भारत

अपने गर्भ के बारे में फ़ैसला लेने की महिला की आज़ादी छीनी नहीं जा सकती: केरल हाईकोर्ट

केरल हाईकोर्ट का कहना है कि अगर होने वाले बच्चे में विकृति का ख़तरा है, जिससे वह अपंग हो सकता है तो ऐसी स्थिति में मां के गर्भपात कराने के अधिकार को अदालत मान्यता देता है.

(फोटो साभार: विकीमीडिया कॉमन्स)

कोच्चिः केरल हाईकोर्ट का कहना है कि महिला को अपने गर्भ के बारे में फैसला लेने की आजादी है और यह उससे छीनी नहीं जा सकती.

अदालत ने इसके साथ ही मानसिक रूप से आंशिक तौर पर कमजोर महिला को उसके 22 हफ्ते के असामान्य भ्रूण को समाप्त करने की अनुमति दी.

हाईकोर्ट ने कहा कि अगर होने वाले बच्चे में विकृति का खतरा है, जिससे वह विकलांग हो सकता है तो ऐसी स्थिति में मां के गर्भपात कराने के अधिकार को अदालत भी मान्यता देती है.

इस मामले में महिला आंशिक रूप से मानसिक तौर पर कमजोर थी और महिला की मेडिकल टीम की रिपोर्ट के मुताबिक उनके गर्भ में पल रहा भ्रूण क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम से ग्रस्त है.

दरअसल यह एक आनुवांशिक स्थिति है, जिसमें बच्चे (लड़का) में अतिरिक्त एक्स क्रोमोसोम होता है और जिसकी वजह से पैदा होने के बाद बच्चे में कई जटिलताएं उत्पन्न होती हैं.

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि सिंड्रोम क्रोमोसोम से जुड़ी हुई विसंगति है, जिससे बाद में बच्चा मानसिक तौर पर अस्थिर, एन्डोक्राइन समस्याओं से ग्रस्त और मनोवैज्ञानिक दिक्कतों का सामना कर सकता है.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, महिला की मेडिकल रिपोर्ट के मुताबिक, वे आंशिक मानसिक अक्षमताओं के अलावा दृष्टि दोष, दौरे पड़ना और 55 फीसदी स्थाई अक्षमता के साथ शरीर के निचले बाएं हिस्से से कमजोर भी है.

रिपोर्ट में कहा गया कि हालांकि क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम जानलेवा नहीं है लेकिन मां की शारीरिक और मानसिक स्थिति की वजह से बच्चे का लालन-पालन करना उनके लिए मुश्किल होगा.

रिपोर्ट में कहा गया, ‘इसलिए ऊपर दिए गए कारणों की वजह से महिला के गर्भपात की सिफारिश की जाती है.’

इस रिपोर्ट पर गौर करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा, ‘अपने गर्भ के बारे में फैसला लेने की महिला की स्वतंत्रता को छीना नहीं जा सकता अगर होने वाले बच्चे में विकृति का खतरा है, जिससे वह अपंग हो सकता है तो ऐसी स्थिति में मां के गर्भपात कराने के अधिकार को अदालत भी मान्यता देती है.’

अदालत ने कहा, ‘परिणामस्वरूप रिट याचिका दायर करने की मंजूरी दी जाती है. गर्भवती मां को गर्भपात की प्रक्रिया से गुजरने की मंजूरी दी जाती है.’

बता दें कि अदालत का यह फैसला महिला और उनके पति की याचिका पर आया है, जिसमें मां की जान को होने वाले संभावित खतरे के आधार पर 22 सप्ताह के गर्भ को गिराने की अनुमति मांगी थी.

याचिका में कहा गया था कि बच्चे में जन्म के बाद शारीरिक और मानसिक असामान्यताओं से पीड़ित होगा.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)