भारत

स्वपन दासगुप्ता राज्यसभा में दोबारा मनोनीत हुए, जानकारों ने कहा- असंवैधानिक

पूर्व पत्रकार स्वपन दासगुप्ता पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर तारकेश्वर सीट से खड़े हुए थे और हार गए. अब राज्यसभा सीट से इस्तीफ़ा देने के बावजूद वे दोबारा मनोनीत होकर सदन में अपना बाकी कार्यकाल पूरा करेंगे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ स्वपन दासगुप्ता. (फोटो साभार: फेसबुक/Swapan Dasgupta)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ स्वपन दासगुप्ता. (फोटो साभार: फेसबुक/Swapan Dasgupta)

नई दिल्ली: सरकार ने पूर्व पत्रकार स्वप्न दासगुप्ता को राज्यसभा में मनोनीत किया है. दासगुप्ता ने कुछ समय पूर्व उच्च सदन के मनोनीत सदस्य के रूप में इस्तीफा देकर भाजपा के टिकट पर पश्चिम बंगाल का चुनाव लड़ा था जिसमें वह हार गए थे.

मार्च महीने में राज्यसभा में निर्दलीय सांसद के पद पर रहते हुए उनके भाजपा के टिकट पर बंगाल का विधानसभा चुनाव लड़ने पर हुए विवाद के बाद उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया था.

दासगुप्ता ने तारकेश्वर सीट से चुनाव लड़ा था और हार गए थे.

गृह मंत्रालय की अधिसूचना में कहा गया है, ‘भारत के संविधान के अनुच्छेद 80 के उपबंध (1) के भाग (ए) तथा इसी अनुच्छेद के उपबंध (3) के तहत प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करते हुए राष्ट्रपति श्री स्वप्न दासपगुप्ता को उनके इस्तीफे से खाली हुई सीट को भरने के लिए राज्यसभा के लिए पुन: मनोनीत करते हुए प्रसन्न हैं. उनका यह मनोनयन 24 अप्रैल, 2022 को राज्यसभा में पूरा होने वाले उनके कार्यकाल की बाकी अवधि के लिए है.’

दासगुप्ता के दोबारा मनोनयन के बाद सोशल मीडिया पर यह बहस शुरू हो गई है कि क्या पहले भी कभी ऐसा हुआ था. इस बारे में लोकसभा के पूर्व सेक्रेटरी जनरल पीडीटी आचार्य ने द वायर  को बताया कि अनुच्छेद 80 के तहत ऐसा कोई क्लॉज़ नहीं है जो इस तरह के दोबारा मनोनयन की अनुमति की अनुमति देता हो.

आचार्य ने कहा, ‘मुझे याद नहीं आता कि कभी किसी व्यक्ति को उसके इस्तीफ़ा देने के बाद दोबारा मनोनीत किया गया हो. अनुच्छेद 80 के उपबंध (1) के तहत नॉमिनेशन यानी नामित करने की बात कही गई है, लेकिन री-नॉमिनेशन का कोई जिक्र नहीं है. केवल राष्ट्रपति ही राज्यसभा के लिए सदस्यों को नामित कर सकते हैं. अधिसूचना में यह नहीं कहा जा सकता कि राष्ट्रपति दोबारा मनोनीत कर रहे हैं.’

उन्होंने  ‘,दूसरी बात यह कि जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 154 (3) कहती है कि एक आकस्मिक रिक्ति को भरने के लिए चुना गया सदस्य अपने पूर्ववर्ती के शेष कार्यकाल को पूरा करेगा. गौर कीजिये ‘चुना हुआ,’ माने जो चुनाव के जरिये चुना गया हो. यह नामित किए जाने वाले सदस्यों पर लागू नहीं होता. तो इसका अर्थ हुआ कि किसी आकस्मिक रिक्ति को भरने वाली प्रक्रिया नामित करने के लिए नहीं है. ऐसे में राष्ट्रपति दासगुप्ता को फिर से मनोनीत करने की अधिसूचना दोषपूर्ण लगती है.’

आचार्य का कहना है कि नामित किए जाने वाले सदस्यों को चुनकर आने वाले सदस्यों के समकक्ष नहीं रखा जा सकता.

उन्होंने कहा, ‘राष्ट्रपति राज्यसभा के लिए प्रतिष्ठित व्यक्तियों को मनोनीत करते हैं. जब कोई ऐसा व्यक्ति इस्तीफा देता है तो वह सदन की सेवा करने का इरादा न रखने की बात बता देता है. ऐसे में वे चुनकर आने वाले सदस्यों से अलग होते हैं. जब कोई नामित सदस्य इस्तीफ़ा देता है, तब राष्ट्रपति किसी और प्रतिष्ठित व्यक्ति को नामित करते हैं, लेकिन पूर्ववर्ती के बचे कार्यकाल को पूरा  नहीं बल्कि छह साल के पूरे कार्यकाल के लिए. तो यह संवैधानिक तौर पर गलत है कि सीट रिज़र्व राखी जाए और उसी व्यक्ति को दोबारा मनोनीत किया जाए जो पहले ही सदन को अपनी सेवाएं और ज्ञान न देने के बारे में अपने इस्तीफे के माध्यम से बता चुका है. इस तरह के कदम के साथ परेशानी यह है कि संविधान की मूल भावना को पूरी तरह से दफना दिया गया है.’

दासगुप्ता को अप्रैल 2016 में राज्यसभा के लिए नामित किया गया था और उनका मूल कार्यकाल 2022 में पूरा होना था.

कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने भी दासगुप्ता के दोबारा मनोनीत होने पर सवाल उठाया और कहा कि राज्यसभा के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है.

मशहूर वकील महेश जेठमलानी को भी केंद्र सरकार ने राज्यसभा के लिए मनोनीत किया है. एक अन्य अधिसूचना में गृह मंत्रालय ने कहा कि जेठमलानी को राज्यसभा में उस सीट के लिए मनोनीत किया गया है जो रघुनाथ महापात्र के निधन से खाली हुई है. उनका भी कार्यकाल महापात्र के 13 जुलाई, 2024 को पूरा होने वाले कार्यकाल की बाकी अवधि के लिए है.

उल्लेखनीय राष्ट्रपति केंद्र के परामर्श पर राज्यसभा के लिए 12 सदस्यों को मनोनीत करते हैं. उच्च सदन में मनोनीत किए जाने वाले लोग साहित्य, विज्ञान, खेलकूद, कला एवं समाज सेवा जैसे क्षेत्रों की बड़ी हस्तियां होते हैं.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)