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बुंदेलखंड पैकेज: योजनाएं आईं, करोड़ों रुपये बहाए गए, लेकिन ज़मीन पर कुछ नहीं बदला

विशेष रिपोर्ट: बुंदेलखंड पैकेज का उद्देश्य सिंचाई, पेयजल, कृषि, पशुपालन समेत विभिन्न क्षेत्रों में सुधार कर पूरे इलाके का समग्र विकास करना था, लेकिन इसके तहत बनीं संरचनाओं की दयनीय स्थिति इसकी असफलता की कहानी बयां करती है. मंडियों को अभी भी खुलने का इंतज़ार है, उचित मूल्य नहीं मिलने से किसान ज़्यादा पानी वाली फ़सल उगाने को मजबूर हैं, जो कि क्षेत्र में एक अतिरिक्त संकट की आहट है.

बुंदेलखंड के चित्रकूट जिले के खंडेहा गांव का एक परिवार, जो बुंदेलखंड पैकेज लागू होने के बाद भी भयानक गरीबी में हैं. (फोटो: द वायर)

चित्रकूट/बांदा/महोबा: वो जनवरी का महीना था. कड़ाके की ठंड पड़ रही थी. टीवी, रेडियो और अखबार लोगों में नए साल का जश्न भर रहे थे और सरकार की उपलब्धियां गिना रहे थे. लेकिन इन सब के बीच बुंदेलखंड क्षेत्र के 55 वर्षीय किसान माधव प्रसाद काफी तनाव में थे. उन्होंने करीब पांच बीघा खेत में गेहूं और सरसों की फसल लगाई हुई थी, लेकिन सिंचाई न होने के चलते सब सूख रहा था.

कई दिनों बाद उस रोज रात में अचानक से लाइट आई. डीजल से सिंचाई कराने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे, इसलिए प्रसाद इस मौके को छोड़ना नहीं चाहते थे. अपनी झोपड़ी के एक कोने में लगे बिस्तर से वे उठे और टॉर्च लेकर कुएं की तरफ भागने लगे. रात में ठंड भरी तेज हवाएं चल रही थीं, प्रसाद ने बड़ी उम्मीद के साथ पंप को चालू किया.

मशीन को चलते हुए करीब 20 मिनट हुआ होगा कि पाइप में पानी आना बंद हो गया. उन्होंने कुंए में झांककर देखा तो पानी खत्म हो गया था. वैसे ये समस्या उनके लिए नई नहीं थी. पिछले कई सालों से उन्हें इन्हीं मुश्किलों के साथ सिंचाई करना पड़ा है.

इस आस में वे कुएं पर बैठ गए कि पानी वापस आ जाएगा. वहां बैठे-बैठे पूरी रात बीत गई. आसमान से तारे गायब हो गए और चेहरे पर सूरज की किरणें पड़ने लगीं, लेकिन पानी नहीं आया. तब तक लाइट भी चली गई. अंतत: वे उदास होकर वापस घर लौट आए.

माधव प्रसाद चित्रकूट जिले के अतरी मजरा गांव के निवासी हैं. इस इलाके को पाठा क्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है, जो कि पिछले कई सालों से भयानक जल संकट से जूझ रहा है.

प्रसाद कहते हैं, ‘हर दिन हम लोग बस दो वक्त के खाने का इंतजाम करने के लिए जद्दोजहद करते रह जाते हैं. अब देखिये इतना हमने बुवाई किया था, बारिश ने साथ नहीं दिया. इस कुएं में तो पानी रहता ही नहीं है. आखिर हम सिंचाई करें तो कैसे करें.’

इस समस्या का समाधान करने के लिए करीब 10 साल पहले भारत सरकार के बुंदेलखंड पैकेज के तहत प्रसाद के गांव में ये कुआं खोदा गया था. सरकारी रिकॉर्ड से पता चलता है कि इसे बनाने में उस समय कम से कम 2.5 लाख रुपये खर्च हुए थे. वादा था कि इससे सिंचाई होगी और लोगों को पीने के लिए पानी भी मिलेगा.

बुंदेलखंड पैकेज के तहत निर्मित एक कुआं.

लेकिन गांव की 40 वर्षीय बिटोलिया को अभी भी करीब डेढ़ से दो किलोमीटर चलकर पानी लाना पड़ता है. खुद के लिए और अपने मवेशियों के लिए भी. बारिश में जब पानी थोड़ा भर जाता है, तो वे ऊपर की गंदगी को छान कर उसी को पीती हैं.

ओखली में धान कूटते हुए वे कहती हैं, ‘पानी तो बहुत गंदा रहता है, लेकिन क्या करें, उसी को छान-छान कर पीते हैं. गाय-भैंस को भी नियमित रूप से पानी नहीं पिला पाते हैं. कई सालों से हमारे खेत ऐसे ही खाली पड़े हैं, उसमें कुछ भी नहीं होता है. इस बार थोड़ा सा बोए थे, लेकिन वो भी पानी बिना सूख गया.’ 

प्रशासन अपने इस निर्माण को कुएं का नाम देता है, लेकिन ये महज किसी गड्ढे से ज्यादा नहीं है. बच्चे इसमें खेलते हैं, बारिश का पानी इकट्ठा होने पर लोग यहां मछली भी पकड़ते हैं. इसमें लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी इसका ईंट-सीमेंट से घेराव यानी कि बंधाई नहीं किया गया, जिसके चलते बारिश में मिट्टी बहकर इसमें जमा हो रही है, नतीजतन कुआं भटता जा रहा है.

बुंदेलखंड पैकेज के तहत भागीरथी पाल के खेत में भी करीब आठ साल पहले एक कुआं बना था, लेकिन आज तक उसमें पानी नहीं आ पाया, न तो वे सिंचाई कर पाए हैं और न ही उससे कभी पानी निकला. पाल इसमें कूद कर दिखाते हैं कि सरकार जिसे कुआं कहते हुए अपनी पीठ थपथपा रही है, वो हकीकत में क्या है.

उन्होंने कहा, ‘यहां पीने के लिए ही पानी नहीं है, खेती के लिए तो सोच भी नहीं सकते हैं. जो भी नलकूप या कुआं सरकार ने बनाया है, वो आधा-अधूरा छोड़कर गायब हो गए. पास में ही एक प्राकृतिक नाला/नदी है, उसी से सिंचाई होती है. नदी से सिंचाई करने में नंबर लगता है, अगर नंबर चला गया तो कुछ नहीं हो सकता. दिन रात मेहनत करने के बाद सिर्फ खाने तक ही उत्पादन हो पाता है.’ 

वे बताते हैं कि उनके गांव और आस-पास के खेतों में बने आधे से ज्यादा कुओं की यही स्थिति है. 

पाल के गांव में उनके पूर्वजों द्वारा बनाया गया एक कुआं है, जो कि इन तमाम सरकारी योजनाओं पर भारी पड़ता दिखाई देता है, इसमें पूरे साल पानी रहता है और पूरा गांव इसी से पानी पीता है.

बिटोलिया को अभी भी कई किलोमीटर चलकर पानी लाना पड़ता है.

वैसे तो इस पैकेज के जरिये 326 करोड़ रुपये की पेयजल योजना के तहत पाल के गांव में नल लगा हुआ है, लेकिन उसमें शायद ही कभी पानी आता है. प्रशासन ने इसे बनाते वक्त यह नहीं सोचा कि जब ये गांव ऊंचाई पर स्थित है तो निचले स्थान पर लगी टंकी से पाइप के जरिये पानी यहां कैसे पहुंचेगा, लेकिन पैसे खर्च कर दिए गए. अब इन नलों में जंग लग रहा है. 

ये महज किसी एक व्यक्ति या एक गांव की कहानी नहीं है. बुंदेलखंड पैकेज के तहत इस क्षेत्र में भारी-भरकम राशि खर्च करने के बाद भी यहां के निवासी खुद को पहले जैसी स्थिति में ही पाते हैं और पैकेज के तहत बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार होने का आरोप भी लगाते हैं. 

इसका नाम सुनते ही लोग कहते हैं, ‘यहां इतना रुपया आता है, इतनी योजना आती है, लेकिन सब खा जाते हैं, सब अधिकारियों-नेताओं के पेट में जाता है, और बुंदेलखंड जहां पहले था, वहीं खड़ा रह जाता है.’

इस योजना की बदहाली की कहानी आगे विस्तार से बताई जाएगी, लेकिन उससे पहले एक बार ये समझ लेते हैं कि आखिर बुंदेलखंड पैकेज क्या था? 

बुंदेलखंड पैकेज

बुंदेलखंड क्षेत्र भारत के मध्य भाग में स्थिति है, जिसमें उत्तर प्रदेश के सात और मध्य प्रदेश के छह जिले शामिल हैं. प्राकृतिक संसाधनों का भंडार होने के बावजूद ये क्षेत्र देश के सबसे पिछड़े 200 जिलों में शामिल है और पानी की समस्या से जूझ रहा है.

सरकार का दावा है कि अपनी भौगोलिक स्थिति के चलते इस क्षेत्र का ये हाल है, हालांकि विशेषज्ञों एवं स्थानीय लोगों का कहना है कि पिछले कुछ सालों में प्राकृतिक जलस्रोतों को नष्ट किए जाने, प्रकृति विरोधी विकास और अवैध खनन एवं पहाड़ों को काटने इत्यादि के चलते वे इस हालत में हैं.

साल 2005 से 2007 के बीच लगातार यहां पर सूखा पड़ने के बाद कांग्रेस की अगुवाई वाली तत्कालीन यूपीए सरकार ने इस क्षेत्र का आकलन कर इसकी स्थिति सुधारने के लिए योजना आयोग (अब नीति आयोग) के नेतृत्व में एक टीम भेजी थी, जिसकी रिपोर्ट के आधार पर साल 2009-10 से भारत सरकार ने बुंदेलखंड पैकेज को लागू करना शुरू किया था, जो कि मोदी सरकार के कार्यकाल तक चला है.

पैकेज के तहत विभिन्न क्षेत्रों में किए गए कार्यों का विवरण.

इस पैकेज का मकसद सिंचाई, पेयजल, कृषि, पशुपालन, वन, आजीविका के साधन समेत विभिन्न क्षेत्रों में सुधार कर पूरे क्षेत्र का समग्र विकास करना था. इसके तहत शुरू में 7,466 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया. बाद में 12वीं पंचवर्षीय योजना (2012-17) के दौरान भी इसे जारी रखते हुए पिछड़ा क्षेत्र अनुदान कोष (बीआरजीएफ) के तहत इसके लिए 4,400 करोड़ रुपये और दिए गए.

इस राशि का ज्यादातर हिस्सा क्षेत्र की जल संबंधी समस्याओं का समाधान करने में व्यय किया गया, जिसमें से मध्य प्रदेश ने आवंटित राशि का 73 फीसदी और उत्तर प्रदेश ने 66 फीसदी राशि इस दिशा में खर्च किया.

जल-संबंधी योजनाओं के तहत बड़ी एवं छोटी सिंचाई परियोजनाओं का क्रियान्वयन, नए कुओं का निर्माण, पुराने कुओं, टैंक एवं तालाबों का गहरीकरण, कुओं से पानी निकालने के लिए एडीपीई पाइप का वितरण, ट्यूबवेल, चेकडैम का निर्माण तथा मृदा एवं जल संरक्षण संबंधी कार्य किए गए हैं. 

चूंकि बहुप्रचारित इस योजना का कार्यकाल अब पूरा हो चुका है, ऐसे में इस बात का पता लगाना बेहद जरूरी है कि आखिर क्या इससे बुंदेलखंड की स्थिति में कोई परिवर्तन आया है.

इस संबंध में द वायर  ने क्षेत्र के विभिन्न जिलों का दौरा किया, सूचना का अधिकार कानून के तहत प्राप्त तमाम सरकारी दस्तावेजों एवं सार्वजनिक पटल पर उपलब्ध आंकड़ों का अध्ययन किया और कई सारे स्थानीय लोगों एवं विशेषज्ञों से बीतचीत के आधार पर मुख्य रूप से तीन बिंदुओं पर इसका लेखा-जोखा तैयार किया है. 

पहला, ये कि योजना के तहत बनीं विभिन्न संरचनाओं जैसे कि कुआं, चेकडैम, बांध, नहर इत्यादि की क्या स्थिति है? 

दूसरा, ये कि इनसे क्या किसी तरह का लाभ मिला है, क्या क्षेत्र की सिंचाई की समस्या का समाधान हुआ है, क्या परती भूमि की संख्या कम हुई है? 

तीसरा और आखिरी पहलू ये देखा गया है कि सरकार अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए बुंदेलखंड को लेकर उसकी जिस भौगोलिक एवं प्राकृतिक स्थिति का बहाना बनाती है, उसमें कितनी सच्चाई है? 

पैकेज के तहत बनीं संरचनाओं की स्थिति

आदेश आदिवासी योजनाओं का नाम सुनते-सुनते अब थक गए हैं. वे कहते हैं कि उनके 35 साल के जीवन में कितनी योजनाएं और कितनी ही सरकारें आईं, लेकिन आज तक कोई भी सरकार अपनी योजना लेकर उन तक नहीं पहुंच पाई.

कैमहाई गांव के निवासी आदेश आदिवासी (बीच में).

वे बचपन से ही नेत्रहीन हैं. छोटी आयु में ही माता-पिता का निधन हो जाने के बाद से वे अपनी बहन के घर रहते हैं, जो कि उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड के कैमहाई गांव में स्थित है. यहां तक आने रास्ता काफी दुर्गम है, मुख्य सड़क से एक पगडंडी निकली हुई है, जो कि जंगली झाड़ियों और चौतरफा फैली लाल मिट्टी वाली उबड़-खाबड़ पथरीली जमीन से होकर गुजरती है. 

आदिवासी बताते हैं कि गांव में एक हैंडपंप है, उसी के सहारे लोगों को पानी मिलता है. यदि वो खराब हो जाता है तो लोग पानी के लिए तरस जाते हैं. पैकेज के तहत उनके गांव में एक कुआं बना है, लेकिन उसका पानी एकदम काला हो गया है, उसमें कीडे़ लग गए हैं और पानी की सतह पर मरे हुए कई जीव दिखाई देते हैं, जिसे मवेशियों को भी नहीं पिलाया जा सकता है. 

कुआं

ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन ने इसे ऐसी जगह पर बना दिया है, जहां पर पानी का स्रोत ही नहीं है, जिसके चलते अधिकतर समय कुआं सूखा रहता है और बारिश होने पर इसमें पानी आता है, जो कुछ दिनों में सड़ जाता है. 

ये बात गांव वाले ही नहीं, बल्कि खुद सरकारी रिकॉर्ड इसकी तस्दीक करता है. दस्तावेजों के मुताबिक, इन कुओं की खुदाई से पहले उत्तर प्रदेश प्रशासन ने कोई हाइड्रोजिओलॉजिकल स्टडी नहीं कराई थी, जो इस बात को प्रमाणित कर सके कि जिस जगह पर कुएं खोदे गए हैं, वो स्थान सही है. 

इसके अलावा झांसी और ललितपुर में कई जगहों पर पानी में नाइट्रेट की मात्रा अधिक होने की रिपोर्ट आई थी, लेकिन कुओं की खुदाई या इसके गहरीकरण के दौरान प्रशासन ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया.

कई किसानों ने इसकी शिकायत की है कि कुओं को सही से नहीं खोदा गया है, प्रशासन ने खानापूर्ति के लिए एक गड्ढा खोद दिया है, जिसमें आस-पास से बहकर मिट्टी जमा हो रही है. नतीजतन इसका कोई भी फायदा होने की संभावना नहीं है, जबकि यूपी सरकार ने योजना के तहत आवंटित राशि का भारी-भरकम 18 फीसदी हिस्सा सिर्फ कुओं पर ही खर्च किया था.

बुंदेलखंड पैकेज के तहत निर्मित कुओं में या तो पानी नहीं है या फिर पानी सड़ रहा है.

इस पैकेज का आकलन करने के लिए खुद नीति आयोग की अगुवाई में टेरी (द एनर्जी एंड रिसोर्स इंस्टिट्यूट) द्वारा तैयार की गई एक रिपोर्ट में भी इन कुओं की उपयोगिता पर सवाल उठाया गया है.

साल 2019 की इस रिपोर्ट में कहा गया है, ‘इन जिलों में सामान्य से कम बारिश होने की प्रवृत्ति और इनके भूजल स्तर को देखते हुए लंबे समय में इन कुओं की उपयोगिता सवालों के घेरे में है.’

पैकेज के तहत उत्तर प्रदेश सरकार ने सिर्फ चार जिलों क्रमश: झांसी, ललितपुर, महोबा और चित्रकूट में ही नए कुएं बनाए हैं. हालांकि इसकी कोई वजह नहीं बताई गई कि आखिर सिर्फ क्षेत्र के इन्हीं जिलों में क्यों इसका लाभ दिया गया है?

आरटीआई के तहत प्राप्त दस्तावेजों के मुताबिक, यूपी-बुंदेलखंड में योजना के पहले चरण के तहत 156.78 करोड़ रुपये खर्च कर कुल 8,098 कुएं बनाए गए थे. 

इसके साथ ही इससे पानी निकालने के लिए मशीन (पंपसेट) और एडीपीई पाइप का भी वितरण किया गया, जिसमें करीब 65 करोड़ रुपये खर्च हुए थे. कुल मिलाकर देखेंगे तो एक कुएं पर करीब 2.50 लाख रुपये का खर्च आया था.

इसके अलावा इसी दौरान 6,942 कुओं का गहरीकरण और 6,931 कुओं का रिचार्ज पिट भी बनाया गया था. इस काम के लिए भारत सरकार द्वारा 168.76 करोड़ रुपये की मंजूरी मिली हुई थी, जिसमें से 43.76 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं. इस आधार पर एक कुएं को गहरा या रिचार्ज करने में करीब 32,000 रुपये खर्च हुए हैं.

हालांकि इनकी असफलता के निशान सामने आने के बावजूद प्रशासन ने और कुएं खोदने के लिए पैसा आवंटित कर दिया. खास बात ये है कि जो कुआं पहले ढाई लाख रुपये में पूरी तरह तैयार कर दिया जाता था, उसके लिए इस बार सरकार ने 5.44 लाख रुपये दिए.

दस्तावेजों से पता चलता है कि  तीसरे चरण में सरकार ने अतिरिक्त 1,935 नए कुएं खोदने के लिए 105.29 करोड़ रुपये दिया था.

योजना के तहत इन कुओं पर करीब 2.5-2.5 लाख रुपये खर्च किया गया था, जिनकी गहराई न के बराबर है.

इसके साथ ही पैकेज के तहत 99.67 करोड़ रुपये खर्च कर 7,248 निजी नलकूपों (ट्यूबवेल) का उर्जीकरण किया गया था. इस काम के लिए प्रति नलकूप पर 1.37 लाख रुपये का खर्च आया है. 

इसके तहत झांसी में 1100, जालौन में 2389, ललितपुर में 821, हमीरपुर में 574, बांदा में 1349, महोबा में 86 और चित्रकूप में 920 नलकूपी का उर्जीकरण किया गया था.

हालांकि प्रशासन ने इसकी कोई वजह नहीं बताई है कि आखिर इस योजना का विभिन्न जिलों में असमान लाभ क्यों दिया गया है?

चेकडैम

बांदा जिले के गोधनी गांव के रहने वाले संतोष कुमार प्रजापति की पानी संबंधी अधिकतर जरूरतें गांव के बाहर बह रही एक नदी से पूरी होती थी. उससे वे सिंचाई भी करते थे और मवेशियों को पानी भी पिलाते थे. कई बार इसी पानी को पीने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता था.

लेकिन साल 2016-17 के दौरान सरकार ने विकास के नाम पर यहां एक चेकडैम बनाया. चूंकि किसी कथित माफिया टाइप ठेकेदार को इसका काम सौंपा गया था, जो ईंट, सीमेंट, पत्थर वगैरह बेचकर इसका पैसा खा गए, नतीजतन करीब 28 लाख रुपये में बना ये डैम छह-सात महीने के भीतर टूट गया.

लेकिन ग्रामीणों के लिए चेकडैम का टूटना चिंता का विषय नहीं था, उनके सामने बड़ी समस्या तब खड़ी हुई जब चेकडैम बनने के बाद से पानी के साथ मलबा बहकर वहां इकट्ठा होने लगा था, जिससे नदी के प्राकृतिक स्रोत भी बंद हो गए.

अब नदी में पर्याप्त पानी नहीं रहता है. गर्मियों में हालत बदतर हो जाती है.

ये चेकडैम बनने के करीब छह महीने बाद ही टूट गया था.

प्रजापति कहते हैं, ‘चेकडैम बनने से हमारा नुकसान हुआ है. जब ये नहीं बना था तो नदी में लगातार पानी रहता था, जानवरों को पानी मिलता था. इसके बनने से पानी सूख जाता है. इसके जो स्रोत थे वो बंद हो गए हैं. पानी में जो मलबा बहकर आता था उसने पानी के स्रोतों को जाम कर दिया है. एक तो चेकडैम सही से नहीं बना. अगर बनता तो उससे सिंचाई हो पाती. चेकडैम भी टूट गया, पानी के स्रोत भी बंद हो गए.’

उन्होंने कहा कि उनके गांव में पिछले 30 साल से भी अधिक समय से एक भी ट्यूबवेल नहीं है. जो बड़े भूमि वाले किसान हैं, उनके पास साधन है, लेकिन वे उन्हें समय से पानी नहीं देते हैं.

प्रजापति या उनके गांववाले ही नहीं, बल्कि क्षेत्र के ज्यादातर किसानों का ये मानना है कि चेकडैम से कोई लाभ नहीं मिला है, ये भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया, उलटे इस संरचना के चलते उनकी नदियों के प्राकृतिक स्रोत खत्म हो रहे हैं.

उत्तर प्रदेश सरकार ने पैकेज के तहत बुंदेलखंड क्षेत्र में ऐसे ही करीब 1,400 चेकडैम और मध्य प्रदेश सरकार ने 350 स्टॉप डैम बनाए है. यूपी में वन, लघु सिंचाई और कृषि विभाग ने इस काम को संभाला था. जबकि एमपी में सिर्फ ग्रामीण विकास विभाग ने इस योजना को लागू किया.

मध्य प्रदेश सरकार ने एक चेकडैम को बनाने में औसतन करीब 37 लाख रुपये खर्च किए. वहीं यूपी में चेकडैम को बनाने में अलग-अलग विभाग ने अलग-अलग राशि खर्च की है.

दस्तावेजों के मुताबिक, राज्य के वन विभाग ने एक चेकडैम बनाने में करीब 10 लाख रुपये खर्च किए. जबकि लघु सिंचाई विभाग ने इसी चेकडैम बनाने में 28.67 लाख रुपये का राशि व्यय की. तीसरे चरण में अतिरिक्त 326 चेकडैम बनाने के लिए विभाग ने लागत और बढ़ा दी और एक डैम के निर्माण के लिए करीब 31 लाख रुपये की दर से बजट आवंटित किया.

वहीं यूपी के कृषि विभाग ने एक चेकडैम बनाने में 15 लाख रुपये खर्च किए थे.

चेकडैम का उद्देश्य वर्षा के जल को रोककर उसे सिंचाई के लिए उपयुक्त बनाना था. हालांकि बुंदेलखंड पैकेज तहत बनीं इन संरचनाओं की स्थिति बेहद खराब है, जिसमें से कई या तो टूट गए हैं या सही बनावट नहीं होने के चलते उसमें पानी नहीं रहता है.

बुंदेलखंड पैकेज के तहत निर्मित चेकडैम सूखे पड़े हैं. गांव वाले इसे पानी की समस्या का सही समाधान नहीं मानते है.

खुद नीति आयोग ने साल 2019 की अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इसमें से करीब आधे चेकडैम में पानी ही नहीं रहता है, जिसके कारण किसान अभी भी बोरवेल या कुओं पर निर्भर हैं.

आयोग ने इस बात को भी स्वीकार किया है कि इन चेकडैम को बनाते वक्त अच्छी गुणवत्ता वाली चीजों का इस्तेमाल नहीं किया गया है, नतीजतन ये स्थानीय लोगों के लिए किसी काम का नहीं है.

क्षेत्र के विभिन्न चेकडैमों में गंदगी से भरा ढेर देखा जा सकता है, जिसमें से बदबू आती रहती है. इसमें टूटे हुए पेड़ों की डालियां, पत्ते, पुआल, काई इत्यादि दिखाई देते हैं.

नीति आयोग के सर्वे के दौरान महज 26 फीसदी किसानों ने कहा था कि चेकडैम बनने से उन्हें थोड़ा-बहुत लाभ हुआ है.

बड़ी सिंचाई योजना

बुंदेलखंड के चित्रकूट जिले में स्थित रसिन गांव के 70 वर्षीय रामपाल उन दिनों काफी आशांवित दिखाई दे रहे थे. उनकी जमीनें लेकर उनके गांव के नाम पर बने रसिन बांध को एक बार फिर से चमकाया जा रहा था. पहले ये नीले रंग का हुआ करता था, लेकिन अब भगवा रंग से इसकी चौतरफा पुताई की जा रही थी.

रामपाल ने लोगों की बातचीत के जरिये सुना कि यहां पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का दौरा होने वाला है. वे खुश हुए, उन्हें लगा कि करीब 15 सालों का उनका इंतजार खत्म हो जाएगा, अब उन्हें मुआवजा मिलेगा.

इस साल मार्च महीने में योगी आदित्यनाथ पूरे ताम-झाम के साथ यहां आए थे. उन्होंने रसिन बांध का फिर से लोकार्पण किया, जैसे कि ये कोई नई परियोजना हो. बांध की खूबसूरती का बखान किया गया. यहां पर चौधरी चरण सिंह सिंचाई परियोजना के नाम से लगे पुराने बोर्ड को हटाकर सिंचाई एवं जल संसाधन विभाग का बोर्ड लगा दिया गया.

इस तरह योगी सरकार ने रसिन बांध को अपनी उपलब्धियों में दर्ज करा लिया. लेकिन बांध की मुख्य नहर अभी भी सूखी पड़ी हुई है. पर्याप्त पानी नहीं होने के चलते पानी नहर में पहुंचता ही नहीं है.

रसिन बांध की मुख्य नहर वर्षों से सूखी पड़ी है.

रामपाल को ये सब हवा का तेज एक झोंका जैसा लगा, जो आया और चला गया. वे अभी भी वहीं खड़े हैं, मुआवजा और खेत तक पानी पहुंचने का इंतजार कर रहे हैं.

साल 2003-04 में बसपा सरकार के कार्यकाल में रसिन बांध का कार्य प्रारंभ किया गया था. बाद में इसे बुंदेलखंड पैकेज के तहत वित्तपोषित किया गया, इस योजना के तहत यह एक ड्रीम प्रोजेक्ट था. यह 2.6 किमी लंबा और 16.33 मीटर ऊंचा बांध है. इसके निर्माण में 20.80 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे.

लेकिन इस समय बांध पर बुंदेलखंड पैकेज का कोई निशान दिखाई नहीं देता है. इस निशान के साथ-साथ नहर से पानी भी गायब हो गया है. खास बात ये है कि योगी सरकार ने अपने विभाग का जो बोर्ड रसिन बांध पर लगाया है, उसमें इसके खर्च का कोई विवरण नहीं है.

आरोप है कि ऐसा इसलिए किया गया है, क्योंकि इस बांध के नाम पर नेताओं और अधिकारियों ने फंड की काफी हेरा-फेरी की है, जिसके चलते वास्तविक लागत बहुत बढ़ गई है. 

सरकारी दावे के मुताबिक, इस बांध से रबी सीजन में 3,690 एकड़ और खरीफ में 1,966 एकड़ की सिंचाई होती है.

हालांकि आलम ये है कि बांध को बनाने के लिए जिनकी जमीनों का अधिग्रहण किया गया था, वे खुद भी सिंचाई नहीं कर पा रहे हैं. इसे लेकर रसिन में एक कहावत मशहूर है ‘80 कुआं 84 ताला, रसिन गांव का बना दिवाला.’

गांव की 45 वर्षीय महिला सरमनिया बताती हैं कि उनकी 12 बीघा जमीन को इस बांध के लिए अधिग्रहित किया गया था, लेकिन मुआवजे के नाम पर उन्हें सिर्फ डेढ़ लाख रुपये मिले हैं. इसके लिए अभी भी वो सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा रही हैं.

एक अन्य व्यक्ति कृष्ण दत्त त्रिपाठी कहते हैं कि अपनी जमीनें देने के बाद भी उन्हें पानी नहीं मिल रहा है. उन्होंने कहा, ‘जिन लोगों की जमीन नहर के पास में है, वे तो सिंचाई कर लेते हैं, लेकिन जिनके खेत दूर हैं, वे अभी भी पानी के लिए तरस रहे हैं. सरकार के लिए ये बांध उपलब्धि होगी, हमारे लिए तो नाकामी है.’

ये नया बोर्ड लगाकर योगी सरकार ने रसिन बांध परियोजना को अपने नाम करा लिया है.

गांव के मुन्नी लाल अपनी जमीन के कागज दिखाते हुए बताते हैं कि ऐसे 100 से अधिक लोग होंगे, जिन्हें परियोजना के 17 साल बाद भी मुआवजा नहीं मिला है.

रसिन बांध से थोड़ी दूर पर ही सेमरा गांव में पैकेज के तहत बंधी (बांध का छोटा रूप) एवं इससे जुड़ी नहर की मरम्मत कराई गई थी. इसमें उस समय करीब छह लाख रुपये खर्च हुए थे. इसका उद्देश्य था कि नहर साफ करने के बाद इसमें काफी पानी आए और आखिरी छोर तक के किसान को लाभ मिलेगा.

लेकिन नहर बिल्कुल सूखी पड़ी हुई है, बंधी में इतना पानी है ही नहीं कि वो नहर तक पहुंच पाए और इससे सिंचाई हो.

उत्तर प्रदेश सरकार ने बुंदेलखंड पैकेज के तहत आवंटित राशि में से 17 फीसदी से अधिक की राशि (353 करोड़ रुपये) को इस तरह की सिंचाई परियोजनाओं में खर्च किया है. 

इसमें से ज्यादातर पैसे नहरों से जुड़े 41 कार्यों पर खर्च किए गए थे, जिसमें नहरों का पुनरुद्धार, उसकी मरम्मत कर क्षमता बढ़ाना और जरूरत पड़ने पर उसे नए सिरे से तैयार करने (पुनर्स्थापना) जैसे कार्य शामिल थे. सरकारी दस्तावेज दर्शाते हैं कि यूपी सरकार ने इस दिशा 236 करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च की थी.

इसे बावजूद क्षेत्र की कई सारे नहरें सूखी, बेजान पड़ी हुई हैं.

इसके अलावा ललितपुर जिले में बंदई बांध परियोजना के लिए 77.47 करोड़ रुपये, शहजाद बांध स्प्रिंकलर सिंचाई परियोजना के लिए 89.88 करोड़ रुपये, महोबा जिले में कुलपहाड़ स्प्रिंकलर सिंचाई परियोजना के लिए 76.49 करोड़ रुपये और हमीरपुर जिले में मझगवान चिल्ली स्प्रिंकर सिंचाई परियोजना के लिए 18.24 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं.

दस्तावेज दर्शाते हैं कि यूपी सरकार ने जहां एक तरफ बांधों एवं चेकडैम के निर्माण पर भारी भरकम राशि खर्च की है, वहीं दूसरी तरफ प्राकृतिक जल स्रोतों जैसे कि तालाब इत्यादि को नजरअंदाज किया गया है.

सूखी पड़ी सेमरा बंधी.

भारत सरकार से शुरू में उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के तालाबों, टैंकों या झीलों की मरम्मत कर उसकी स्थिति सुधारने के लिए 45.94 करोड़ रुपये की मंजूरी दी थी, लेकिन इसमें से महज 4.40 करोड़ रुपये ही खर्च किए गए हैं.

इसमें से झांसी जिले के 10, जालौन के तीन, बांदा के एक, चित्रकूट के नौ, महोबा के चार और हमीरपुर जिले के सिर्फ एक बंधी, तालाब, टैंक या झील के मरम्मत का कार्य किया गया है.

वहीं मध्य प्रदेश ने भी अधिकतर राशि बांध बनाने में खर्च की है. यहां पैकेज के तहत पांच बड़ी और 167 छोटी सिंचाई परियोजनाओं में 1,434 करोड़ रुपये खर्च किए, जिसमें बड़ा राजघाट प्रोजेक्ट भी शामिल है. राज्य सरकार ने कुछ नए बांध बनाए और पहले की परियोजनाओं को बेहतर करने में फंड को व्यय किया.

इसके अलावा इन परियोजनाओं से दूर तक पानी पहुंचाने के लिए कई नई नहरें भी जोड़ी गई थीं.

पेयजल योजना

बुंदेलखंड पैकेज के तहत पीने के लिए पानी मुहैया कराने की भी योजना चलाई गई थी. सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक इसके पहले चरण में उत्तर प्रदेश में करीब 92 करोड़ रुपये खर्च कर 2725 हैंडपंप लगाए गए और 12 पाइप के जरिये पानी देने के प्रोजेक्ट को लागू किया गया था.

वहीं दूसरे चरण में राज्य ने पेयजल कार्य में 234.08 करोड़ रुपये खर्च किए. हालांकि इन सब के बावजूद इस क्षेत्र में आसानी से कई लोगों को कई किलोमीटर दूर से पानी लाकर पीते देखा जा सकता है. गर्मियों में ये स्थिति भयावह हो जाती है.

वहीं मध्य प्रदेश में पहले चरण में 100 करोड़ रुपये खर्च इस तरह की 1,287 योजनाएं लागू की गईं, जिसमें से 1168 प्रोजेक्ट ट्यूबवेल आधारित और 119 प्रोजेक्ट कुओं पर निर्भर था.

आगे चलकर राज्य ने दूसरे चरण में 252.48 करोड़ रुपये की लागत से तीन परियोजनाओं को मंजूरी दी, जिसे सामूहिक जल आपूर्ति योजना के नाम से जाना जाता है.

इस तरह मध्य प्रदेश सरकार ने बुंदेलखंड पैकेज के तहत अपने छह जिलों में पेयजल की सुविधा के लिए 352.48 करोड़ रुपये खर्च किए हैं.

इन सब के अलावा दोनों राज्यों के वन विभाग मृदा एवं जल संरक्षण के दिशा में भारी-भरकम राशि खर्च की है, जिसमें मृदा एवं नमी संरक्षण, वॉटरशेड मैनेजमेंट, चेकडैम निर्माण जैसे कार्य किए गए हैं.

दस्तावेज दर्शाते हैं कि यूपी के वन विभाग ने इस दिशा में 103 करोड़ रुपये और एमपी के वन विभाग ने 187 करोड़ रुपये खर्च किए हैं. हालांकि वे ये पता नहीं लगा पाए हैं कि इन कार्यों का क्या प्रभाव पड़ा है.

विभाग के अधिकारियों का कहना है कि इस योजना का लाभ वन को मिला है, लेकिन इससे क्या परिवर्तन हुआ, उसका पता नहीं लगाया जा सका है.

पैकेज से क्या लाभ मिला

इस पैकेज का प्रमुख लक्ष्य सिंचाई क्षमता बेहतर करना था, ताकि उत्पादन ज्यादा हो, जिसे बेचकर किसान अपनी आजीविका चला सके. सरकार का दावा भी है कि उन्होंने इस क्षेत्र में बड़ी कामयाबी हासिल की है.

हालांकि खुद सरकारी आंकड़े इसकी एक अलग कहानी बयां करते हैं.

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के आर्थिक एवं साख्यिकी निदेशालय से प्राप्त किए गए लैंड यूज रिकॉर्ड (लैंड यूज रिकॉर्ड) दर्शाते हैं कि पहले बुंदेलखंड के जितने क्षेत्र में बुवाई होती थी, उसमें काफी गिरावट आई है.

उदाहरण के तौर पर साल 2009-10 में, जिस साल से इस पैकेज को लागू किया जा रहा है, बांदा जिले में 3.50 लाख हेक्टेयर में बुआई हुई थी. लेकिन 2017-18 में ये घटकर 3.44 लाख हेक्टेयर हो गया. 

हालांकि इस दौरान एक से अधिक बार बुआई करने यानी कि कुल फसल क्षेत्र में बढ़ोतरी हुई है. साल 2009-10 में बांदा जिले का कुल फसल क्षेत्र 4.34 लाख हेक्टेयर था, जो कि 2017-18 में बढ़कर 4.75 लाख हेक्टेयर हो गया.

बुंदेलखंड पैकेज के तहत नहरों में काफी कार्य कराया गया था, लेकिन ये सूखी पड़ी हुई है.

इसी तरह जालौन में पहले 2009-10 में 3.48 लाख हेक्टेयर बुवाई हुई थी, जो कि 2017-18 में घटकर 3.44 लाख हेक्टेयर हो गई. हालांकि इस दौरान कुल फसल क्षेत्र 4.26 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 4.80 लाख हेक्टेयर हो गई है.

लेकिन महोबा जिले में बुवाई के साथ-साथ कुल फसल क्षेत्र में गिरावट आई है. यहां 2009-10 में 2.34 लाख हेक्टेयर में बुवाई हुई थी, जो कि 2017-18 में घटकर 2.06 लाख हेक्टेयर हो गया. इसके साथ ही कुल फसल क्षेत्र 3.37 लाख हेक्टेयर से घटकर 2.70 लाख हेक्टेयर हो गया है.

कुल मिलाकर देखें तो बुंदेलखंड के उत्तर प्रदेश वाले जिलों में पहले 20.12 लाख हेक्टेयर में बुवाई की जाती थी, जो पैकेज के लागू होने के बाद घटकर 19.48 लाख हेक्टेयर हो गया है. वहीं पहले कुल फसल क्षेत्र 27.77 लाख हेक्टेयर था, जिसमें थोड़ी सी बढ़ोतरी हुई और 2017-18 में ये बढ़कर 27.87 लाख हेक्टेयर हो गया. 

ऐसी ही स्थिति मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के जिलों का भी है, जहां छतरपुर और पन्ना में बुवाई क्षेत्र घट गया है. वहीं टीकमगढ़ में कुल फसल क्षेत्र में गिरावट आई है, जो कि 2009-10 में 4.24 लाख हेक्टेयर था और 2017-18 आते-आते कम होकर 3.79 लाख हेक्टेयर हो गया.

इसके साथ ही बुंदेलखंड में परती भूमि, जो कि खाली पड़ी रहती है, की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई है, जबकि ये पैकेज इसलिए ही लाया गया था, ताकि ऐसी भूमि का इस्तेमाल कर खेती किया जा सके.

लैंड यूज रिकॉर्ड के मुताबिक, 2009-10 में चित्रकूट में जहां 20 हजार हेक्टेयर की भूमि खाली पड़ी थी, वो 2017-18 में बढ़कर 36.29 हजार हेक्टेयर हो गई. इसी तरह ललितपुर और महोबा में जहां पहले करीब 18 हजार हेक्टेयर भूमि परती पड़ी हुई थी, वो 2017-18 में बढ़कर 41.29 हजार और 49.85 हजार हेक्टेयर हो गई.

इसी तरह मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में 2009-10 में जहां 21.86 हजार हेक्टेयर भूमि परती थी, वो 2017-18 में बढ़कर 45 हजार हेक्टेयर से अधिक हो गया. इस बीच छतरपुर में परती पड़ी जमीन का क्षेत्र 71.34 हेक्टेयर से बढ़कर 87.10 हजार हेक्टेयर हो गया है.

पैकेज लागू होने के बाद भी सिंचाई का उचित इंतजाम नहीं होने से सूखती फसलें.

यदि कुल मिलाकर देखें तो उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड के सातों जिलों में 2009-10 में 1.86 लाख हेक्टेयर की भूमि परती पड़ी हुई थी, जो कि 2017-18 में बढ़कर 2.61 लाख हेक्टेयर हो गई. वहीं इस दौरान मध्य प्रदेश के छह जिलों में 1.67 लाख हेक्टेयर भूमि परती पड़ी हुई थी, जो कि 2017-18 में बढ़कर 2.07 लाख हेक्टेयर हो गई.

बुंदेलखंड पैकेज लागू होने के बाद से उत्तर प्रदेश के सात में से पांच जिलों में कुल सिंचाई में बढ़ोतरी हुई है, लेकिन ललितपुर और महोबा में गिरावट आई है.

ललितपुर में 2009-10 में 2.57 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई होती थी, जो कि 2017-18 में घटकर 2.29 लाख हेक्टेयर हो गया. इसी तरह महोबा में सिंचाई क्षेत्र 89.91 हजार हेक्टेयर से घटकर 78.34 हजार हेक्टेयर आ गया है. 

इसी तरह मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ में कुल सिंचित भूमि का क्षेत्रफल 2.19 लाख हेक्टेयर से घटकर 1.58 लाख हेक्टेयर हो गया है. पैकेज के तहत सिंचाई के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी इस जिले में सिंचित क्षेत्र 61 हजार हेक्टेयर कम हो गया.

बुंदेलखंड पैकेज के तहत भारत सरकार ने उत्तर प्रदेश में कुआं निर्माण और इसके जरिये सिंचाई सुविधा तैयार करने के लिए 384 करोड़ रुपये से अधिक की राशि जारी की थी, जिसे तहत चार जिलों- झांसी, ललितपुर, महोबा और चित्रकूट में काम कराया गया था.

इसी तरह नहर की दिशा में कराए गए कार्यों में पैकेज के तहत 236.36 करोड़ रुपये खर्च किए गए. जाहिर है कि इसका मकसद ये था कि इनके जरिये सिंचाई क्षेत्र को बढ़ाया जाए.

हालांकि दस्तावेज दर्शाते हैं बुंदेलखंड के इन जिलों में कुआं और नहर पर बेतहाशा खर्च करने के बाद भी इनके जरिये सिंचाई का क्षेत्र कम हो गया है.

लैंड यूज रिकॉर्ड के मुताबिक, चित्रकूट में 2009-10 में नहर के जरिये 5827 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई हुई थी, लेकिन 2017-18 में ये घटकर 4,582 हेक्टेयर हो गया. इसी तरह ललितपुर में पहले नहर के जरिये 74.61 हजार हेक्टेयर भूमि पर सिंचाई होती थी, लेकिन पैकेज लागू होने के बाद ये घटकर 56.50 हजार हेक्टेयर हो गया.

बांदा जिले में भी नहर के जरिये सिंचाई क्षेत्र में काफी गिरावट आई है. 2009-10 में यहां 99.7 हजार हेक्टेयर भूमि पर सिंचाई नहर से हुई थी, जो कि 2017-18 में घटकर 87 हजार हेक्टेयर पर पहुंच गई. महोबा जिले का भी यही हाल है. 

यूपी-बुंदेलखंड के सिर्फ जालौन और झांसी में ही नहर के जरिये सिंचाई क्षेत्र में थोड़ी बढ़ोतरी हुई है.

बुंदेलखंड का एक गांव गोधनी.

साल 2009-10 में इन सातों जिलों को मिलाकर नहर के जरिये 4.51 लाख हेक्टेयर भूमि पर सिंचाई होती थी, लेकिन 2017-18 में ये घटकर 4.22 लाख हेक्टेयर हो गया.

वहीं कुओं के जरिये सिंचाई के आंकड़े देखने पर पता चलता है कि जिस साल इस पैकेज को लागू किया गया था, उस समय चित्रकूट जिले में कुआं से 6,352 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई होती थी, लेकिन हजारों कुएं बनाने के बाद भी 2017-18 आते-आते इसके जरिये सिंचाई का क्षेत्रफल घटकर 4,543 हेक्टेयर हो गया.

इसी तरह कुआं के जरिये ललितपुर में 2009-10 के समय 82.42 हजार हेक्टेयर पर सिंचाई होती थी, लेकिन 2017-18 में ये घटकर 63.20 हजार हेक्टेयर ही रह गया.

हालांकि झांसी और महोबा में कुआं के जरिये सिंचाई में थोड़ी बढ़ोतरी भी हुई है. पैकेज की शुरुआत में यहां कुओं के जरिये 84.7 हजार हेक्टेयर और 55.3 हजार हेक्टेयर पर सिंचाई होती थी, हालांकि पैकेज पूरा होने पर ये क्षेत्र बढ़कर 92.9 हजार हेक्टेयर और 59.4 हजार हेक्टेयर हो गया है. 

यदि कुल मिलाकर देखें तो 2009-10 में इन चार जिलों में कुओं के जरिये 2.28 लाख हेक्टेयर भूमि सिंचित होती थी. लेकिन बुंदेलखंड पैकेज लागू करने के बाद 2017-18 में ये घटकर 2.20 लाख हेक्टेयर हो गया.

इस पैकेज को लागू करने के दौरान बांदा की 228 हेक्टेयर वन भूमि कम हो गई. रिकॉर्ड के मुताबिक, 2009-10 में यहां 5,421 हेक्टेयर क्षेत्र में वन थे, लेकिन 2017-18 में ये घटकर 5,193 हेक्टेयर हो गया. 

इसी तरह हमीरपुर जिले में भी 389 हेक्टेयर वन भूमि कम हो गई है. इस दौरान मध्य प्रदेश के सागर में भी 78 हेक्टेयर वन खत्म हो गए हैं. ये स्थिति ऐसे समय पर है जब बुंदेलखंड पैकेज के तहत वन के लिए भी काफी राशि खर्च की गई थी.

बर्बाद मंडियां, ज्यादा पानी वाली फसलों का हो रहा उत्पादन

भारत सरकार के तत्कालीन मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रहमण्यम ने साल 2017 में विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर अपने एक महत्वपूर्ण लेक्चर में कहा था, ‘हम कुछ फसलों और उनके किसानों को ज्यादा प्यार करते हैं’ तथा ‘अन्य फसलों एवं उनके किसानों को कम चाहते हैं.’

सुब्रहमण्यम भारत सरकार की उन नीतियों को ओर इशारा कर रहे थे, जिसके तहत सिर्फ गेहूं, धान जैसी कुछ खास किस्म की फसलों को ही न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीदने पर जोर दिया जाता है. नतीजतन ज्यादातर किसान इन्हीं का उत्पादन करना चाहते हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो सरकार किसानों को इनका उत्पादन करने के लिए मजबूर करती है.

सूखा प्रभावित बुंदेलखंड के किसान भी इससे अछूते नहीं है. धान, गेहूं, गन्ना जैसी फसलों में बहुत ज्यादा पानी लगता है, लेकिन अन्य कृषि उत्पादों के लिए बेहतर बाजार नहीं होने के चलते इस क्षेत्र के किसान तेजी से अधिक पानी वाली फसलों को उगाने की होड़ में लगे हुए हैं.

वॉटरएड इंडिया की स्टेट ऑफ इंडियाज वॉटर 2019 रिपोर्ट के मुताबिक, एक किलो गेहूं के उत्पादन में करीब 1,654 लीटर पानी लगता है. इसी तरह एक किलो चावल के उत्पादन में 2,800 लीटर पानी लगता है.

बुंदेलखंड में गेहूं की बुवाई तेजी से बढ़ी है, जिसमें काफी ज्यादा पानी खर्च होता है.

भारत में करीब 85 फीसदी भूजल का इस्तेमाल खेती में किया जाता है और नाबार्ड के मुताबिक इसमें से 80 फीसदी पानी सिर्फ तीन फसलों- गेहूं, धान और गन्ना में जाता है. जाहिर है कि जहां भी इन फसलों को अत्यधिक उत्पादन होगा, वहां पानी के स्तर में गिरावट आना लाजिमी है.

विशेषज्ञ बताते हैं कि बुंदेलखंड जैसे क्षेत्र के लिए इस तरह की उत्पादन पद्धति बिल्कुल भी ठीक नहीं है. हालांकि आंकड़े दर्शाते हैं कि पिछले दस सालों में यहां के किसानों ने कम पानी वाली फसलों जैसे उड़द, सरसों, ज्वार, बाजरा के बजाय तेजी से गेहूं और धान की तरफ रुख किया है.

बुंदेलखंड पैकेज शुरू होने के दौरान यूपी के सात जिलों में कुल मिलाकर 43,675 हेक्टेयर में धान की बुवाई होती थी. इसमें से सबसे ज्यादा बांदा 30,889 हेक्टेयर धान बोया जाता था.

लेकिन 2020-21 में धान बोने का क्षेत्रफल बढ़कर 74,022 हेक्टेयर हो गया है. जबकि इन क्षेत्रों में धान की पैदावार काफी कम है. 

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में धान की औसतन पैदावार प्रति हेक्टेयर पर 2.70 टन है, लेकिन बांदा में इससे कम 2.11 टन, चित्रकूट में 1.61 टन, झांसी में 1.99 टन और महोबा में 2.07 टन है.

इसी तरह साल 2009-10 में मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड के छह जिलों जहां 1.47 लाख हेक्टेयर में धान बोया जाता था, वहीं 2019-20 में ये क्षेत्रफल 83 हजार हेक्टेयर और बढ़कर 2.30 लाख हेक्टेयर हो गया है. जबकि इन इलाकों में पैदावार यूपी वाले इलाकों की तुलना में भी काफी कम है.

आलम ये है कि टीकमगढ़ में धान की उत्पादकता प्रति हेक्टेयर महज 0.59 टन है. इसी तरह छतरपुर में 0.81 टन, दमोह में 1.07 टन और पन्ना में 1.11 टन है.

धान की तरह ही बुंदेलखंड में गेहूं भी और अधिक क्षेत्र में बोया जाना लगा है.

दलहन और तिलहन का उचित दाम नहीं मिलने से ज्यादा पानी वाली फसलें उगाने को किसान मजबूर हैं.

यूपी के क्षेत्र में गेहूं की बुवाई साल 2009-10 में 7.37 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 2019-20 में 8.80 लाख हेक्टेयर हो गया है. इसी तरह एमपी वाले बुंदेलखंड में गेहूं बुवाई का क्षेत्रफल 6.80 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 14.30 लाख हेक्टेयर हो गया गया है.

उत्तर प्रदेश में गेहूं की औसत पैदावार प्रति हेक्टेयर 3.86 टन और मध्य प्रदेश में 3.27 टन है, लेकिन बुंदेलखंड के ज्यादातर इलाकों में गेहूं की उत्पादकता इससे काफी कम हो रही है.

बांदा में ये 3.06 टन, चित्रकूट में 2.71 टन, हमीरपुर में 3.21 टन, महोबा में 2.82 टन, छतरपुर में 2.92 टन, दमोह में 2.56 टन, पन्ना में 2.71 टन, सागर में 2.50 टन और टीकमगढ़ में 2.83 टन है.

खास बात ये है कि प्रशासन इन क्षेत्रों में गेहूं और धान की बढ़ी हुई बुवाई को अपनी सफलता के रूप में दर्शा रहा है. हालांकि हकीकत ये है कि इसके चलते अत्यधिक मात्रा में खेती में जल का इस्तेमाल होगा, जो कि एक अतिरिक्त जल संकट की ओर इशारा कर रहा है.

विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार चाहे कितने भी डैम बनाकर सिंचाई क्षमता बढ़ा दे, लेकिन ये सब नाकाफी साबित होगा यदि क्षेत्र की जलवायु के अनुरूप खेती को बढ़ावा नहीं दिया जाता है. 

इसका मतलब ये है कि सरकार को सूखा प्रभावित या जल संकट से जूझ रहे क्षेत्रों में कम पानी लेने वाली फसलों की बुवाई के लिए किसानों को प्रोत्साहित करना होगा. ऐसा तभी संभव हो सकता है कि यदि सरकार गेहूं, धान के अलावा ज्वार, बाजरा, अरहर, सरसों, मूंग इत्यादि दालें एवं तिलहन की एमएसपी पर खरीदी करे.

लेकिन ऐसा कर पाने में बुंदेलखंड पैकेज नाकाम रहा है. इस योजना के तहत क्षेत्र में कई मंडियां बनाई गई हैं, लेकिन इनमें से अधिकतर मंडियों के ताले खुले नहीं है, इनके परिसर में जगह-जगह झाड़ियां उग आई हैं.

करोड़ों रुपये की बनी मंडियों को अब यूपी सरकार ने गौशाला बना दिया है.

आलम ये है कि उत्तर प्रदेश प्रशासन ने कुछ मंडियों को तो स्थायी गौशाला घोषित कर दिया है. जहां किसानों के उत्पाद का मोल-भाव किया जाना चाहिए था, वहां इस समय गोबर का ढेर फैला हुई है.

यूपी में बुंदेलखंड के सात जिलों में किसानों को कृषि बाजार मुहैया करवाने के उद्देश्य से 625.33 करोड़ रुपये खर्च कुल 138 मंडियां बनाई गई थीं, पर आज अधिकतर मंडियों में कोई खरीद-बिक्री नहीं होती, जिसके चलते स्थानीय किसान परेशान हैं.

बांदा जिले में 63.47 करोड़ रुपये खर्च कर शहर से करीब 10 किलोमीटर बाहर महोबा रोड पर विशिष्ट मंडी स्थल बनाया गया है, मंडी इतनी बड़ी है कि यदि इसे पैदल पूरा घूमना मुश्किल है, लेकिन यहां कोई किसान या कृषि व्यापारी देखने को नहीं मिलता है.

इस दिशा में मध्य प्रदेश सरकार ने 570.32 करोड़ रुपये खर्च कर 94 वेयरहाउस और मार्केटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया है. इसके अलावा 64.56 करोड़ रुपये की लागत से हाट बाजार, 12 करोड़ की लागत से 40 एग्रीकल्चर इनपुट सेंटर और 5.44 करोड़ रुपये खर्च कर चार बीज गोदाम बनाए गए थे.

लेकिन करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी मंडिया बदहाल होने के चलते किसानों को ऐसी चीजों का उत्पादन करना पड़ रहा है, जिसके ठीक-ठाक दाम मिल जाते हैं.

कृषि मंत्रालय से प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में 10 साल के भीतर मसूर की बुवाई क्षेत्र में करीब एक लाख हेक्टेयर की कमी आई है. साल 2009-10 में यहां के सात जिलों में कुल मिलाकर 2.66 लाख हेक्टेयर में मसूर बोया गया था, जो कि 2019-20 में घटकर 1.67 लाख हेक्टेयर हो गया.

इसी तरह पहले इन इलाकों में कुल 84,467 हेक्टेयर में ज्वार बोया जाता था, जो कि 2019-20 में घटकर 63,104 हेक्टेयर हो गया. इस दौरान मक्के की भी बुवाई क्षेत्रफल 45,632 से घटकर 24,089 हो गया है.

लंबी-चौड़ी मंडियों को बंद करके प्रशासन इस तरह के छोटे से स्थानों पर खरीदी करता है, जिसके कारण कई किसान सरकारी रेट पर नहीं बेच पाते हैं.

एक दशक में यूपी के बुंदेलखंड में उड़द की बुवाई 21 हजार हेक्टेयर और अरहर की बुवाई 12 हजार हेक्टेयर कम हो गई है. जबकि अत्यधित पानी लेने वाले गन्ने का बुवाई क्षेत्रफल 2009-10 में 3,957 हेक्टेयर से बढ़कर 2019-20 में 8,518 हेक्टेयर हो गया है.

मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में 2009-10 में 48,885 हेक्टेयर में ज्वार बोया जाता था, लेकिन 2019-20 में ये घटकर 13,045 हेक्टेयर हो गया है. इस दौरान चने के बुवाई क्षेत्र में 1.77 लाख हेक्टेयर से अधिक की गिरावट आई है.

पैकेज की शुरुआत में छह जिलों के कुल 5.81 लाख हेक्टेयर में चना बोया जाता था, जो कि 2019-20 में घटकर 4.03 लाख हेक्टेयर हो गया. इसी तरह पहले 1.07 लाख हेक्टेयर में मसूर की बुवाई होती थी, जो कि एक दशक बाद घटकर करीब 90 हजार हेक्टेयर हो गया.

साल 2009-10 में 72.8 हजार हेक्टेयर में मटर और बीन्स की बुवाई होती थी, लेकिन 2019-20 में ये घटकर 13.8 हजार हेक्टेयर हो गया. 

खास ये बात ये है कि इन सब के बीच गन्ने की बुवाई क्षेत्र में काफी इजाफा हुआ है. पहले ये 3,481 हेक्टेयर में बोया जाता था, जो कि 2019-20 में बढ़कर 10 हजार हेक्टेयर से अधिक हो गया है. एक एकड़ गन्ना उगाने में जितना पानी लगता है उससे करीब 10-12 एकड़ ज्वार की सिंचाई हो सकती है.

कृषि मामलों की जानकार और टिकाऊ खेती के लिए काम करने वाले नेटवर्क अलायंस फॉर सस्टेनेबल एंड हॉलिस्टिक एग्रीकल्चर (आशा) की सदस्य कविता कुरुगांती कहती हैं कि ये चिंता का विषय है, क्योंकि सरकारी खरीद नीति सिर्फ दो-तीन फसलों के इर्द-गिर्द घूमती है. 

उन्होंने कहा, ‘इस देश की ब्याज और बीमा नीति भी गलत फसलों की ओर ढकेलता है. पहले तो किसान किसी और फसल के नाम पर कर्ज लेकर अपने अनुसार सही फसल उगाते थे, लेकिन अब ये भी चांस खत्म हो गया है. सरकार हर जगह निगरानी करती है.’

किसानों द्वारा अत्यधिक पानी वाली फसल उगाने पर वे कहती हैं, ‘इसके चलते कुछ दिन तो किसान को लाभ मिलता है, इस आधार पर वो खूब लोन ले लेते हैं और आगे चलकर फिर वही संकट उनके सामने आ जाता है. ये पूरा एक दुष्चक्र है, जिसमें देश के किसान को फंसा दिया गया है.’

रसिन बनी मंडी, जो कि वर्षों से बंद पड़ी है.

उन्होंने कहा कि बुंदेलखंड जैसे क्षेत्र में वर्षा आधारित फसल और वर्षा आधारित उसकी प्रजाति उगाना चाहिए. ऐसे क्षेत्र के किसानों के लिए इंटीग्रेटेड क्रॉपिंग मॉडल, मल्टी क्रॉपिंग सिस्टम के आधार पर एक बेहतर पैकेज दिया जाना चाहिए.

कुरुगांती ने कहा, ‘ये बिल्कुल गलत धारणा है कि सूखा प्रभावित या कम पानी वाले क्षेत्रों में बांध बनाने से समस्या का समाधान हो जाएगा. भारत की नदियों में पानी बह भी नहीं रहा है, बांध बनाकर क्या होगा. सिंचाई के प्रति हमारा दृष्टिकोण जमीन के किसी भूभाग को पानी से भरने नहीं, बल्कि नमी प्रबंधन का होना चाहिए. जो लोग ये सोच रहे हैं कि ड्रिप इरिगेशन क्रांतिकारी है और इससे समस्या का समाधान हो जाएगा, उनका भी सोचना सही नहीं है. भारत में पहले ही दुनिया में सबसे ज्यादा पानी कृषि के लिए इस्तेमाल हो रहा है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘जहां पहले से ही पानी कम है, वहां पर इन सबका उत्पादन सही नहीं है. इन फसलों के उत्पादन से रसायनीकरण भी हो रहा है, पानी भी ज्यादा लग रहा है.

मालूम हो कि दालें एवं तिलहन की एमएसपी पर खरीद करने के लिए भारत सरकार द्वारा पीएम-आशा (प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण योजना) नामक एक योजना चलाई जाती है. हालांकि खुद सरकारी विभाग का कहना है कि ये योजना अभी तक कारगर नहीं हो पाई है.

एमएसपी की सिफारिश करने वाली कृषि मंत्रालय की संस्था कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) ने अपनी नवीनतम खरीफ रिपोर्ट 2021-22 में कहा है कि ‘पीएम-आशा योजना’ का प्रदर्शन संतोषजनक स्तर से भी कोसों दूर है.

ऐसा कहने की वजह ये है कि इसके पीछे काफी कम खरीद हो रही है, जिसके चलते किसानों को अपनी उपज औने-पौने दाम पर बेचना पड़ रहा है.

सरकारी दस्तावेजों से पता चलता है कि खरीफ 2020-21 सीजन में सरकार ने 51.91 लाख टन दालें एवं तिलहन खरीदने की योजना बनाई थी, लेकिन इसमें से महज 3.08 लाख टन खरीद हुई है, जो कि लक्ष्य के मुकाबले महज छह फीसदी से भी कम है. इसके लिए 10.60 लाख किसानों ने रजिस्ट्रेशन कराया था, लेकिन 1.67 लाख को ही लाभ मिला है.

इसमें उत्तर प्रदेश की स्थिति और खराब है. इस सीजन में राज्य से 5,000 टन मूंग, 55,000 टन उड़द, 26,150 टन मूंगफली और 17,900 टन तिल खरीदने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन इसमें से मूंग, उड़द और तिल की एक किलो भी खरीद नहीं हुई.

इससे पहले रबी-2020 सीजन में उत्तर प्रदेश से कुल 6.02 लाख टन चना, मसूर, सरसों, सूरजमुखी, उड़द और मूंग खरीदने की योजना बनाई गई थी, लेकिन राज्य में महज 38,817 टन की ही खरीदी की गई, जो कि लक्ष्य की तुलना में सिर्फ 6.43 फीसदी है.

कैसी रही बुंदेलखंड की बारिश

बुंदेलखंड के संबंध में विभिन्न सरकारों द्वारा बनाई गईं योजनाओं का एक प्रमुख आधार ये रहा है कि ‘यहां पर काफी कम बारिश होती है.’ 

साल 2008 में पेश की गई सामरा कमेटी की रिपोर्ट, जिसके आधार पर बुंदेलखंड पैकेज लाया गया था, में भी ये कहा गया है कि ‘क्षेत्र में अर्ध-शुष्क जलवायु की स्थिति के कारण कम वर्षा सतही जल उपलब्धता को प्रभावित करती है और कठोर चट्टानी भू-भाग भूजल उपलब्धता को सीमित करता है. बुंदेलखंड क्षेत्र को 18वीं और 19वीं शताब्दी के दौरान हर 16 वर्ष में बार-बार सूखे का सामना करना पड़ा था, जो 1968 से 1992 की अवधि के दौरान तीन गुना बढ़ गया है.’

इन क्षेत्रों में योजनाएं लागू करने के बाद भी स्थिति नहीं बदलने पर सरकार इसी बारिश का हवाला देकर बच निकलती है. इस पैकेज को लेकर भी यही किया गया. 

आदिवासी क्षेत्र कैमहाई गांव की निवासी मंगीरिया. इनके यहां पैकेज के तहत कुआं बना था, लेकिन प्राकृतिक स्रोत नहीं होने के चलते पानी सड़ जाता है.

सवाल ये है कि क्या वाकई यहां बारिश नहीं होती है? क्या इसी वजह से यहां कि स्थिति खराब है? आंकड़े इसकी सही स्थिति बता सकते हैं. द वायर ने इसके लिए पिछले पांच सालों के वर्षा आंकड़ों का विश्लेषण किया है.

कम बारिश होना या अचानक से बारिश हो जाना पूरे भारत के कई जिलों की समस्या है, जिसमें बुंदेलखंड का भी क्षेत्र शामिल है. जानकार इसके पीछे जलवायु परिवर्तन होना एक वजह बताते हैं.

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार साल 2016 में बुंदेलखंड के 13 जिलों में 1,086 मिलीमीटर की बारिश हुई थी, जो कि सामान्य से करीब सात फीसदी अधिक थी. क्षेत्र के बांदा जिले में 1,230.5 मिमी. वर्षा हुई थी, जो कि सामान्य से 30 फीसदी अधिक थी.

इसी तरह छतरपुर में 1513.4 मिमी बारिश हुई, जो कि सामान्य से 40 फीसदी अधिक थी. दमोह में 37 फीसदी, पन्ना में 49 फीसदी, सागर में 17 फीसदी और हमीरपुर में नौ फीसदी अधिक वर्षा हुई थी. इस साल सिर्फ झांसी और दतिया में सामान्य से कम वर्षा हुई थी.

हालांकि साल 2017 में इन इलाकों में काफी कम वर्षा हुई. लेकिन ऐसा नहीं है कि इकलौता यही क्षेत्र इस समस्या से जूझा था, इस साल पूरे उत्तर प्रदेश में सामान्य से 32 फीसदी और मध्य प्रदेश में 24 फीसदी कम बारिश हुई थी.

इस दौरान बुंदेलखंड के 13 जिलों को मिलाकर करीब 602 मिमी. बारिश हुई, जो कि सामान्य से 40 फीसदी कम था.

साल 2018 भी वर्षा की दृष्टि से बहुत अच्छा नहीं था, जहां पूरे भारत में सामान्य के मुकाबले 14 फीसदी कम बारिश हुई. उत्तर प्रदेश में 17 फीसदी और मध्य प्रदेश में भी 14 फीसदी कम बारिश हुई थी.

जाहिर है बुंदेलखंड भी इससे अछूता नहीं रह सकता था. इस दौरान यहां 871.57 मिमी वर्षा हुई, जो कि सामान्य स्थिति से करीब 12 फीसदी कम था. हालांकि ऐसे समय पर भी दतिया और टीकमगढ़ में 12 एवं 39 फीसदी अधिक बारिश हुई थी.

आईएमडी के मुताबिक, 19 फीसदी अधिक और 19 फीसदी कम तक की बारिश को सामान्य बारिश माना जाता है. इस आधार पर साल 2018 में बुंदेलखंड के 13 जिलों में से नौ जिलों में सामान्य बारिश हुई थी.

साल 2019 में एक बार फिर से अच्छी बारिश हुई. इस दौरान बुंदेलखंड भी पीछे नहीं रहा और यहां 1,036 मिमी. की वर्षा हुई, जो कि पूरे यूपी में हुए 814.5 मिमी. से काफी ज्यादा थी और सामान्य बारिश से करीब 8.5 फीसदी अधिक थी.

इस वर्ष मध्य प्रदेश में भी काफी अधिक 1,446.7 मिमी. बारिश हुई, जो कि सामान्य 40 फीसदी अधिक थी.

बुंदेलखंड के बांदा में 11 फीसदी, चित्रकूट में 18 फीसदी, हमीरपुर में 26 फीसदी, छत्तरपुर में 24 फीसदी, दमोह में 24 फीसदी, दतिया में 34 फीसदी, सागर में 32 फीसदी और टीकमगढ़ में 21 फीसदी अधिक बारिश हुई थी.

साल 2020 में मानसून के जून महीने में बांदा में 256.6 मिमी बारिश हुई, जो कि सामान्य 149 फीसदी अधिक थी. हालांकि जुलाई, अगस्त, सितंबर में यहां सामान्य से कम बारिश हुई.

वहीं यदि चित्रकूट को देखें तो 2020 में मानसून सीजन में यहां काफी बारिश हुई. जून में सामान्य से 261 फीसदी, अगस्त में 48 फीसदी और सितंबर में 74 फीसदी अधिक बारिश हुई थी. हमीपुर में भी अच्छी बारिश हुई, जिसमें से जून और जुलाई में सामान्य से 41 और 16 फीसदी अधिक वर्षा हुई थी.

इस तरह उपर्युक्त आंकड़ों के देखकर ये समझा जा सकता है कि बुंदेलखंड क्षेत्र में भी देश के अन्य इलाकों की तरह बारिश हो रही है. कई बार यहां आस-पास के जिलों से ज्यादा ही बारिश हो जाती है. लेकिन जब पूरे राज्य या देश का मानसून ठीक नहीं रहता है, तो इस क्षेत्र को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ा है.

इन सबके बावजूद प्रशासन क्षेत्र को उपर्युक्त पानी नहीं दिला पा रहा है.

क्या कहती है सरकार और विशेषज्ञ

बुंदेलखंड पैकेज को लेकर साल 2009 में जब जेएस सामरा तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से मिलने गए और उनसे पूछा कि इसे कैसे लागू किया जाए, तो उन्होंने सामरा से कहा कि चूंकि तुम एक साइंटिस्ट हो, टेक्निकल आदमी हो, इसलिए तुम्हें वो काम करना चाहिए जो तुम्हारी साइंस कहती है.

डॉ. सिंह ने ये जोर देकर कहा कि इसमें किसी भी तरह की राजनीति नहीं होनी चाहिए. राजनीति हम देख लेंगे. राज्यों में किसी भी पार्टी की सरकार हो, लेकिन योजना लागू करने में अंतर नहीं होना चाहिए.

(फोटो: रॉयटर्स)

इतना ही नहीं पूर्व प्रधानमंत्री ने अप्रत्याशित कदम उठाते हुए इस पैकेज के तहत सभी विभागों से संबंधित योजनाओं की मंजूरी देने का अधिकार सामरा को दे दिया था.

जेएस सामरा उस समय योजना आयोग में भारत सरकार के सचिव पद पर थे. इस पूरे पैकेज को सामरा ने ही तैयार किया था और इसके क्रियान्वयन का जिम्मा भी उन्होंने ही संभाला था.

अप्रैल 2015 में रिटायर होने के बाद अब वे चंडीगढ़ में रहते हैं और सेंटर फॉर रिसर्च इन रूरल एंड इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट (सीआरआरआईडी) नाम स्वायत्त संस्था में वरिष्ठ सलाहकार हैं.

वे इस बात को लेकर नाराजगी जाहिर करते हैं कि तमाम कोशिशों के बाद भी मंडियां चालू नहीं हो पाई हैं. हालांकि वे ये भी स्वीकार करते हैं कि इस पैकेज के बाद सभी लोगों की स्थिति में सुधार नहीं आया है.

उन्होंने कहा, ‘सूखा तभी ठीक होगा, जब पानी को संभालेंगे, पानी को रोकेंगे. देखिए हम हर एक को पानी दे नहीं सकते थे. वहां उतना ही पानी है, जितनी बारिश होगी. ये तो हो ही नहीं सकता कि यहां हर एक को पानी मिले. पंजाब को हर एक को पानी इसलिए मिलता है क्योंकि यहां हिमालय से पानी आता है.’

सामरा ने आगे कहा, ‘ये बात सही है कि सबके घर तक लाभ नहीं पहुंचा है, लेकिन कुछ न होने से बेहतर है कि कुछ को लाभ मिला है.’

उनकी योजना के मूल्यांकन के बारे में सवाल करने पर वो द एनर्जी एंड रिसोर्स इंस्टिट्यूट (टीईआरआई या टेरी) की रिपोर्ट का हवाला देते हैं जिसमें बुंदेलखंड पैकेज के लागू होने के बाद बदलावों का विवरण दिया है.

उन्होंने कहा, ‘मैं तो अपने को अच्छा ही कहूंगा, इसलिए इस रिपोर्ट को देखिए , मेरे पद से हटने के बाद इसे थर्ड पार्टी ने तैयार किया है.’

टेरी की ओर से इस रिपोर्ट को तैयार करने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले रिसर्चर श्रेष्ठ तयल कहते हैं कि बुंदेलखंड जैसे भूभाग को देखते हुए पैकेज के तहत जितनी राशि खर्च की गई है, वो पर्याप्त नहीं है. इसमें स्थानीय लोगों की आजीविका के पहलू पर अतिरिक्त फंड दिया जाना चाहिए था.

टेरी के एक कार्यक्रम में बोलते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (फोटो साभार: TERI/फेसबुक)

उन्होंने कहा, ‘मान लीजिए एक गांव की आबादी 500 की है और सरकार ने 4-5 कुएं बना भी दिए तो क्या इससे सूखे की स्थिति में कोई फर्क पड़ा, नहीं, क्योंकि 490 परिवार तो ऐसे ही रह गए. अगर वे नहर के क्षेत्र में नहीं है तो उन्हें कोई लाभ नहीं होगा. सुनने में 12,000 करोड़ रुपये बहुत पैसा लगता है, लेकिन यहां की स्थिति देखते हुए ये पर्याप्त नहीं है. यहां अतिरिक्त राहत राशि देने की जरूरत है.’

इसके साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि यदि इस योजना के तहत लाभान्वित हुए लोगों और क्षेत्र की स्थिति को बरकरार रखनी है, तो इसके लिए लगातार सपोर्ट करते रहने या स्थायी पैकेज की जरूरत है, नहीं तो लाभार्थी पीछे छूट जाएंगे और फिर से पहले वाली स्थिति में पहुंच जाएंगे.

तयल ने कहा, ‘अपनी स्टडी के दौरान हमने पाया कि पैकेज के तहत जिन लोगों को 2009-10 में लाभ मिला था, इनमें से कई को अब कोई फायदा नहीं हो रहा है. उदाहरण के तौर पर मान लीजिए कि उनको कुआं दिया गया, लेकिन कुछ साल बाद वो सूख गया, उनकी स्थिति ऐसी है ही नहीं है की वे पैसे खर्च कर इसे रिचार्ज कर पाए. इसलिए सरकार को यहां पर सपोर्ट देने की जरूरत है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘जो जल संरक्षण के काम किए गए हैं वो पर्याप्त नही हैं. पूरे बुंदेलखंड भूभाग को सुधारने के लिए और बहुत करने की जरूरत है, जिसमें सरकारी फंड चाहिए. अगर हमने इसे ऐसे ही छोड़ दिया तो जो किया वो भी बेकार जाएगा और हमें जीरो से शुरू करना होगा. हम 0 से करीब 15 तक आए हैं, आगे बढ़ने के लिए और करने की जरूरत है.’

टेरी रिसर्चर ने कहा कि इस पैकेज के तहत बनीं संरचनाओं की तत्काल मेनटेनेंस की जरूरत है, नहीं तो फिर से ये सब पहले जैसी स्थिति में पहुंच जाएगी.

नीति आयोग के पूर्व कृषि सलाहकार और पैकेज पर बनी मूल्याकंन रिपोर्ट का नेतृत्व करने वाले डॉ. जयप्रकाश मिश्रा भी इस बात से सहमति जताते हैं. उन्होंने कहा, ‘इस पैकेज को और बेहतर करने के लिए इसकी मॉनिटरिंग और सुपरविजन करने की जरूरत है.’

मिश्रा ने 2012 से 2018 तक नीति आयोग में काम किया था. उस समय वे पैकेज को लागू करने का काम करते थे. इस समय वे इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च (आईसीएआर) में असिस्टेंट डायरेक्टर जनरल के पद पर कार्यरत हैं.

बुंदेलखंड क्षेत्र में सूखे के कारण पानी की उपलब्धता बड़ी समस्या है.

पैकेज तहत बनीं संरचनाओं की बदहाल स्थिति पर वे कहते हैं, ‘कुओं की स्थिति को लेकर राज्यों के मुख्य सचिव को बताया गया था कि उसमें हाइड्रोलॉजी का पालन नहीं किया गया है. हमने दंडात्मक कार्रवाई के लिए लिखा था, इस पर कार्रवाई भी हुई थी. हमने राज्यों से ये निवेदन किया था कि कोई भी पैकेज जीवनपर्यंत नहीं होता है, ये त्वरित सहायता के लिए होता है, राज्यों को कहा गया था कि वे अपने बजट में ये प्रवधान करें कि जो संरचनाएं खराब हो रही हैं, उसे वे ठीक कराएं.’

उन्होंने कहा कि नीति आयोग के इम्पावर्ड ग्रुप ने इन कुओं को जिओटैग कर उनकी देखरेख करने को कहा था, ताकि पता लगाया जा सके कि कौन सा ठीक है और कौन सा नहीं.

मिश्रा ने इस बात पर चिंता जाहिर की कि क्षेत्र के किसान तेजी से अब अधिक पानी वाली फसलें उगाने लगे हैं. 

उन्होंने कहा, ‘जहां भी पानी का अभाव होता है, वहां पानी आने पर लोग ज्यादा से ज्यादा उसे इकट्ठा कर लेना चाहते हैं. हमने ये देखा कि जिनके भी डगवेल या बोरवेल में थोड़ा अच्छा पानी आने लगा, वे तुरंत गेहूं उगाने लगते हैं, जो कि ज्यादा पानी लेता है. ये एक बड़ी समस्या है. ये बाजार और मूल्य नीति पर निर्भर करता है.’

हालांकि जब उनसे ये पूछा गया कि क्या इसके पीछे की बड़ी वजह सरकार द्वारा अन्य उपज को न खरीद पाना है, तो उन्होंने इसका जवाब देने से इनकार कर दिया.

बुंदेलखंड में करोड़ों की बनीं मंडियां नहीं चालू होने पर वे कहते हैं कि ट्रेडर्स अपने स्थापित जगह छोड़कर नहीं आना चाहते हैं. 

उन्होंने कहा, ‘हमने इसे लेकर बहुत कोशिश की. मैंने बतौर सलाहकार डीएम के साथ बैठक की थी कि ट्रेडर्स को प्रेरित किया जाए, अगर जरूरत हो तो उन्हें सब्सिडी दी जाए. लेकिन ट्रेडर्स का माइंडसेट था कि वे अपनी बनी-बनाई जगह को छोड़कर कहीं और नहीं जाना चाहते थे.’

डॉ. जयप्रकाश मिश्रा ने कहा कि क्षेत्र के सुधार में स्थानीय लोगों को भूमिका निभाना होगा, जन भागीदारी जरूरी है. इजराइल में बुंदेलखंड से कम पानी है, लेकिन वहां जल का संकट नहीं है. लोग अपनी भूमिका और सरकार की मदद से स्थिति को बेहतर कर सकते हैं.

वहीं श्रेष्ठ तयल तमाम योजनाओं की नाकामियों के संदर्भ में कहते हैं कि हम पहले पैसा निर्धारित कर लेते हैं, उसके बाद योजनाएं बनाते हैं. हालांकि इसका उल्टा होना चाहिए. स्थानीय विभाग को दूरदृष्टि रखते हुए 20 साल बाद तक का प्लान बनाना चाहिए. हमें टॉप डाउन के बजाय बॉटम टू टॉप का अप्रोच रखना चाहिए.

उन्होंने कहा, ‘हमें योजना शुरू करने से पहले हमें बेस लाइन इन्फॉर्मेशन बनाने की जरूरत है. इसका मतलब ये है कि लाभार्थी को लाभ देने से पहले उनकी तात्कालिक स्थिति का डेटा तैयार होना चाहिए, ताकि जब कभी मूल्यांकन हो तो पता लगाया जा सके कि लाभ मिलने के बाद व्यक्ति की स्थिति में कितना परिवर्तन आया है. इसकी अनुपलब्धता होने पर उचित आकलन नहीं हो पाता है.’

बुंदेलखंड के स्थानीय पत्रकार और शुरुआत से ही इस पैकेज का क्रियान्वयन देख रहे आशीष सागर पूरी योजना में पैसों का बंदरबांट होने और प्राकृतिक जलस्रोतों को नजरअंदाज करने का आरोप लगाते हैं. 

उन्होंने कहा, ‘चूंकि जब हम ये मान के चलते हैं कि हमें बांध से ही पानी मिलेगा, हमें बंधी से ही पानी पिलाना है, ये लोग तालाब, जौहड़ (छोटा ताल) और कुओं को जलस्रोत मानते कहां हैं. ये परंपरागत जलस्रोतों को जलस्रोत नहीं मानते हैं, ये डैम और चेकडैम बनाने में विश्वास करते हैं.’

सागर ने कहा कि सरकार पहले अपने नीतियों के जरिये जलस्रोतों को बर्बाद करती है और फिर विकास के नाम पर डैम बनाती है. ये प्रकृति विरोधी तरीका है.

पत्रकार ने नाराजगी भरे लहजे में कहा, ‘नदी पर आप डैम बना दीजिए, उसका पानी रोक दीजिए, आगे खनन कराइए, और जब नदी सूख जाए तो कहिये कि यहां अकाल और सूखा पड़ता है.’

द वायर ने बुंदेलखंड पैकेज को लेकर नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार और इसके सीईओ अमिताभ कांत को सवालों की सूची के साथ ई-मेल भेजा है. यदि वहां से कोई जवाब आता है तो उसे स्टोरी में शामिल कर लिया जाएगा.

(यह रिपोर्ट इंटरन्यूज़ के अर्थ जर्नलिज्म नेटवर्क के सहयोग से प्रकाशित की गई है.)