के कदम उठाए जाने की संभावना है. जिससे श्रमिकों के मौलिक अधिकार को लेकर गंभीर खतरा पैदा हो रहा है.’

पत्र में ये भी कहा गया है कि श्रम कानूनों को इस तरह से कमजोर करना संविधान का उल्लंघन है. मौजूदा संकट में श्रमिकों के जीवन, प्रतिष्ठा के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने की आवश्यकता है.

इन राजनीतिक दलों ने आशंका जताई है कि दूसरे राज्य भी ऐसा कदम उठा सकते हैं. इन्होंने कहा कि कोरोना वायरस महामारी के आने से पहले भारत की अर्थव्यवस्था मंदी की तरफ बढ़ रही थी.

ऑउटलुक के मुताबिक देशभर के मजदूर संगठन राज्य सरकारों द्वारा श्रम कानूनों को कमजोर किए जाने का विरोध कर रहे हैं. संगठनों का मानना है कि अगर राज्य सरकारें इस फैसले को वापस नहीं लेती हैं, तो मजदूर 150 साल पहले वाले दौर में पहुंच जाएंगे.

कांग्रेस के श्रमिक संगठन इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस के सचिव डॉ. जी. संजीव रेड्डी ने राज्य सरकारों के फैसले को श्रमिकों के हितों के खिलाफ बताया है.

रेड्डी ने कहा, ‘यह कदम अंतरराष्ट्रीय श्रम कानूनों का भी उल्लंघन करता है. हम इस फैसले के खिलाफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास जाएंगे. अगर वहां बात नहीं सुनी जाती है, तो अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन से शिकायत करेंगे.’

उन्होंने कहा, ‘मुझे समझ में नहीं आता है कि इस संकट में सरकारें कैसे इस तरह के हास्यास्पद फैसले ले सकती हैं. नए बदलावों से हम 100 साल पीछे चले जाएंगे. यह कानून हमें गुलामी के दौर में ले जाएंगे.’

इसके अलावा नए कानून मजदूरों के लिए कितने हानिकारक हो सकते हैं, इस पर वाम दलों के संगठन द सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (सीटू) के महासचिव तपन सेन ने भी सवाल उठाया है.

उन्होंने कहा, ‘गुजरात, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश में काम करने के घंटे 8 से बढ़ाकर 12 घंटे किए जा रहे हैं. ये फैसले कॉरपोरेट हितों को देखते हुए लिए जा रहे हैं. उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सरकारों ने दूसरे श्रम कानूनों को कमजोर किया है. इसका हम पूरी सख्ती के साथ विरोध करते हैं. हम सभी लोगों से अपील करते हैं वे इन निर्दयी कानून के खिलाफ एकजुट होकर खड़े हों.’

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मजदूर संगठन भारतीय मजदूर संघ भी उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश सरकार के फैसले का विरोध कर रहा है. संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष सजी नारायण ने सरकारों के फैसले को मजदूरों के लिए शोषणकारी बताया है.

नारायण ने कहा, ‘नए प्रावधानों से श्रमिकों का शोषण बढ़ जाएगा. श्रमिकों के हितों की रक्षा करने वाले बहुत से कानूनों को राज्य सरकारों ने हटा दिया है जिसके कारण श्रमिक संघर्ष बढ़ने की आशंका है.’

उन्होंने कहा, ‘प्रमुख कानूनों को हटाने के साथ काम करने के घंटों में बढ़ोतरी की जा रही है, सारे बदलाव नियोक्ताओं के हितों को देखते हुए किए जा रहे हैं. कोविड-19 संकट में श्रमिकों के हाल से समझा जा सकता है कि उनके हितों की रक्षा नहीं हो पा रही है.’

बता दें कि लॉकडाउन के बीच आर्थिक गतिविधियों को पुनर्जीवित करने के लिए राज्य सरकारें श्रम कानूनों में संशोधन कर रही हैं. उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने उद्योगों को श्रम कानूनों से तीन साल की छूट देने के लिए अध्यादेश को मंजूरी दे दी है.

उत्तर प्रदेश के अलावा मध्य प्रदेश सरकार ने भी कुछ इसी तरह उद्योगों को श्रम कानूनों से छूट देने की योजना बनाई है.

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बीते गुरुवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर घोषणा की कि किस तरह राज्य सरकार नई विनिर्माण इकाइयों को अगले 1000 दिनों (ढाई साल से ज्यादा) के लिए कारखाना अधिनियम 1948 के कुछ प्रावधानों से छूट देगी.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)