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क्या हिरासत की अवधि ख़त्म होने से पहले रिहा होंगे जम्मू कश्मीर बार अध्यक्ष: सुप्रीम कोर्ट

जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष मियां अब्दुल क़यूम बीते अगस्त से पीएसए के तहत आगरा की एक जेल में हिरासत में हैं. उनकी हिरासत बरक़रार रखने के प्रशासन के फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए क़यूम ने कहा कि इस हिरासत का समर्थन करने के लिए सरकार के पास कोई सबूत नहीं हैं.

New Delhi: A view of Supreme Court of India in New Delhi, Thursday, Nov. 1, 2018. (PTI Photo/Ravi Choudhary) (PTI11_1_2018_000197B)

(सुप्रीम कोर्ट: पीटीआई)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को जम्मू कश्मीर प्रशासन से पूछा कि अगर जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष मियां अब्दुल कयूम 7 अगस्त तक केंद्र शासित प्रदेश का दौरान न करने और कोई बयान जारी नहीं करने पर सहमत हो जाते हैं, तो क्या वह 6 अगस्त को हिरासत की अवधि समाप्त होने से पहले रिहाई के लिए सहमत हो जाएगा.

बता दें कि कयूम को पिछले साल 5 अगस्त को जम्मू कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म किए जाने से पहले जन सुरक्षा कानून (पीएसए) के तहत हिरासत में ले लिया गया था. वे फिलहाल आगरा की एक जेल में बंद हैं.

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, जस्टिस संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने यह टिप्पणी तक की जब जम्मू कश्मीर प्रशासन की ओर से पेश होते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि कयूम की हिरासत अवधि 6 अगस्त से आगे नहीं बढ़ाई जाएगी.

5 अगस्त को अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधानों को खत्म किए जाने का एक साल पूरा होने का जिक्र करते हुए पीठ ने कहा, हम एक कामचलाऊ व्यवस्था के लिए प्रयास कर रहे हैं. तारीख नजदीक आने के कारण सरकार को कुछ आशंका हो सकती है.

पीठ ने मेहता ने पूछा, ‘अगर वह सात तारीख तक वहां (कश्मीर) नहीं जाते हैं, दिल्ली में रहने को सहमत होते हैं और कोई बयान जारी नहीं करते हैं तो क्या आप उन्हें रिहा करने के इच्छुक हैं.’

इस पर मेहता ने कहा कि आवश्यक दिशानिर्देश प्राप्त करने के बाद वे दो दिन में इसका जवाब देंगे.

कयूम ने पीएसए के तहत उनकी हिरासत को बरकरार रखने के जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट के 28 मई के आदेश को चुनौती दी थी.

अपनी याचिका में क़यूम ने तर्क दिया है कि हाईकोर्ट का आदेश कानून में अपरिहार्य है क्योंकि यह ‘पुराने, अप्रासंगिक, दूरस्थ, अस्पष्ट, अनिश्चित और दोषयुक्त’ आधार पर आधारित है.

याचिकाकर्ता की ओर से पेश होते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने कहा कि हिरासत को आगे बढ़ाने पर सहमति नहीं देकर प्रशासन कोई एहसान नहीं कर रहा था. हिरासत का समर्थन करने के लिए सरकार के पास कोई सबूत नहीं है और कयूम को वे तथ्य भी नहीं मुहैया कराए गए जिनके आधार पर उन्हें हिरासत में लिया गया.

उन्होंने अदालत से कयूम को बिना किसी देरी के जमानत देने का अनुरोध किया और कहा कि वह अपराधी नहीं हैं और न ही देशविरोधी गतिविधियों में लिप्त रहे हैं.