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उत्तर प्रदेश: क्यों परेशान हैं पूर्वांचल के गन्ना किसान

यूपी के बड़े गन्ना उत्पादक ज़िलों में से एक कुशीनगर और आसपास के क्षेत्रों में भारी बारिश से हुए जलजमाव के चलते गन्ने की फसल सूखने की ख़बरें आ रही हैं. सरकारी सर्वेक्षण भी बड़े पैमाने पर फसल के नुक़सान की तस्दीक कर रहे हैं, लेकिन सरकार ने अब तक किसानों को किसी तरह की मदद देने की बात नहीं कही है.

(फोटो: पीटीआई)

(फोटो: पीटीआई)

उत्तर प्रदेश के बड़े गन्ना उत्पादक जिलों में से एक कुशीनगर जिले के किसान बकाया गन्ना मूल्य भुगतान न होने से तो जूझ ही रहे थे, भारी वर्षा के कारण हुए जलजमाव और गन्ने में लगने वाले रोग रेड राट (काना रोगा, गन्ने का कैंसर, ललका कैंसर) ने हजारों हेक्टेयर गन्ने की फसल को सुखा दिया है.

गन्ने की फसल सूखने की खबरें कुशीनगर सहित अन्य जिलों के जलभराव वाले क्षेत्रों में भी आ रही है. बड़े पैमाने पर गन्ना फसल के सूखने के बावजूद सरकार की ओर से अभी तक किसी तरह की मदद की घोषणा नहीं हुई है, जबकि किसान संगठन लगातार इसकी मांग कर रहे हैं.

सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि राष्ट्रीय कृषि फसल बीमा योजना में गन्ना शामिल नहीं है.

पूरे प्रदेश में अब अधिक उपज देने वाली शीघ्र पकने वाली गन्ने की प्रजाति ‘को-0238’ ही बोयी जा रही है और इसी गन्ने में रेड राट प्रकोप का सर्वाधिक देखा जा रहा है. ऐसी स्थिति में आने वाले दिनों में गन्ने की खेती में बड़ा संकट आ सकता है

सरकारी सर्वेक्षण के अनुसार कुशीनगर जिले में साढ़े सात हजार हेक्टेयर गन्ने की फसल जलजमाव के कारण सूख गई है.

महराजगंज जिले में भी 200 हेक्टेयर गन्ने की फसल सूख जाने की रिपोर्ट की गई है. हालांकि किसान दोनों जिलों में व्यापक नुकसान होने की बात कर रहे हैं.

कुशीनगर जनपद प्रदेश के गन्ना उत्पादक जिलों में से एक है. यहां एक लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में गन्ने की खेती होती है, हालांकि सत्र 2020-21 में इस जिले में गन्ने का क्षेत्रफल नौ हजार हेक्टयेर घट गया है.

कुशीनगर जिले में कभी 10 चीनी मिलें हुआ करती थीं, लेकिन इस समय पांच चीनी मिलें बंद हो गई हैं और निजी क्षेत्र की पांच चीनी मिलें-रामकोला, सेवरही, खड्डा, ढाढा और कप्तानगंज ही पेराई कर रही है

गन्ना सत्र 2019-20 में कुशीनगर जिले में एक लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में गन्ना की बुआई हुई थी. पांच चीनी मिलों पर किसानों ने 320 लाख क्विंटल गन्ने की आपूर्ति की थी, जिसका गन्ना मूल्य 1,032 करोड़ रुपये होता है.

इसमें अभी भी 117.42 करोड़ रुपये बकाया है यानी कुल गन्ना मूल्य का 87 फीसदी ही भुगतान हो पाया है, जबकि नया गन्ना सत्र एक महीने बाद शुरू होने जा रहा है.

गोरखपुर-देवरिया परिक्षेत्र की 13 चीनी मिलों पर 472 करोड़ गन्ना मूल्य बकाया

गोरखपुर और देवरिया परिक्षेत्र की 13 चीनी मिलों पर किसानों का 472 करोड़ से अधिक बकाया है. दो दिन पूर्व गोरखपुर-देवरिया परिक्षेत्र की गन्ना उपायुक्त उषा पाल ने इन चीनी मिलों को भुगतान के लिए नोटिस दिया है.

गोरखपुर परिक्षेत्र के पांच चीनी मिलों पर 231.28 करोड़ रुपये बकाया है. इसमें महराजगंज की सिसवा चीनी मिल पर 14.55, बस्ती जिले की बभनान चीनी मिल पर 52.67, रूधौली चीनी मिल पर 95.57, मुंडेरवा चीनी मिल पर 34.86 और गोरखपुर जिले की पिपराइच चीनी मिल पर 35.62 करोड़ गन्ना मूल्य बकाया है.

देवरिया परिक्षेत्र की आठ चीनी मिलों पर 240.84 करोड़ रुपये बकाया है. इसमें कुशीनगर जिले की रामकोला चीनी मिल पर 40.87, कप्तानगंज चीनी मिल पर 24.38 करोड़, सेवरही चीनी मिल पर 24.38 करोड, ढाढा बुजुर्ग पर 15.65 करोड़ और खड्डा चीनी मिल पर 12.14 करोड़ रुपये गन्ना मूल्य बकाया है.

देवरिया की प्रतापपुर चीनी मिल पर 35.71 करोड़, मऊ जिले की घोसी चीनी मिल पर 12.13 करोड़ और आजमगढ़ जिले की सठियांव चीनी मिल पर 56.66 करोड़ रुपये बकाया है.

गन्ना मूल्य का समय से भुगतान न होने व पिछले तीन वर्षों से गन्ना मूल्य नहीं बढ़ने से इस बार कुशीनगर जिले में गन्ना क्षेत्रफल में काफी कमी आई है.

गन्ना क्षेत्रफल एक लाख हेक्टेयर से घटकर 91 हजार हेक्टेयर तक पहुंच गया है जबकि पिछले वर्ष यह करीब एक लाख हेक्टेयर था.

कुशीनगर जिले में गन्ना समितियों में 3.8 लाख किसान पंजीकृत हैं. सत्र 2019-20 में 2.52 लाख किसानों ने चीनी मिलों पर गन्ने की आपूर्ति की थी.

कुशीनगर जिले के पड़ोसी जिले महराजगंज में भी गन्ना रकबा में कमी आई है. इस वर्ष जिले में 17 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में गन्ना बोया गया है, जबकि पिछले वर्ष यह रकबा 18 हजार हेक्टेयर था.

60 हजार गन्ना किसानों वाले महराजगंज जिले में इस समय सिर्फ सिसवा चीनी मिल ही चल रही है, पिछले तीन वर्ष से निजी क्षेत्र की जेएचवी गड़ौरा चीनी मिल बंद है.

इस चीनी मिल पर किसानों का 24 करोड़ रुपये गन्ना मूल्य बकाया है, अब तक जिसका भुगतान सरकार नहीं करा सकी है. जिले की फरेंदा, घुघली चीनी मिलें तो वर्षों से बंद हैं.

महराजगंज की सिसवा चीनी मिल पर किसानों का 4.5 करोड़ रुपया बकाया है. महराजगंज के किसानों का गन्ना पिछले तीन वर्षों से दूसरे जिलों की चीनी मिलों को आवंटित किया जा रहा है.

एक तरफ किसान गन्ना मूल्य बकाया की समस्या से जूझ रहे हैं, तो इस वर्ष अप्रैल महीने से अगस्त महीने तक हुई अधिक बारिश ने भी गन्ने की फसल को काफी नुकसान पहुंचाया है.

जिले के लो लैंड वाले इलाकों में एक महीने से अधिक समय से जलजमाव ने हजारों हेक्टेयर गन्ने की फसल को सुखा दिया है.

कुशीनगर के जिला गन्ना अधिकारी वेद प्रकाश सिंह के अनुसार जिले में साढ़े सात हजार हेक्टेयर गन्ने की फसल जलजमाव से सूख गई है. खड्डा, तमकुही, रामकोला और हाटा क्षेत्र में जल जमाव की समस्या गंभीर रूप से देखने को मिली है.

सिंह का कहना है, ‘कुशीनगर जिले में गन्ने की बुआई अप्रैल महीने में होती है. इस बार अप्रैल महीने से ही लगातार बारिश हुई है. जुलाई और अगस्त में तो काफी बारिश हुई, इस कारण जिले के निचले इलाकों में जलजमाव हो गया.’

वे आगे कहते हैं, ‘प्राकृतिक नालों पर कब्जे और उनके खत्म हो जाने से पानी का निकास नहीं हो पाया जिस कारण पानी का जमाव एक महीने से अधिक दिन तक रहा इस कारण गन्ने की फसल सूख गई.’

जिला गन्ना अधिकारी का कहना है कि विभाग की ओर से निचले इलाकोें में पानी निकालने के लिए किसानों को सुझाव व तकनीकी सहायता उपलब्ध कराई गई है, इससे कुछ जगहों पर गन्ने को पुनर्जीवन मिल जाएगा लेकिन जो नुकसान हो गया है, उसकी भरपाई नहीं हो सकेगी.

जल जमाव से गन्ने की फसल तो सूखी ही, तरयासुजान क्षेत्र में नारायणी नदी की कटान से 250 हेक्टेयर गन्ने की फसल नदी में समा गई.

जलजमाव से गन्ना फसल को नुकसान कुशीनगर जनपद के पड़ोसी जिले महराजगंज में भी हुआ है.

कप्तानगंज तहसील में सूखे गन्ने लेकर प्रदर्शन करते भाकियू के लोग.

कप्तानगंज तहसील में सूखे गन्ने लेकर प्रदर्शन करते भाकियू के लोग.

महराजगंज के जिला गन्ना अधिकारी जगदीश चंद्र यादव के अनुसार जिले में 200 हेक्टेयर से अधिक गन्ने की फसल जलजमाव से सूख गई है.

सरकारी सर्वे से किसान संतुष्ट नहीं हैं. किसानों का कहना है कि नुकसान हुए गन्ने का सर्वे सही नहीं हैं और गन्ने की फसल को व्यापक नुकसान हुआ है

भारतीय किसान यूनियन (अम्बावता) के कुशीनगर के जिला अध्यक्ष रामचंद्र सिंह का कहना है कि कुशीनगर जिले में 60 फीसदी गन्ने की फसल सूख गई है.

12 अगस्त को उन्होंने कप्तानगंज तहसील में जब प्रदर्शन कर नायब तहसीलदार को ज्ञापन दिया, तब उनके साथ किसान अपने हाथों में सूखा गन्ना लिए हुए थे.

सिंह का कहना है कि सरकार को चाहिए कि जल जमाव से हुए वास्तविक क्षति का मूल्यांकन करे और किसानों को मुआवजा दे. वे यह भी कहते हैं कि बरसाती नालों की साफ-सफाई न होने से खेतों में जलजमाव हुआ है

उत्तर प्रदेश सरकार पिछले तीन वर्षों से अगैती गन्ने का मूल्य 325 रुपये क्विंटल दे रही है. वर्ष 2017 से प्रदेश सरकार ने गन्ना मूल्य नहीं बढ़ाया है जबकि इस अवधि में गन्ने की लागत बढ़ती गई है.

किसानों के अनुसार एक क्विंटल गन्ने की पैदावार में इस समय 250 रुपये की लागत आ रही है, इस कारण गन्ने की फसल से होने वाला लाभ निरंतर कम होता जा रहा है.

गन्ने में बढ़ रहा है ‘ललका कैंसर’ रोग

उत्तर प्रदेश गन्ना किसान प्रशिक्षण संस्थान गोरखपुर के सहायक निदेशक ओम प्रकाश गुप्ता का कहना है कि जल भराव वाले क्षेत्र में गन्ने की फसल का सूखने का प्रमुख कारण ‘को-0238’ प्रजाति का गन्ना है.

शीघ्र पकने वाली और अधिक चीनी देने वाली इस प्रजाति के गन्ने की बुआई 98 फीसदी किसान कर रहे हैं और जलभराव वाले क्षेत्रों में भी इसकी बुआई हो रही है.

कुछ वर्षों से जलभराव वाले क्षेत्रों में इस प्रजाति के गन्ने में रेड राट, जिसे किसान काना रोग या गन्ने का कैंसर भी कहते हैं, बीमारी देखने को मिली थी, लेकिन इस वर्ष यह बीमारी व्यापक रूप में नजर आई है.

चिंता की बात यह है कि इस रोग से बचाव का अभी तक कोई उपाय वैज्ञानिक ढूंढ नहीं पाए हैं.

गुप्ता का कहना है कि जलभराव वाले क्षेत्रों के लिए यूपी-9530, कोसे-96436, कोसा-10248 स्वीकृत हैं, किसानों को इसी प्रजाति के गन्ने की बुआई करनी चाहिए।

उन्होंने आशंका प्रकट की कि यदि किसान गन्ना प्रजातियों में बदलाव नहीं करेंगे तो ‘को-0238’ में लगने वाला रेड राट रोग महामारी का रूप ले सकता है और यह गन्ने की खेती के बर्बाद कर देगा।

महराजगंज के युवा गन्ना किसान आनंद राय भी उनकी इस बात की पुष्टि करते हैं. उनका कहना है कि पिछले एक दशक से अधिकतर किसान गन्ने की यही प्रजाति बो रहे हैं, गन्ना विभाग ने भी इस प्रजाति की बुआई के लिए गन्ना किसानों को प्रोत्साहित किया है.

राय ने बताया कि इस प्रजाति का गन्ना मोटा और लंबा होता है. गन्ने की इस प्रजाति ने प्रति एकड़ उपज तो बढ़ाई है लेकिन पिछले दो-तीन वर्षों से इसमें सूखा रोग का प्रकोप अधिक देखा जा रहा है.

उन्होंने कहा, ‘पहले एक एकड़ में औसतन 250 से 300 क्विंटल गन्ने की पैदावार होती थी, लेकिन गन्ने की इस प्रजाति ने पैदावार को 400 से 500 क्विंटल तक बढ़ाया है. इसकी रिकवरी रेट भी बहुत अच्छी है.’

राय ने आगे बताया, ‘गन्ने की इस प्रजाति ने रिकवरी रेट को आठ फीसदी से बढ़ाकर दस फीसदी तक कर दिया है. इससे किसानों के साथ-साथ चीनी मिलों को फायदा हुआ लेकिन पिछले तीन वर्षों से इसमें रेड राट और पोक्का बोइंग रोग का काफी प्रकोप देखा जा रहा है.’

वे सवाल उठाते हैं कि इस वर्ष अधिक बारिश हुई है लेकिन पिछले दो वर्ष तो ज्यादा बारिश नहीं हुई, फिर भी गन्ने की फसल में सूखा रोग क्यों लगा?

राय बताते हैं कि जल जमाव वाले क्षेत्रों में गन्ना अधिक सूखा है लेकिन जहां जल जमाव नहीं है, वहां भी गन्ने की फसल सूख रही है.

वह कहते हैं कि पिछले दो तीन वर्षों से इस प्रजाति के गन्ने की फसल को रेड राट से बचाने के लिए काफी दवाइयां देनी पड़ रही हैं.

इस रोग से प्रभावित गन्ना बीच में लाल रंग का होता जाता है और धीरे-धीरे सूख जाता है. इसी तरह गन्ने में पोक्का बोइंग रोग भी अधिक देखने को मिल रहा है. इस रोग में गन्ने का पत्ता सिकुड़ते हुए उकठ जाता है.

राय के अनुसार पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी गन्ने की फसल में इन रोगों का प्रसार होने की बात सामने आ रही है. वे कहते हैं कि महराजगंज के सिसवा क्षेत्र में उनके गन्ने की फसल सूखा रोग से दस फीसदी प्रभावित हुई है, इससे उन्हें इस बार डेढ़ से दो लाख रुपये का नुकसान होगा.

(लेखक गोरखपुर न्यूज़लाइन वेबसाइट के संपादक हैं.)