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स्वच्छ वातावरण नागरिकों का मूल अधिकार, सरकारें धन न होने का बहाना नहीं बना सकतीं: एनजीटी

एनजीटी ने कोटद्वार में खोह नदी के किनारे अवैध रूप से बनाए गए कचरा स्थल को लेकर उत्तराखंड सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि वैधानिक नियमों के उल्लंघन के लिए राज्य के शहरी विकास सचिव सहित इसके वरिष्ठ अधिकारियों के ख़िलाफ़ कठोर कार्रवाई का मामला बनता है.

(फोटो: पीटीआई)

(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: स्वच्छ वातावरण नागरिकों का मूल अधिकार है और इसे सुनिश्चित करने के लिए धन नहीं होने का बहाना नहीं बनाया जा सकता है. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने कोटद्वार में खोह नदी के किनारे अवैध रूप से बनाए गए कचरा स्थल को लेकर उत्तराखंड सरकार की आलोचना करते हुए यह टिप्पणी की.

एनजीटी अध्यक्ष जस्टिस आदर्श कुमार गोयल की अध्यक्षता वाली पीठ ने राज्य सरकार की लगातार विफलता को देखते हुए यह टिप्पणी की.

पीठ ने कहा कि वैधानिक नियमों के उल्लंघन के लिए राज्य के शहरी विकास सचिव सहित इसके वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई का मामला बनता है. साथ ही पर्यावरण की लगातार क्षति के लिए मुआवजे के भुगतान की भी जरूरत है, जिसे पालन नहीं करने वाले अधिकारियों से वसूला जाए.

अधिकरण ने कहा कि ठोस कचरा प्रबंधन नियमों के तहत तय समय सीमा के संबंध में पर्याप्त प्रगति नहीं हुई है और पर्यावरण को लगातार नुकसान हो रहा है, जो अपराध है.

पीठ ने कहा, ‘स्वच्छ वातावरण नागरिकों का मूल अधिकार है, धन नहीं होने का बहाना नहीं बनाया जा सकता. बहरहाल हम उत्तराखंड के मुख्य सचिव को अंतिम अवसर देते हैं कि इसे दुरूस्त करने का काम करवाया जाए और वह अपना हलफनामा एक महीने के अंदर ई-मेल से दाखिल करें.’

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक पीठ ने कहा कि पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य को होने वाली क्षति न केवल कचरे को साफ करने में देरी के कारण हो रही है, बल्कि नियमों के अन्य प्रावधानों का पालन नहीं करने के कारण भी हो रही है.

एनजीटी की पीठ उत्तराखंड निवासी अरविंद बनियाल द्वारा रतनपुर, काशीरामपुर, गादीघाट में खोह नदी के किनारे और कोटद्वार में स्पोर्ट्स स्टेडियम के पास (जहां कचरा जलाया जा रहा है) अवैध रूप से कचरे के निपटान के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिससे नदी का पानी प्रदूषित हो रहा है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)