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उत्तर प्रदेश: क्या पत्रकारिता के छात्र को मेरठ पुलिस गोकशी के मामले में फंसा रही है?

उत्तर प्रदेश में मेरठ ज़िले के एक गांव में खेत से गोवंश के अवशेष बरामद होने के बाद पुलिस ने पत्रकारिता के छात्र ज़ाकिर अली त्यागी को गिरफ़्तार किया था. ज़ाकिर का कहना है कि उन्हें फ़र्ज़ी तरीके से फ़ंसाया गया है. इस संबंध में मानवाधिकार आयोग ने मेरठ पुलिस का नोटिस जारी कर जवाब मांगा है.

ज़ाकिर अली त्यागी. (फोटो साभार: फेसबुक)

ज़ाकिर अली त्यागी. (फोटो साभार: फेसबुक)

नई दिल्ली: बीते सात सालों से दिल्ली में रह रहे पत्रकारिता के छात्र जाकिर अली त्यागी मेरठ में अपने गांव गए थे. बीते 25 अगस्त की दोपहर उन्हें गोहत्या निवारण अधिनियम के तहत गिरफ्तार कर लिया गया था. गोकशी के आरोप में 16 दिनों तक हिरासत में रखने के बाद छह सितंबर को रिहा किया गया.

जाकिर का आरोप है कि भाजपा के कार्यकर्ताओं के थाने में प्रदर्शन के बाद दबाव की वजह से पुलिस द्वारा झूठे आरोप में गिरफ्तार किया गया.

जाकिर पुलिस के इन आरोपों पर सवाल उठाते हुए द वायर से बातचीत में कहते हैं, ‘अगर पुलिस किसी शख्स को किसी भी जुर्म में गिरफ्तार करती है तो उसे आरोपों के बारे में बताया जाता, लेकिन मेरे मामले में ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ. 25 अगस्त की दोपहर मेरठ पुलिस सीधे मेरे घर पहुंची और मुझे गिरफ्तार कर अपने साथ ले गई.’

वह कहते हैं, ‘पुलिस ने सिर्फ मेरा नाम पूछा और मुझे गिरफ्तार कर लिया. मैं और मेरा परिवार पूछता रहा कि आखिर किन आरोपों में मुझे गिरफ्तार किया जा रहा है लेकिन पुलिस ने कुछ भी नहीं बताया.’

जाकिर को मेरठ के परीक्षितगढ़ में बनी एक अस्थायी जेल में बंद किया गया. उनका कहना है कि जेल में उन्हें पता चला कि उन्हें गोकशी के आरोप में गिरफ्तार किया गया है.

इस मामले में दर्ज एफआईआर के मुताबिक, मेरठ के परीक्षितगढ़ थाने के बड़ा गांव में शिकायतकर्ता मुनिश्वर के खेत से गोवंश के अवशेष बरामद किए गए थे, जिसके बाद अज्ञात में एफआईआर दर्ज की गई. इसके बाद संदेह के आधार पर गिरफ्तारियां की गईं.

जाकिर का कहना है कि जब अज्ञात में एफआईआर दर्ज की गई थी तो किस आधार पर पुलिस ने गिरफ्तारियां की. पुलिस की गिरफ्तारी का आधार क्या रहा?

इस मामले में मेरठ के परीक्षितगढ़ थाने के एसएचओ मिथुन दीक्षित ने द वायर को बताया, ‘जाकिर अली को दरअसल मुखबिर की सूचना के आधार पर गोकशी के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. हमारे मुखबिर ने सूचना दी थी कि इस मामले से जाकिर अली भी जुड़े हुए हैं और हमने उनके घर से एक थैले में पशु काटने के औजार भी बरामद किए थे.’

घर से मिले औजारों के आरोप पर जाकिर कहते हैं, ‘मेरे घर से कोई औजार बरामद नहीं हुआ है. दरअसल पुलिस ने जेल भेजने से पहले मुझसे थाने में पहले से रखे एक थैले पर साइन कराए थे. इस थैले में चाकू, छुरियां और कुल्हाड़ी वगैरह रखे हुए थे यानी मुझे फंसाने के लिए पुलिस ने पहले से ही औजारों की रूपरेखा तैयार की थी.

जाकिर के आरोपों पर एसएचओ मिथुन दीक्षित बताते हैं, ‘जिस दिन जाकिर को गिरफ्तार किया गया, उसी दिन तलाशी में उसके घर से थैले से औजार बरामद किए गए थे, जिसे हमने अदालत में पेश भी किया था. अब जाकिर और उसका परिवार क्या कह रहा है, इससे हमें कोई लेना-देना नहीं है. पुलिस ने बस अपना काम किया है.’

वहीं, जाकिर का कहना है कि उन्हें अपने गांव का पूरा समर्थन है और यहां तक कि इस मामले में शिकायतकर्ता ने भी पुलिस थाने जाकर पुलिस से उन्हें रिहा करने की गुहार लगाई थी.

वह कहते हैं, ‘मामले में शिकायतकर्ता मुनिश्वर को जब पता चला कि मुझे गोकशी के आरोप में गिरफ्तार किया गया है तो वह अगले दिन ही गांव के प्रधान, पूर्व प्रधान सहित अन्य वरिष्ठ लोगों के साथ पुलिस थाने पहुंचे थे. उन्होंने मुझे बेकसूर बताते हुए पुलिस से मुझे रिहा करने की मांग की थी लेकिन पुलिस ने उनकी बात नहीं सुनी और चालान काटकर मुझे जेल दिया गया.’

शिकायतकर्ता मुनिश्वर ने द वायर को बताते हैं, ‘हमें 23 अगस्त को खेत में गोवंश के अवशेष मिले थे, जिसकी सूचना हमने पुलिस को दी थी. हमने किसी भी शख्स को वहां नहीं देखा और न ही किसी का नाम पुलिस को दिया.’

वे कहते हैं, ‘पुलिस ने मुखबिर की सूचना पर जाकिर को गिरफ्तार किया था, जब हमें पता चला तो हम गांव के प्रधान और अन्य लोगों के साथ मिलकर परीक्षितगढ़ थाने भी गए थे और जाकिर को छोड़ने की गुहार भी लगाई थी लेकिन पुलिस ने हमें वहां से भगा दिया. जाकिर को मामले में फंसाया गया है और इस मामले में राजनीति हुई है.’

गांव के प्रधान तालिब खान भी कहते हैं, ‘26 अगस्त को ही हम सब थाने पहुंच गए थे और पुलिस से कहा था कि उन्होंने निर्दोषों को पकड़ लिया है. लेकिन पुलिस थोड़े ही किसी की सुनती है, उसे जो करना होता है, करती है.’

जाकिर के खिलाफ लगाए गए इस कथित फर्जी मामले को लेकर उनका पूरा परिवार परेशान और डरा हुआ है. यही वजह है कि उनके माता-पिता कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है.

हालांकि उनके चचेरे भाई फरमान अली बताते हैं, ‘अचानक से ही सब कुछ हो गया. 25 अगस्त को 10-15 पुलिसकर्मी हमारे घर आए और जाकिर के बारे में पूछने लगे. जब जाकिर ने अपना परिचय दिया तो उन्हें उठाकर ले गए. इनमें से ज्यादातर पुलिसकर्मी सादे कपड़ों में थे.’

वे कहते हैं, ‘हमें कुछ भी नहीं बताया कि जाकिर को क्यों लेकर जा रहे हैं. हमें अगले दिन पता चला कि गोकशी का मामला है और पुलिस ने साथ में यह भी आरोप लगा दिया था कि घर से पशु काटने के औजार बरामद किए हैं, जबकि ऐसा कुछ भी नहीं था. जाकिर को फर्जी मामले में फंसा रखा है. जाकिर के बड़े भाई पर भी इसी तरह के झूठे मामले दर्ज किए थे.’

बहरहाल राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने जाकिर अली त्यागी की कथित फर्जी गिरफ्तारी को लेकर मेरठ एसएसपी को नोटिस जारी कर मामले में छह हफ्ते के भीतर रिपोर्ट पेश करने को कहा है.

बता दें कि यह पहली बार नहीं है, जब जाकिर को उत्तर प्रदेश पुलिस ने गिरफ्तार किया है. उन्हें इससे पहले 2017 में योगी आदित्यनाथ के खिलाफ सोशल मीडिया पोस्ट करने को लेकर राजद्रोह के तहत गिरफ्तार किया गया था. तब वह 42 दिनों तक जेल में रहे थे.