भारत

क्या सरकार बच्चों और महिलाओं को भूखे-कमज़ोर रखकर भारत को आत्मनिर्भर बना सकती है?

लैंसेट के अध्ययन के अनुसार कोविड का मातृत्व मृत्यु और बाल मृत्यु दर पर गहरा प्रभाव पड़ेगा. इसके अनुसार भारत में छह महीनों में 3 लाख बच्चों की कुपोषण और बीमारियों से 14 हज़ार से अधिक महिलाओं की प्रसव पूर्व या इसके दौरान मृत्यु हो सकती है. हालांकि वित्तमंत्री द्वारा घोषित 20.97 लाख करोड़ रुपये के आत्मनिर्भर पैकेज में कुपोषण और मातृत्व हक़ के लिए एक रुपये का भी आवंटन नहीं किया गया है.

Jalandhar: A migrant woman prepares food for her family along a road, during the ongoing COVID-19 nationwide lockdown, in Jalandhar, Saturday, May 30, 2020. (PTI Photo) (PTI30-05-2020 000181B)

(फोटो: पीटीआई)

कोविड-19 काल में भारत के सबसे वंचित 100 करोड़ लोगों (जिन्हें सरकार सस्ते अनाज का हकदार मान चुकी है) पर गहरा संकट छाया हुआ है, वे हैं 5 साल से कम उम्र के 19 करोड़ बच्चे बच्चे और 3 करोड़ गर्भवती-धात्री महिलाएं.

तालाबंदी के 60 दिन गुज़र जाने के बाद यह साबित हो गया है कि सरकारें इनके प्रति असंवेदनशील ही हैं. इन्हें एहसास ही नहीं है कि बेरोजगार, खाद्य असुरक्षा, कुपोषण और बीमारी का बच्चों और गर्भवती-धात्री महिलाओं पर बहुत गंभीर असर पड़ता है.

द लैंसेट में 12 मई 2020 को प्रकाशित अध्ययन के अनुसार कोविड का मातृत्व मृत्यु और बाल मृत्यु पर गहरा प्रभाव पड़ेगा. जॉन हॉप्किंस ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ (अमेरिका) द्वारा किए इस अध्ययन के मुताबिक कोविड-19 के कारण जिस तरह से मातृत्व और बाल स्वास्थ्य-पोषण सेवाओं में रुकावट आई है, उससे वैश्विक स्तर पर छह महीनों में 11.57 लाख बच्चों और 56,700 मातृत्व मृत्यु होने की आशंका है.

इस अध्ययन में विश्व के 118 देशों में कोविड-19 के दौरान मातृत्व और बाल स्वास्थ्य से जुड़ी 48 सेवाओं के क्रियान्वयन की स्थिति का विश्लेषण किया गया है. अध्ययन के अनुसार भारत में छह महीनों में 3 लाख बच्चों की कुपोषण और बीमारियों के कारण 14,388 महिलाओं की मातृत्व मृत्यु हो सकती है.

13 मई 2020 से पांच दिन तक देश की वित्तमंत्री ने 20.97 लाख करोड़ रुपये का आत्मनिर्भर पैकेज जारी करती रहीं, पर उन्होंने एक रुपये का भी आवंटन कुपोषण और मातृत्व हक के लिए नहीं किया.

अध्ययन बताता है कि गंभीर स्थितियों में (गंभीरता के तीसरे स्तर पर) वैश्विक स्तर पर परिवार नियोजन की सेवाओं में 39.3%, गर्भावस्था देखरेख सेवाओं में 51.9%, बच्चे के जन्म से समय की सेवाओं में 49.4%, प्रसव पश्चात देखरेख सेवाओं में 51.9%, बच्चों के टीकाकरण में 51.9%, प्रारंभिक बाल सुरक्षा/प्रिवेंटिव सेवाओं में 42.3% और बच्चों की प्रारंभिक स्वास्थ्य निरोधक/प्रिवेंटिव सेवाओं में 49.4% की कमी आ सकती है.

इसके कारण दुनिया भर में छह महीनों में 11.57 लाख और एक साल में 23.13 लाख बच्चों की मृत्यु हो सकती है.

भारत की सेवाओं का अध्ययन करते हुए इस शोध में कहा गया है कि भारत में गर्भावस्था के दौरान आयरन-फॉलिक एसिड की गोलियों की महिलाओं तक पहुंच 38.8% से आधी होकर 18.7%, टिटनेस टीकाकरण 90% से घटकर 43.3%, नवजात शिशु के तापमान में स्थिरता बनाए रखने की व्यवस्था 78% से घटकर 39.5%, गर्भनाल की सफाई 78% से घटकर 39.5%स्वच्छ प्रसव वातावरण 64.7% से घटकर 32.8% रहना संभावित है. इससे हर महीने मौजूदा संख्या से 2,398 ज्यादा मातृत्व मृत्यु होने की आशंका है.

जन्म के बाद नवजात शिशु के गीले शरीर को तुरंत सुखाने और शरीर को सक्रिय करने के लिए उकसाव 72.3% से घटकर 36.6% रहना संभावित है. मातृत्व स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए अपनाई जाने वाली तकनीकों के उपयोग में भी बहुत कमी आई है.

समय-पूर्व एम्नियॉटिक थैली के फटने का एंटीबायोटिक उपचार 59.1% से घटकर 29.9%, इंजेक्शन या ड्रिप के द्वारा ऐंठन निरोधी दवाओं का उपयोग 70.5% से घटकर 35.5%, इंजेक्शन या ड्रिप के द्वारा एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग 59.1% से घटकर 29.9% तक आना संभावित है.

नवजात शिशुओं को सेप्सिस से बचाने एंटीबायोटिक इंजेक्शन का उपयोग 78.9% से घटकर 37.9% रह सकता है. बाल मृत्यु दर को कम करने में टीकाकरण महत्वपूर्ण है.

इस संदर्भ में बीसीजी की टीकाकरण 92% से 44.2%, पोलियो का 89% से कम होकर 42.8%, डीपीटी 89% से घटकर 42.8%और हेपेटाईटिस का 89% से गिर कर 42.8% पर आ सकता है.  विश्व के कुपोषित बच्चों की संख्या में 21 प्रतिशत बच्चे भारत के हैं, जो बढ़कर 31.5 प्रतिशत हो सकते हैं.

भारत में हर माह 49,850 बच्चों की मृत्यु हो सकती है. यानी छह महीनों में कोविड के कारण अप्रत्यक्ष रूप से भारत में लगभग 2.99 लाख बच्चों की मृत्यु होने की आशंका है.

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भारत की स्थिति

भारत में जमीनी स्थितियां अध्ययन के निष्कर्षों से ज्यादा गंभीर हैं. मार्च से भारत में एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम के तहत पूरक पोषण आहार को छोड़कर संचालित सेवाओं को निलंबित कर दिया है.

राजस्थान में 26 लाख बच्चों के लिए चना या मूंग या मोठ, गेहूं का दलिया, चावल, स्किम्ड दूध पाउडर आदि सूखे राशन का 3750 ग्राम का पैकेट 25 दिन के लिए दिया जा रहा है. जबकि गर्भवती और धात्री महिलाओं के लिए 6 किलो का मिश्रित सूखा राशन दिया जा रहा है. अति गंभीर कुपोषित बच्चों को 250 ग्राम स्किम्ड दूध पाउडर और आधा किलो चीनी अलग से दी जा रही है.

मध्य प्रदेश में भुने गेहूं-चना दाल-शकर के सत्तू या लड्डू चूरे का प्रावधान किया गया. बच्चों के लिए 200 ग्राम प्रतिदिन और गर्भवती-धात्री महिलाओं के लिए 250 ग्राम प्रतिदिन (हफ्ते में 6 दिन) का प्रावधान किया गया.

दोनों ही राज्यों ने महिला समूहों या आंगनवाड़ी मातृ-बाल विकास समिति की भूमिका को आखिरकार महत्वपूर्ण माना, केंद्रीयकृत व्यवस्था आपूर्ति में नाकाम हो गई.  टीकाकरण और ग्राम स्वास्थ्य, पोषण और स्वच्छता दिवस के आयोजन बंद हो गए हैं.

वृद्धि निगरानी का काम भी रुक गया. इससे यह पता चल पाना असंभव हो गया कि बच्चों की वृद्धि पर कोई गहरा असर तो नहीं पड़ रहा है.

वक्त की जरूरत है संपूर्ण पोषण आहार कार्यक्रम 

कोविड से जूझने के लिए प्रतिरोधक क्षमता मज़बूत होना जरूरी है, लेकिन पोषण से क्षमता मज़बूत होती है. अपेक्षा थी कि सरकारें इन बच्चों और गर्भवती-धात्री महिलाओं को महत्व देंगी, पर ऐसा हुआ नहीं.

बच्चों और महिलाओं को बचाने के लिए ‘पूरक पोषण आहार कार्यक्रम’ को ‘संपूर्ण पोषण आहार कार्यक्रम’ में बदले जाने की जरूरत थी. लेकिन सरकार ने यह महसूस ही नहीं किया कि कुपोषण का स्तर बीस साल पुराने स्तर तक पहुंच सकता है.

बेरोजगारी और भूख

सीएमआईई के मुताबिक फरवरी 2020 में जो बेरोजगारी दर 7.76 थी, अप्रैल 20 में 23.52 प्रतिशत हो गई. शहरी बेरोजगारी 8.05 से बढ़कर 24.95 प्रतिशत और ग्रामीण बेरोजगारी 7.34 से बढ़कर 22.89 प्रतिशत हो गई. मई में भी बढ़ना जारी है.

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के हवाले से दर्ज जानकारी के मुताबिक वर्ष 2019 में भारत में 49.43 करोड़ श्रमशील या कामकाजी लोग थे. इसका मतलब यह है कि मई 2020 की स्थिति में भारत में 11.62 करोड़ लोग बेरोजगार हैं. बेरोजगारी परिवार में खाद्य असुरक्षा की स्थिति लाती है. अतः समग्र पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करना जनकल्याणकारी राज्य की जिम्मेदारी है.

सरकार ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत दर्ज लोगों को तीन माह का अतिरिक्त अनाज दिए जाने और फिर निशुल्क अनाज दिए जाने की घोषणा की, लेकिन 5 किलो गेहूं और चावल से कुपोषण को बढ़ने से नहीं रोका जा सकेगा, यह बात भी नजरअंदाज की गई.

यह अध्ययन प्रमाण दे रहा है कि भारत की महिलाएं और बच्चे संकट में हैं? सरकार ने 20.97 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक पैकेज जारी किया. पैकेज के ये बिंदु बताएंगे कि वास्तव में वंचित परिवारों को प्रत्यक्ष रूप से क्या हासिल हो सकता है-

  • 80 करोड़ लोगों को 5 किलो अनाज तीन महीने तक. इसके लिए लगभग 24 हजार करोड़ रुपये खर्च करेंगे.
  • 80 करोड़ लोगों को 1 किलो दाल तीन महीने तक. इसके लिए 12,000 करोड़ रुपये खर्च करेगी.
  • 8 करोड़ प्रवासी मजदूरों को दो महीने अनाज और दाल मिलेगी. इसके लिए 3,500 करोड़ रुपये का प्रावधान है.
  • 7 करोड़ किसानों को 2,000 रुपये की किसान निधि दी गई. इसके लिए पहले से योजना में रखे हुए 17,400 करोड़ दिए.
  • 20 करोड़ महिलाओं के जनधन खाते में तीन महीने तक 500 रुपये की जमा. इसके लिए 30000 करोड़ रुपये का प्रावधान.
  • 8 करोड़ परिवारों को तीन माह तक निशुल्क गैस सिलेंडर. आज की स्थिति में भारत सरकार पर गैस सब्सिडी का कोई बोझ नहीं है. इस प्रावधान में लगभग 14,664 करोड़ रुपये खर्च करेगी.
  • मनरेगा में दर्ज 13.82 करोड़ मजदूरों के लिए कुल 1.015 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान. पहले से वर्ष 2020-21 के लिए प्रावधान था 61.5 हजार करोड़ रुपये का और आत्मनिर्भर भारत में जोड़े गए 40 हजार करोड़ रुपये. कुल आवंटन में से लगभग 40 प्रतिशत भाग सामग्री और प्रशासन का होता है. इस मान से 1.015 लाख करोड़ रुपये में से मजदूरी के लिए 61 हजार करोड़ रुपये ही उपलब्ध होंगे. कुल 300 करोड़ मानव दिवस रोजगार सृजित करेंगे, जबकि वर्ष 2019-20 में 265 करोड़ मानव दिवस रोजगार सृजित किया गया था. इस मान से एक जॉब कार्डधारी परिवार को औसतन 22 दिन का रोजगार और 4,444 रुपये की मजदूरी हासिल होगी. यदि मान लिया जाए कि इस बार सरकार 80 प्रतिशत राशि मजदूरी पर व्यय करेगी, तब भी एक परिवार को 29 दिन का काम और 5,788 रुपये रुपये की मजदूरी हासिल हो पाएगी.
  • 3 करोड़ गरीब नागरिकों, विधवा महिलाओं और दिव्यांगों के लिए 1000 रुपये की एकमुश्त सहायता यानी 3000 करोड़ रुपये की प्रत्यक्ष सहायता.
  • लोक स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए 15,000 करोड़ रुपये .

15 करोड़ परिवारों के सामने रोजगार, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा की समस्या से निपटने के लिए 20.97 लाख करोड़ रुपये की आत्मनिर्भर पैकेज में 1.60 लाख करोड़ रुपये का नया आवंटन दिखाई देता है. यानी एक परिवार को 10,666 रुपये की प्रत्यक्ष सहायता हासिल हुई है.

असंगठित क्षेत्र में कार्यरत और गृह प्रबंधन में जुटी हुई महिलाओं को मातृत्व हक नहीं मिलता है. इस वर्ष प्रधानमंत्री मातृत्व वंदना योजना के तहत 2.4 करोड़ महिलाओं के लिए केवल 2,500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था, 60 लाख महिलाओं को लाभ दिया गया और बाकी को शर्तों के माध्यम से वंचित कर दिया गया.

इन 60 दिनों में भारत में लगभग 39 लाख बच्चों का जन्म हुआ है, यानी कुल 78 लाख नागरिक जरूरतमंद रहे हैं. इस विशाल आर्थिक पैकेज में न तो 2.5 करोड़ गर्भवती-धात्री महिलाओं के लिए एक रुपये का आवंटन हुआ, न ही आंगनवाड़ी जा रहे 10 करोड़ बच्चों के लिए पोषण आहार का.

क्या सरकार बच्चों और महिलाओं को भूखे-कमज़ोर रखकर भारत को आत्मनिर्भर बना सकती है?

(लेखक सामाजिक शोधकर्ता और कार्यकर्ता हैं.)