भारत

गृह मंत्रालय का एफसीआरए संशोधन के दस्तावेज़ सार्वजनिक करने से इनकार, कहा- राष्ट्रहित में नहीं

आरटीआई कार्यकर्ता वेंकटेश नायक ने दो आवेदन दायर कर इस विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2020 से जुड़े कैबिनेट नोट, पत्राचार और फाइल नोटिंग्स की प्रति मांगी थी. आरोप है कि इस संशोधन क़ानून के चलते कई एनजीओ के काम में बाधा आ रही है.

(फोटो: रॉयटर्स)

(फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: मोदी सरकार ने विवादित एफसीआरए यानी विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2020 से संबंधित दस्तावेजों को सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया है. गृह मंत्रालय ने कहा है कि ऐसा करना ‘राष्ट्र हित’ में नहीं होगा.

आरटीआई कार्यकर्ता वेंकटेश नायक ने इस संबंध में दो सूचना का अधिकार (आरटीआई) आवेदन दायर किया था, जिसमें उन्होंने इस संशोधन विधेयक से जुड़े कैबिनेट नोट, पत्राचार और फाइल नोटिंग्स की प्रति मांगी थी, लेकिन जन सूचना अधिकारी और प्रथम अपीलीय अधिकारी ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए इन दस्तावेजों को देने से इनकार कर दिया.

गृह मंत्रालय ने ऐसा करते हुए आरटीआई एक्ट की धारा 8 (1)(ए) और 8 (1)(ई) का सहारा लिया और कहा कि ‘मांगी गई जानकारी कई स्टेकहोल्डर्स के विश्वास में प्राप्त की गई है और इसका खुलासा करना जनहित में नहीं होगी.’

वहीं इलेक्ट्रॉनिक फॉर्म में रखे गए फाइल नोटिंग्स और पत्राचार की प्रति मांगने पर गृह मंत्रालय ने कहा कि यह ‘राष्ट्रहित’ में नहीं है.

उन्होंने कहा, ‘चूंकि अधिनियम के नियम राष्ट्रीय हित (सुरक्षा रणनीति या आर्थिक आदि) की रक्षा करने का इरादा रखते हैं, इसलिए मांगी गई जानकारी आरटीआई अधिनियम की धारा 8 (1) (ए) के तत्वों पर प्रभाव डाल सकती है. इसलिए इसका खुलासा नहीं किया जा सकता है.’

जब इस तरह के जवाबों के खिलाफ वेंकटेश नायक ने अपील दायर की, तो अपीलीय अधिकारी ने इसे सही करार देते हुए अपने फैसले में कहा, ‘इस मामले को मांगी गई जानकारी को सार्वजनिक करने में कोई जनहित नहीं है. यह अन्य देशों के साथ संबंध बिगाड़ सकता है और देश की रणनीतिक एवं आर्थिक नीतियों पर भी चोट कर सकता है.’

आरटीआई कार्यकर्ता ने इस पर हैरानी चताते हुए कहा कि उन्होंने दो अलग-अलग आरटीआई के लिए दो प्रथम अपील दायर की थी, लेकिन अपीलीय अधिकारी ने इन दोनों मामले को एक में मिलाकर फैसला दिया है.

ये आरटीआई पिछले साल अक्टूबर के अंत और नवंबर 2020 के शुरूआत में दायर की गई थीं, लेकिन इसे लेकर आदेश पिछले महीने आया है.

वेंकटेश नायक ने गृह मंत्रालय पर सवाल उठाते हुए कहा, ‘यदि फाइलें सार्वजनिक करने में कोई जनहित नहीं है, तो एफसीआरए में संशोधन कर नए नियम क्यों बनाए गए? सरकार को लगता है कि वो जो सोचती है वही जनहित है, जैसे कि उन्होंने नियम और अधिक कड़े कर दिए ताकि ज्यादातर एनजीओ विदेशों से चंदा न प्राप्त कर सकें.’

नायक ने कहा है कि वे केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) में अपील दायर कर इस फैसले को चुनौती देंगे.

उन्होंने कहा कि एक तरफ नीति आयोग हजारों एनजीओ के साथ मीटिंग करके महामारी से लड़ने के लिए मदद मांग रहा है, वहीं दूसरी तरफ उनके लिए चंदा प्राप्त करने के नियमों को इतना कठोर बनाया जा रहा है.

मालूम हो कि एफसीआरए कानून में संशोधन के खिलाफ कई एनजीओ ने दिल्ली हाईकोर्ट और गुवाहाटी हाईकोर्ट में याचिका दायर किया है.

इस विधेयक में पांच महत्वपूर्ण प्रावधान हैं:

  • यह व्यक्तियों, संघों और कंपनियों द्वारा विदेशी फंडिंग की स्वीकृति और उपयोग को नियंत्रित करता है.
  • यह विदेशी फंडिंग को किसी अन्य व्यक्ति को ट्रांसफर करने से रोकता है.
  • यह प्रशासनिक व्यय के लिए उपयोग करने योग्य विदेशी योगदान की सीमा को 50 प्रतिशत से घटाकर 20 प्रतिशत कर देता है.
  • यह वर्तमान में स्वीकृत 180 दिनों से अलग 180 दिनों की अतिरिक्त अवधि के लिए एफसीआरए प्रमाण-पत्र रद्द करने का अधिकार देता है.
  • हर छह महीने में लाइसेंस का नवीनीकरण होगा, बशर्ते आवेदक फर्जी न हो, सांप्रदायिक तनाव पैदा करने का दोषी न हो और फंड की हेरा-फेरी का दोषी न हो.

कई गैर सरकारी संगठनों और कार्यकर्ताओं का मानना है कि नए एफसीआरए संशोधनों के कारण उनके काम में बाधा आएगी और कई लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है. इस विधेयक के प्रावधानों से छोटे एनजीओ के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो जाएगा.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)