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तेलंगाना: पुलिस हिरासत में दलित महिला की मौत के मामले में हाईकोर्ट का न्यायिक जांच का आदेश

मामला यादाद्री-भुवनगिरी ज़िले के अड्डागुडुर थाने का है, जहां बीते 18 जून को बावर्ची के रूप में काम करने वाली 40 वर्षीय मरियम्मा को चोरी के आरोप में गिरफ़्तार किया गया. बताया गया कि कथित पुलिस प्रताड़ना के चलते थाने के लॉकअप में महिला की मौत हो गई. मामले में तीन पुलिसकर्मियों को निलंबित किया गया है.

तेलंगाना हाईकोर्ट. (फोटो: पीटीआई)

तेलंगाना हाईकोर्ट. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (एनसीएससी) ने पुलिस हिरासत में कथित यातना के कारण एक दलित महिला की मौत पर संज्ञान लेते हुए तेलंगाना के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को नोटिस भेजकर मामले में शुरू की गई कार्रवाई के बारे में जानकारी देने को कहा है.

आयोग ने तेलंगाना के भुवनगिरी जिले के उपायुक्त और पुलिस अधीक्षक को भी एक सप्ताह के अंदर अपनी कार्रवाई रिपोर्ट देने को कहा है.

आयोग ने कहा कि उसे मिली जानकारी के अनुसार घर के मालिक द्वारा चोरी की शिकायत के बाद बावर्ची के रूप में काम करने वाली महिला और उसके बेटे को गिरफ्तार किया गया था और कथित पुलिस प्रताड़ना के कारण अड्डागुडुर थाने के लॉकअप में महिला की मौत हो गई.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, यादाद्री-भुवनगिरी जिले में एक पादरी के घर में बावर्ची का काम करने वाली मरियम्मा को 18 जून को उसके दो पुरुष रिश्तेदारों के साथ उसके नियोक्ता के यहां से दो लाख रुपये की कथित चोरी के आरोप में हिरासत में लिया गया था.

पुलिस का कहना है कि वह अचानक जमीन पर गिरकर बेहोश हो गईं. उसे पहले स्थानीय अस्पताल ले जाया गया उसके बाद फिर सरकारी अस्पताल ले जाया गया, जहां उनकी मौत हो गई.

पुलिस का कहना है कि रिश्तेदारों ने मरियम्मा के साथ चोरी को अंजाम देने की बात कबूल कर ली है और उनके पास से 90,000 रुपये बरामद किए गए हैं.

बयान के अनुसार, आयोग ने विभिन्न रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा कि बार-बार अनुरोध के बावजूद महिला को उसकी बेटी की मौजूदगी में पुलिस ने कथित तौर पर पीटा.

आयोग के अध्यक्ष विजय सांपला के आदेश पर नोटिस भेजा गया है. सांपला ने अधिकारियों को आगाह किया है कि यदि निर्धारित समय के भीतर कार्रवाई रिपोर्ट नहीं मिलती है, तो आयोग संविधान के अनुच्छेद 338 के तहत प्रदत्त दीवानी अदालतों की अपनी शक्तियों का उपयोग करेगा.

सांपला ने कहा, ‘अध्यक्ष के रूप में मैं अनुसूचित जातियों के अधिकारों को सुरक्षित रखने और यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य हूं कि उन्हें हर तरह से न्याय मिले.’

द न्यूज़ मिनट के मुताबिक, खम्मम जिले के चिंताकानी की रहने वाली चालीस वर्षीय मरियम्मा अनुसूचित जाति के रूप में वर्गीकृत माला जाति से हैं. परिवार का आरोप है कि चोरी के आरोप में पुलिस मरियम्मा के अलावा उसके बेटों और परिवार के सदस्यों को भी कथित रूप से प्रताड़ित किया.

तेलंगाना राज्य मानवाधिकार आयोग (एसएचआरसी) ने 23 जून को कथित हिरासत में यातना के बाद महिला के मौत मामले को संज्ञान में लिया था. आयोग ने राचकोंडा के आयुक्त महेश भागवत से घटना की विस्तृत जांच की मांगी थी.

रिपोर्ट के मुताबिक, पादरी ने इस महीने की शुरुआत में अड्डागुडुर पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई थी. बीते 15 जून को पुलिस ने मरियम्मा के बेटे उदय किरण और उसके दोस्त शंकर को गिरफ्तार किया था.

खम्मम के सरकारी अस्पताल में इलाज करा रहे उदय किरण ने आरोप लगाया कि चिंताकानी पुलिस थाने में दोनों को प्रताड़ित किया गया. दो दिन बाद उनकी मां मरियम्मा को भी इस मामले में गिरफ्तार किया गया.

उदय किरण ने बताया कि पुलिस ने 18 जून को उन्हें चिंताकानी पुलिस स्टेशन से अड्डागुडुर स्थानांतरित करते समय रास्ते भर उनके साथ मारपीट की गई.

हालांकि अड्डागुडुर पुलिस स्टेशन द्वारा दर्ज की गई पहली एफआईआर के अनुसार, तीनों आरोपियों को 18 जून को सुबह 7 बजे थाने लाया गया था. प्राथमिकी में यह भी कहा गया है कि उदय और शंकर ने स्वेच्छा से कबूल किया था. दो मध्यस्थों की उपस्थिति में सब-इंस्पेक्टर द्वारा अपराध बोध और उनका कबूलनामा दर्ज किया गया.

प्राथमिकी में कहा गया है कि सब-इंस्पेक्टर ने तीनों आरोपियों को पुलिस कांस्टेबल रशीद और जनैया को सौंप दिया. हालांकि, कुछ समय बाद मरियम्मा अचानक बेहोश हो गईं. उसे सुबह 10 बजे भुवनगिरी जिला अस्पताल ले जाया गया और उसकी जांच करने वाले डॉक्टर ने लगभग 11.30 बजे उसे मृत घोषित कर दिया.

वहीं, मरियम्मा के बेटे उदय ने कहा कि अड्डागुडुर थाने में उनकी मां और उन्हें एक साथ एक कोठरी में बंद कर बुरी तरह पीटा गया, जबकि शंकर से दूसरे सेल में पूछताछ की गई. उन्होंने आरोप लगाया कि पूछताछ के दौरान पुलिस द्वारा दी गई गंभीर यातना के कारण उनकी मां ने दम तोड़ दिया.

उन्होंने कहा, ‘उन्होंने मेरी मां के पेट पर जूतों से लात मारी. दर्द सहन न कर पाने की वजह से उसने वहीं पेशाब कर दिया. इसके बाद वह गंभीर रूप से बीमार पड़ गई. सुबह 9.30 बजे, जब उन्होंने उसे होश में लाने की कोशिश कर रहे थे,तो वह मेरी गोद में मर गई.’

एसएचआरसी की जांच के अलावा, इस संबंध में एक दलित वकील द्वारा 23 जून को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पास एक शिकायत दर्ज की गई है.

वहीं, पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज की सदस्य जया विंध्याला ने उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर कर मामले से संबंधित सभी फाइलों को जब्त करने और मामले की मजिस्ट्रेट जांच कराने की मांग की. उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस घटना के तथ्यों को छिपाने की कोशिश कर रही है.

द हिंदू के मुताबिक, तेलंगाना उच्च न्यायालय ने मामले की मजिस्ट्रेट जांच का आदेश दिया है. पीठ ने कहा कि यदि आवश्यक हो तो मजिस्ट्रेट को महिला के शरीर को सुरक्षित करना चाहिए, जिसे उसके परिवार के सदस्यों को सौंप दिया गया है और उसका दोबारा शव परीक्षण किया जाना चाहिए.

पीठ ने मजिस्ट्रेट को एक सप्ताह के भीतर न्यायिक जांच पूरी कर रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में देने के लिए कहा है.

 

रिपोर्ट के मुताबिक, इस बीच, तीन पुलिस कर्मियों- सब-इंस्पेक्टर वी. महेश्वर, कांस्टेबल रशीद और कांस्टेबल जनैया को जांच पूरी होने तक निलंबित कर दिया गया है.

जहां तेलंगाना प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष उत्तम कुमार रेड्डी ने मांग की है कि आरोपी पुलिसकर्मियों पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम तहत मामला दर्ज किया जाए.

वहीं कांग्रेस विधायक दल (सीएलपी) के नेता मल्लू भट्टी विक्रमार्क ने घटना की अनदेखी करने के लिए मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव की आलोचना की.

विक्रमार्क ने कहा कि सरकार दलितों की दुर्दशा के प्रति उदासीन रही है. कहा कि मृतक दलित महिला के खिलाफ कथित प्रताड़ना के संबंध में सरकार या स्थानीय विधायक या स्थानीय मंत्री की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है. उन्होंने आरोप लगाया कि टीआरएस सरकार के तहत दलितों के खिलाफ अत्याचार बढ़े हैं.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)